सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

चतूरूपता ] अनुमाननिरूपणम् ८६
सिद्धिः । पक्षधर्मताबलात्तु साध्यस्य पक्षसम्बन्धित्वं विशेषः सिद्ध्यति ।
पर्वतधर्मेण, धूमवत्त्वेन वह्निरपि पर्वतसम्बद्ध एवानुमीयते । अन्यथा
साध्यसामान्यस्य व्याप्तिग्रहादेव सिद्धेः कृतमनुमानेन ।
यस्त्वन्योऽप्यन्वयव्यतिरेकी हेतुः स सर्वः पञ्चरूपोपपन्न एव सद्धेतुः।
अन्यथा हेत्वाभासो अहेतुरिति यावत् ।
केवलान्वयी चतूरूपोपपन्न एव स्वसाध्यं साधयति । तस्य हि विपक्षाद्
व्यावृत्तिर्नास्ति, विपक्षाभावात् ।
केवलव्यतिरेकी च चतूरूपोपपन्न एव । तस्य हि सपक्षे सत्त्वं नास्ति,
सपक्षाभावात् ।
धूम ] की ‘पक्षधर्मता’ [ अर्थात् पर्वत में विद्यमानता ] के बल से सिद्ध होता है ।
क्योंकि अनुमान के दो अङ्ग होते हैं [ एक ] ‘व्याप्ति’ और [दूसरी] ‘पक्षधर्मता’ ।
उसमें व्याप्ति से [ जहाँ धूम होगा वहाँ अग्नि होगी इस प्रकार के ] साध्य
सामान्य की सिद्धि होती है। और पक्षधर्मता [ हेतु की पक्ष में विद्यमानता ]
के बल से साध्य [ अग्नि ] के पक्षसम्बन्धित [ अर्थात् पर्वत में विद्यमानत्व ] रूप
विशेष की सिद्धि होती है। पक्ष [ पर्वत ] के धर्म [ अर्थात् पर्वत में विद्यमान ]
रूप धूमवत्त्व से अग्नि भी पर्वत सम्बन्ध ही गृहीत [ अनुमित ] होता है । अन्यथा
[ पक्षधर्मता के अभाव में ] साध्यसामान्य [ जहाँ धूम होगा वहाँ अग्नि होगी इस
प्रकार ] के व्याप्तिग्रह से ही सिद्ध होने से अनुमान की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।
[ इसी प्रकार ] जो और भी ‘अन्वयव्यतिरेकी’ हेतु है वह सब ‘पञ्चरूपोपपन्न’
होने पर ही शुद्ध हेतु है । अन्यथा [ किसी एक भी रूप से रहित होने पर ] हेतु
के समान प्रतीत होने वाला [हेतुवदाभासमान हेत्वाभास] अहेतु [अशुद्ध हेतु] है।
[दूसरा] केवलान्वयी हेतु चार रूपों से युक्त होकर ही अपने साध्य को सिद्ध
करता है । उसमें विपक्ष से व्यावृत्ति [ रूप तृतीय धर्म ] नहीं होती क्योंकि
उसमें विपक्ष का अभाव होता है ।
और केवल व्यतिरेकी [ भी ] चार रूप से युक्त ही [ होता है ] क्योंकि
उसका ‘सपक्ष’ न होने से [ उसमें ] सपक्षसत्त्व नहीं होता ।
अन्वय और व्यतिरेक से, दो प्रकार की व्याप्ति के आधार पर ‘केवलान्वयी’
और ‘केवल व्यतिरेकी’ यह दो भेद हेतु के होते हैं । और तीसरा भेद इन दोनों
के सम्मिश्रण से ‘अन्वयव्यतिरेकी’ भेद के नाम से होता है। इन व्याप्तियों में से
‘अन्वयव्याप्ति’ भावभूत धूम तथा वह्नि आदि की, और व्यतिरेक व्याप्ति वह्नयभाव

६० तर्कभाषा [ हेत्वाभासाः
के पुनः पक्ष-सपक्ष-विपक्षाः ? उच्यन्ते । सन्दिग्धसाध्यधर्मा धर्मी पक्षः।
यथा धूमानुमाने पर्वतः पक्षः । सपक्षस्तु निश्चितसाध्यधर्मा धर्मी । यथा
महानसो धूमानुमाने । विपक्षस्तु निश्चितसाध्याभाववान् धर्मी । यथा
तत्रैव महाह्रद इति ।
