तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुमाने टिप्पण्यः ] अनुमाननिरूपणम् १०५
ऊपर उद्धृत दोनों कारिकाएँ प्रशस्तपाद भाष्य में पाई जाती हैं जिससे
विदित होता है कि प्रशस्तपाद ने किसी अपने पूर्ववर्ती काश्यपाचार्य के मता-
नुसार इस त्रैरूप्य-सिद्धान्त का विवेचन किया है। प्रसिद्ध रूसी विद्वान् प्रो०
श्चेरबात्स्की ने अपनी 'बुद्धिस्ट लाजिक' नामक पुस्तक के [पृ० २४] में यह प्रति-
पादन किया है कि त्रैरूप्य-सिद्धान्त के सम्बन्ध में वैशेषिक के ऊपर बौद्धों का
प्रभाव पड़ा है। बौद्धों के अभिधर्मकोश, प्रमाणसमुच्चय, न्यायप्रवेश [पृ०
१] न्यायबिन्दु [२,५] हेतुबिन्दु [पृ० ९] और तत्त्वसंग्रह [कारिका
५३६२] आदि सभी ग्रन्थों में त्रैरूप्य-सिद्धान्त का ही समर्थन किया गया है
और न्यायसम्मत पञ्चरूपता का खण्डन किया गया है। सांख्यकारिका की
माठरवृत्ति में भी पाँचवीं कारिका की व्याख्या में इसी त्रैरूप्यसिद्धान्त का सम-
र्थन किया गया है। इस प्रकार वैशेषिक, सांख्य तथा बौद्ध दर्शन हेतु के पक्ष-
सत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षव्यावृत्तत्व इन तीन धर्मों को ही स्वीकार करते हैं।
न्याय-परम्परा में इन तीन रूपों के अतिरिक्त अबाधितविषयत्व और
असत्प्रतिपक्षत्व इन दो रूपों को और सम्मिलित कर हेतु की पञ्चरूपता का
प्रतिपादन किया गया है। इस पञ्चरूपता-सिद्धान्त के प्रथम 'प्रवर्तक' कदाचित्
श्री उद्योतकराचार्य रहे हों। उनके बाद वाचस्पतिमिश्र तथा जयन्त भट्ट आदि
ने भी इस पञ्चरूपता का समर्थन किया है। और तर्कभाषा में भी उन पाँच
रूपों का वर्णन किया गया है। परन्तु यह पञ्चरूपता का सिद्धान्त न्याय-पर-
म्परा में भी उतनी दृढ़ता से अथवा मृतकमुष्टि की भाँति स्थिर नहीं रहा है।
नव्य न्याय में गदाधर भट्टाचार्य आदि ने हेतु की गमकतोपयोगी व्याप्ति तथा
पक्षधर्मताको प्राधान्य प्रदान कर वस्तुतः हेतु की त्रिरूपता का ही पोषण किया है।
जिस प्रकार हेतु की त्रिरूपता और पञ्चरूपता के विषय में मतभेद है
उसी प्रकार हेत्वाभासों की संख्या के विषय में भी मतभेद है। वैशेषिक दर्शन
ने जब हेतु की त्रिरूपता का प्रतिपादन किया उसके साथ ही हेत्वाभासों की
भी त्रिरूपता का प्रतिपादन किया है। इसके विपरीत न्याय में हेतु की पञ्चरू-
पता स्वीकार की गई है अतएव उनके यहाँ हेत्वाभास भी पांच प्रकार के माने
गए हैं। हेत्वाभासों की संख्या हेतुरूपों के साथ सम्बद्ध है।
न्याय-दर्शन में पांच हेत्वाभासों के नाम सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम,
साध्यसम, और अतीत काल कहे गये हैं। इनमें से तर्कभाषा के असिद्ध के
स्थान पर साध्यसम को और कालात्ययापदिष्ट के स्थान पर अतीत काल को
रखा जा सकता है। परन्तु उनके स्वरूप में कुछ अन्तर रहेगा।