तदेवमन्वयव्यतिरेकि-केवलान्वयि-केवलव्यतिरेकिणो दर्शिताः ।
अतोऽन्ये हेत्वाभासाः । ते च असिद्ध-विरुद्ध-अनैकान्तिक-प्रकरणसम-काला-
त्यापदिष्टभेदात् पञ्चैव ।
तथा धूमाभाव रूप अभावों की होती है। केवलान्वयी में अन्वय व्याप्ति का ही
उदाहरण मिलता है, व्यतिरेक व्याप्ति का नहीं । इसलिए उसमें 'विपक्ष' कोई
होता ही नहीं । अतः विपक्ष के न होने से 'विपक्षव्यावृत्तत्व' रूप धर्म उसमें
नहीं बन सकता है । अतः वह चार रूप से ही युक्त होता है। इसी प्रकार
'केवलव्यतिरेकी' हेतु में व्यतिरेक व्याप्ति का ही उदाहरण मिलता है अन्वय-
व्याप्ति का नहीं । अतः उसका 'सपक्ष' कोई न होने से उसमें 'सपक्षसत्त्व' रूप
धर्म नहीं बन सकता है । अतः वह भी चार रूप से ही युक्त होता है। इस प्रकार
'अन्वयव्यतिरेकी' हेतु 'पञ्चरूपोपपन्न' होने पर तथा 'केवलान्वयी' और 'केवल-
व्यतिरेकी' हेतु चार रूपों से युक्त होने पर ही अपने साध्य को सिद्ध कर सकते
हैं । इन धर्मों में कमी होने पर हेत्वाभास हो जाते हैं ।
[ प्रश्न ] अच्छा फिर पक्ष, सपक्ष और विपक्ष कौन [ कहलाते ] हैं।
[ उत्तर ] कहते हैं । सन्दिग्ध साध्यधर्म से युक्त धर्मी [पर्वतादि] पक्ष [होता]
है । जैसे धूम [ लिङ्गक ] अनुमान में पर्वत पक्ष है । [ क्योंकि उसमें अग्नि है या
नहीं यह सन्देह रहता ही है अतः 'सन्दिग्धसाध्यवान्' होने से पर्वत 'पक्ष'
कहलाता है ] निश्चित साध्यधर्म से युक्त धर्मी सपक्ष [ कहलाता ] है । जैसे धूम
[ लिङ्गक उक्त ] अनुमान में महानस [ रसोई घर में अग्नि का निश्चय होने से
वह 'सपक्ष' कहलाता है ] और निश्चित रूप से साध्याभाव युक्त धर्मी विपक्ष
[ कहलाता ] है । जैसे उसी [ धूमलिङ्गक अनुमान ] में महाह्रद ।
इस प्रकार १ अन्वयव्यतिरेकी, २ केवलान्वयी और ३ केवलव्यतिरेकी [तीनों
प्रकार के हेतु ] प्रदर्शित कर दिए ।
इस प्रकार यहाँ तक अनुमान का सामान्यतः निरूपण किया गया इसके
आगे इस अनुमान प्रकरण के अन्तिम भाग हेत्वाभासों का विवेचन किया जायगा ।
इन [ त्रिविध शुद्ध हेतुओं ] के अतिरिक्त अन्य [ सब ] हेत्वाभास होते हैं ।
और वह १ असिद्ध, २ विरुद्ध, ३ अनैकान्तिक, ४ प्रकरणसम तथा ५ कालात्य-
यापदिष्ट भेद से पाँच प्रकार के ही होते हैं ।

असिद्धः ] अनुमाननिरूपणम् ६१
१ तत्र लिङ्गत्वेनासिद्धो हेतुरसिद्धः। तत्रासिद्धस्त्रिविधः । आश्रयासिद्धः
स्वरूपासिद्धः, व्याप्यत्वासिद्धश्चेति ।
आश्रयासिद्धो यथा गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात् सरोजार-
विन्दवत् । अत्र गगनारविन्दमाश्रयः, स च नास्त्येव ।
स्वरूपासिद्धो यथा, अनित्यः शब्दः चाक्षुषत्वात् घटवत् । अत्र चाक्षु-
षत्वं हेतुः, स च शब्दे नास्त्येव, तस्य श्रावणत्वात् ।
व्याप्यत्वासिद्धस्तु द्विविधः । एको व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात् । अपर-
१ उनमें लिङ्गत्वरूप से अनिश्चित हेतु 'असिद्ध' [नामक हेत्वाभास कहलाता]
है। वह असिद्ध तीन प्रकार का होता है। १ 'आश्रयासिद्ध', २ 'स्वरूपासिद्ध'
और ३ व्याप्यत्वासिद्ध' ।
[ इनमें आश्रयासिद्ध का लक्षण है, 'यस्य हेतोराश्रयो नावगम्यते स आश्रया-
सिद्धः' जिस हेतु का आश्रय अर्थात् पक्ष न हो उसको आश्रयासिद्ध कहते हैं । ]
आश्रयासिद्ध 'जैसे [गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरोजारविन्दवत् ।'] आकाश
कमल सुगन्धित होता है, कमल होने से, सरोज कमल के समान । यहाँ [ इस
अनुमान में ] आकाश कमल [ गगनारविन्द ] आश्रय [ हेतु का आश्रय अर्थात्
पक्ष ] है और वह [ वस्तुतः ] है ही नहीं। [ अतः आश्रय अर्थात् पक्ष के न
होने से अरविन्दत्वात् हेतु आश्रयासिद्ध नामक हेत्वाभास कहलाता है ]
असिद्ध का दूसरा भेद 'स्वरूपासिद्ध' है । 'स्वरूपासिद्ध' का लक्षण है 'यो
हेतुराश्रये नावगम्यते स स्वरूपासिद्धः।' जो हेतु आश्रय में न पाया जाय उसको
स्वरूपासिद्ध कहते हैं । आश्रयासिद्ध का लक्षण 'यस्य हेतोराश्रयो नावगम्यते
स आश्रयासिद्धः' यह किया था और स्वरूपासिद्ध का लक्षण 'यो हेतुराश्रये
नावगम्यते स स्वरूपासिद्धः' यह किया गया है । अर्थात् जिस हेतु का आश्रय
तो हो, परन्तु हेतु उस आश्रय अर्थात् पक्ष में न रहता हो उसको 'स्वरूपासिद्ध'
कहते हैं। 'आश्रयासिद्ध' में तो आश्रय या पक्ष का अस्तित्व ही नहीं होता परन्तु
'स्वरूपासिद्ध' में आश्रय या पक्ष का अस्तित्व तो होता है लेकिन हेतु उस
आश्रय या पक्ष में नहीं रहता है अतः उसको 'स्वरूपासिद्ध' कहते हैं। यह
आश्रयासिद्ध और 'स्वरूपासिद्ध' का भेद हुआ ।
स्वरूपासिद्ध जैसे शब्द अनित्य है, चाक्षुष [ अर्थात् चक्षु से ग्राह्य ] होने से,
घट के समान । यहाँ चाक्षुषत्व हेतु है, और वह [ आश्रय या पक्ष रूप ] शब्द में
नहीं रहता । उस [ शब्द ] के श्रावण [ अर्थात् श्रोत्र ग्राह्य ] होने से ।
[ असिद्ध का तीसरा भेद 'व्याप्यत्वासिद्ध' है। जिसकी व्याप्ति सिद्ध न हो
उसको व्याप्यत्वासिद्ध कहते हैं ] व्याप्यत्वासिद्ध दो प्रकार का होता है। एक

६२ तर्कभाषा [ व्याप्यत्वासिद्धः
स्तूपधिसद्भावात् । तत्र प्रथमो यथा, शब्दः क्षणिकः सत्त्वात् । यत्सत्
तत्क्षणिकं यथा जलधरपटलं तथा च शब्दादिति । न च सत्त्वक्षणिक-
त्वयोर्व्याप्तिग्राहकं प्रमाणमस्ति । सोपाधिकतया व्याप्यत्वासिद्धौ उच्य-
मानायां क्षणिकत्वमन्यप्रयुक्तमित्यभ्युपगतं स्यात् ।
'व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात् ।' अर्थात् व्याप्तिग्राहक प्रमाण का अभाव होने से और
दूसरा उपाधि का सद्भाव होने से । उनमें से प्रथम [ व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात्
व्याप्यत्वासिद्ध का उदाहरण ] जैसे शब्द क्षणिक है सत् होने से । जो सत् होता है
वह क्षणिक होता है जैसे मेघसमूह । शब्द भी वैसा [ मेघसमूह के समान सत् ]
ही है। और [यहाँ यत्सत् तत्क्षणिकं जो सत् है वह क्षणिक होता है यह सत्त्व और
क्षणिकत्व की व्याप्ति बनती है परन्तु इस ] सत्त्व तथा क्षणिकत्व की व्याप्ति का
ग्राहक कोई प्रमाण नहीं है [ उसके विपरीत प्रत्यक्ष रूप से घटादि सत् पदार्थ
स्थिर ही दिखाई देते हैं। इसलिए व्याप्तिग्राहक प्रमाण के अभाव में यह सत्त्व
हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास होता है।] सोपाधिक होने से यदि इसको व्याप्यत्वा-
सिद्ध कहा जाय तो [ शब्दादि में ] अन्य [ उपाधिभूत धर्म ] प्रयुक्त क्षणिकत्व
है यह मानना होगा । [ जो कि नैयायिकों को अभीष्ट नहीं है ]
इसका अभिप्राय यह है कि 'व्याप्यत्वासिद्ध' दो प्रकार का माना है । एक
व्याप्ति-ग्राहक-प्रमाण के अभाव में और दूसरा उपाधि के सद्भाव में । उनमें
से व्याप्ति-ग्राहक-प्रमाणाभाव वाले 'व्याप्यत्वासिद्ध' का उदाहरण यह दिया है ।
यहाँ शङ्का यह हो सकती है कि इसको भी 'उपाधिसद्भावमूलक' 'व्याप्यत्वासिद्ध'
ही क्यों न मान लिया जाय । इसका उत्तर यह है कि उपाधि स्थल में साध्य का
अस्तित्व तो स्वीकार करना ही होता है। अन्तर केवल इतना होता है कि उस
साध्य का प्रयोजक या कारण हेतु रूप में प्रयुक्त धर्म नहीं, अपितु उपाधिभूत
धर्म होता है । जैसे ऊपर पृष्ठ ७५ पर दिए हुए 'स श्यामः, मैत्रीतनयत्वात्,
परिदृश्यमानमैत्रीतनयस्तोमवत्' इत्यादि उदाहरणों में श्यामत्व का प्रयोजक 'मैत्री-
तनयत्व' को नहीं अपितु 'उपाधिभूत' 'शाकपाकजन्यत्व' को माना जाता है। इसी
प्रकार यहाँ यदि सत्त्व और क्षणिकत्व की व्याप्ति में कोई उपाधिभूत धर्म बनाया
जाय तो उसका परिणाम यह होगा कि जैसे मैत्री के तनयों में रहने वाले श्यामत्व
का प्रयोजक 'मैत्रीतनयत्व' न होकर 'शाकपाकजन्यत्व' को मानते हैं। इसी प्रकार
यहाँ क्षणिकत्व का प्रयोजक सत्त्व के बजाय किसी अन्य धर्म को माना जायगा।
परन्तु सिद्धान्त पक्ष यह है कि उदाहरणभूत घटादि में क्षणिकत्व ही नहीं
है। यदि सत्त्व हेतु को सोपाधिक कहेंगे तो घटादि में क्षणिकत्व तो है परन्तु
उसका कारण या प्रयोजक सत्त्व नहीं अपितु अन्य कोई उपाधिभूत धर्म है यह

व्याप्यत्वासिद्धः ] अनुमाननिरूपणम् ६३
द्वितीयो यथा ऋत्वन्तर्वर्तिनी हिंसा अधर्मसाधनं, हिंसात्वात्, क्रतु-
बाह्यहिंसावत् । अत्र ह्यधर्मसाधनत्वे हिंसात्वं न प्रयोजकं किंतु निषिद्धत्व-
मेव प्रयोजकम् , उपाधिरिति यावत् । तथा हि 'साध्यव्यापकत्वे सति साधना-
व्यापक' उपाधिरित्युपाधिलक्षणम् । तच्चास्ति निषिद्धत्वे । निषिद्धत्वं हि
साध्यस्याधर्मसाधनत्वस्य व्यापकम् । यतो यत्र यत्राधर्मसाधनत्वं तत्र
तत्रावश्यं निषिद्धत्वमपीति । एवं साधनं हिंसात्वं, न व्याप्नोति निषि-
द्धत्वम् । न हि यत्र यत्र हिंसात्वं तत्र तत्रावश्यं निषिद्धत्वं, यज्ञीयपशु-
हिंसाया निषिद्धत्वाभावात् । तदेवं निषिद्धत्वस्योपाधेः सद्भावादन्यप्रयुक्त-
व्याप्त्युपजीवि हिंसात्वं व्याप्यत्वासिद्धमेव ।
अर्थ होगा । जो अभीष्ट नहीं है । अतः इसको 'उपाधिसद्भावात् व्याप्यत्वासिद्ध'
न मान कर 'व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात्' ही व्याप्यत्वासिद्ध मानना चाहिए ।
यह सिद्धान्तपक्ष का अभिप्राय है ।
आगे 'उपाधि सद्भाव' से होनेवाले 'व्याप्यत्वासिद्ध' का उदाहरण देते हैं—
दूसरा [अर्थात् 'उपाधिसद्भावात् व्याप्यत्वासिद्ध' का उदाहरण] जैसे यज्ञ के
मध्य में की गई हिंसा अधर्मजनिका है, हिंसा होने से, यज्ञ [क्रतु] से बाहर की
हिंसा के समान । यहाँ अधर्मसाधनत्व में हिंसात्व प्रयोजक नहीं है किन्तु निषिद्धत्व ही
[प्रयोजक है। और उस प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं। इसलिए वह निषिद्धत्व
ही यहाँ] प्रयोजक अर्थात् उपाधि है । क्योंकि साध्य का व्यापक होने पर [भी
जो] साधन का अव्यापक हो वह उपाधि है यह उपाधि का लक्षण है। और वह
[साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्व रूप उपाधि लक्षण] निषिद्धत्व में [पाया
जाता] है। निषिद्धत्व साध्यरूप अधर्मसाधनत्व का व्यापक है क्योंकि जहाँ जहाँ
अधर्मसाधनत्व होता है वहाँ वहाँ निषिद्धत्व भी अवश्य होता है [यह साध्य
व्यापकत्व हुआ] इसी प्रकार साधनभूत हिंसात्व का व्यापक निषिद्धत्व नहीं होता
[अर्थात् जहाँ जहाँ हिंसात्व है वहाँ वहाँ निषिद्धत्व भी अवश्य हो यह बात नहीं
है] यज्ञीय पशु-हिंसा के [विहित होने से] निषिद्ध न होने से। [यह
साधनाव्यापकत्व हुआ। इस प्रकार 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वम्' रूप
उपाधि का लक्षण निषिद्धत्व में घट जाता है इसलिए निषिद्धत्व उपाधि है] इस
प्रकार निषिद्धत्व उपाधि के विद्यमान होने से अन्य प्रयुक्त [अर्थात् निषिद्धत्व
प्रयुक्त] व्याप्ति के आश्रित रहनेवाला हिंसात्व [हेतु] 'व्याप्यत्वासिद्ध' ही है।
[निषिद्धत्व ही वस्तुतः अधर्मजनकत्व का प्रयोजक है। वह निषिद्धत्व का अधर्म-
जनकत्व धर्म यहाँ हिंसात्व में प्रतीत होता है। इसलिए 'उप' अर्थात् अपने समीप-

उपजोवि?
In Sanskrit, the text of Tarkabhāṣā is:
"तदुक्तम्—अन्यप्रयुक्तव्याप्त्युपजीवि हिंसात्वम् इति।"
Keshavamishra literally writes: anyaprayukta-vyāpty-upajīvi hiṁsātvam!
And the typesetter set उपजीवि!
Wait, look at the dot or hook:
Ah, look closely at उपजीवि vs उपजोवि:
Between प and वि: it is जी!
Wait, why did I think it was जो? Because the top arch in this typeface is somewhat flat, like in many lead types where ी is slightly shallow. But it is definitely intended as उपजीवि or is it उपजीवि? Wait, let me look at जो in सोऽसाधा- (L8) or शब्दो (L2, L7):
In शब्दो (L2), दो: the matra has a straight diagonal stroke with a flag/blob at the top.
In उपजीवि (L14), the stroke curves over ज!
Therefore, it is उपजीवि!

  • Let's check L22 again:
    `[ तीनों ] में रहने वाला [अर्थात् विपक्षव्यावृत्तत्व धर्म से रहित] साधारणनैका

कालात्ययापदिष्टः ] अनुमाननिरूपणम् ६५
विद्यते । स यथा शब्दोऽनित्यो नित्यधर्मरहितत्वात् । शब्दो नित्योऽनि-
त्यधर्मरहितत्वादिति । अयमेव हि सत्प्रतिपक्ष इति चोच्यते ।
५ पक्षे प्रमाणान्तरावधृतसाध्याभावो हेतुर्बाधितविषयः । कालात्यया-
पदिष्ट इति चोच्यते । यथा अग्निरनुष्णः कृतकत्वाज्जलवत् । अत्र हि
कृतकत्वस्य हेतोः साध्यमनुष्णत्वं तदभावः प्रत्यक्षेणैवावधारितः स्पार्शन-
प्रत्यक्षेणैवोष्णत्वोपलम्भात् ।
है अनित्य धर्म से रहित होने से । यह [ है ] । यही [ प्रकरणसम ] सत्प्रतिपक्ष-
भी कहलाता है ।
यहाँ पहिले अनुमान में नित्यधर्मरहितत्वात् और दूसरे अनुमान में अनित्य-
धर्मरहित्वात् यह दोनों हेतु एक दूसरे के साध्य से विपरीत अर्थ को सिद्ध करते
हैं । एक शब्द में नित्यत्व सिद्ध करना चाहता है और दूसरा उसी शब्द में
अनित्यत्व सिद्ध कर रहा है । इसलिए साध्यविपरीतसाधक तुल्यबल दूसरे हेतु
के विद्यमान होने से यह दोनों हेतु परस्पर 'सत्प्रतिपक्ष' हेत्वाभास कहलाते हैं ।
और उनमें से कोई भी अपने साध्य को सिद्ध करने में समर्थ नहीं होता ।
इसमें दोनों हेतुओं का तुल्य बल होना आवश्यक है अन्यथा एक के दुर्बल और
दूसरे के प्रबल होने पर 'सत्प्रतिपक्ष' नहीं होगा । क्योंकि उनमें से प्रबल हेतु
'उपजीव्य' होने से उपजीवक दुर्बल का सदा बाध ही करेगा । अर्थात् दुर्बल
उपजीवक सदा बाध्य और प्रबल उपजीव्य सदा बाधक ही होगा । दुर्बल और
प्रबल में पक्ष प्रतिपक्ष भाव नहीं होता। अतः तुल्यबल विरोधी हेतु ही 'प्रतिपक्ष'
कहलाता है । इस हेत्वाभास को 'प्रकरणसम' और सत्प्रतिपक्ष' दोनों नामों
से कहा जाता है । इसी प्रकार 'अनैकान्तिक' को भी 'सव्यभिचार' तथा
'अनैकान्तिक' दोनों नामों से कहा जाता है । और अगले 'कालात्ययापदिष्ट'
को भी 'कालात्ययापदिष्ट' तथा 'बाधितविषय' इन दोनों नामों से कहा जाता है।
इस प्रकार अन्तिम तीन हेत्वाभासों के दो-दो नाम हैं। आगे 'बाधितविषय'
नामक पञ्चम हेत्वाभास का निरूपण करते हैं ।
[ जिस हेतु के ] पक्ष में किसी अन्य [ प्रबलतर ] प्रमाण से साध्य का
अभाव निश्चित हो गया है वह 'बाधित विषय' [ हेत्वाभास ] है । और
'कालात्ययापदिष्ट' [ हेत्वाभास ] कहलाता है । जैसे अग्नि अनुष्ण [ अर्थात्
शीतल ] है, कृतक [ जन्य ] होने से, जल के समान। यहाँ कृतकत्व हेतु का साध्य
अनुष्णत्व, उसका अभाव [ अर्थात् उष्णत्व का अग्नि रूप पक्ष में ] प्रत्यक्ष
[ प्रमाण ] से ही निश्चित हो चुका है । [ क्योंकि पक्षभूत अग्नि में ] स्पार्शन
[ त्वाच ] प्रत्यक्ष से ही उष्णत्व का ग्रहण होने से ।

६६ तर्कभाषा [ अनुमाने टिप्पण्यः
इति व्याख्यातमनुमानम् ।
'बाधितविषय' में 'विषय' शब्द का अर्थ है 'साध्य' । जिस हेतु के साध्य
का अभाव किसी अन्य प्रमाण से पक्ष में गृहीत हो वह हेतु 'बाधितविषय'
कहा जाता है और उसका दूसरा नाम 'कालात्ययापदिष्ट' भी होता है ।
इस प्रकार अनुमान [ प्रमाण ] की व्याख्या हो गई ।
१ अनुमान की आवश्यकता,
प्रत्यक्ष प्रमाण की सत्ता के विषय में कोई विवाद नहीं है । आस्तिक-
नास्तिक सभी प्रकार के दार्शनिक प्रत्यक्ष प्रमाण की सत्ता स्वीकार करते हैं ।
परन्तु अनुमान के विषय में यह बात नहीं है । चार्वाक लोग अनुमान प्रमाण
का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते हैं । इसलिए अनुमान प्रमाण के विषय में
विचार करने से पूर्व उसकी आवश्यकता पर विचार कर लेना आवश्यक है ।
इस दृष्टि से श्री वाचस्पति मिश्र आदि ने चार्वाक के लिए भी अनुमान की
सत्ता को स्वीकार करना अपरिहार्य बतलाया है । उनका कहना है कि जब
चार्वाक किसी से यह कहता है कि अनुमान प्रमाण नहीं है तब उससे यह
पूछना चाहिए कि वह ऐसा उस विशेष व्यक्ति से क्यों कहता है । इसका
उत्तर वह यही दे सकता है कि यह व्यक्ति अनुमान प्रमाण को मानता है
इसलिए इस विषय में इसके भ्रम अथवा सन्देह को मिटाने के लिए मैं इसको
समझा रहा हूँ कि अनुमान प्रमाण नहीं है ।
इस पर चार्वाक से दूसरा प्रश्न यह करना चाहिए कि आपको यह कैसे
मालूम हुआ कि यह व्यक्ति अज्ञान, सन्देह अथवा भ्रम में है । दूसरे पुरुष में
रहने वाले अज्ञान सन्देह अथवा विपर्यय का ग्रहण करने का आपके पास क्या
साधन है । इसके उत्तर में वह यही कह सकता है कि इसके वचनों से यह
प्रतीत होता है कि यह व्यक्ति अज्ञान, सन्देह अथवा विपर्यय-भ्रम में है । तब
उससे यह कहना चाहिए कि शब्द विशेष अथवा वचन भेद से जो दूसरे व्यक्ति के
अज्ञान, सन्देह अथवा विपर्यय का ज्ञान है वह प्रत्यक्ष तो नहीं कहा जा सकता
है । क्योंकि परपुरुषगत अज्ञान, सन्देह, विपर्यय आदि का किसी लौकिक पुरुष
को प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । अतएव इसके जानने का मार्ग उसके वचन भेद
रूप लिङ्ग के अतिरिक्त दूसरा नहीं है । और लिङ्ग दर्शन से होने वाला ज्ञान
ही 'लैङ्गिक' अथवा अनुमान कहलाता है । अतएव परपुरुषगत अज्ञान, सन्देह

अनुमाने टिप्पणयः ] अनुमाननिरूपणम् ६७
विपर्यय का ग्रहण अनुमान से ही होता है । इसलिए जब चार्वाक दूसरे को
यह कहता है कि अनुमान प्रमाण नहीं है तब वह उसके अज्ञान, सन्देह या
विपर्यय का अनुमान करके ही ऐसा कहता है। उस दशा में उसके लिए अनु-
मान प्रमाण मानना अपरिहार्य है। और यदि परपुरुषगत अज्ञान, सन्देह या
विपर्यय के जाने बिना वह यों ही किसी को पकड़ कर कहने लगता है कि भाई
अनुमान प्रमाण नहीं है तो वह उन्मत्त ही समझा जायगा। इसलिए किसी के
साथ इस विषय में बुद्धिपूर्वक बात करने के लिए उसके अज्ञान, सन्देह या
विपर्यय आदि का ज्ञान आवश्यक है। और उसके ज्ञान के अनुमान को छोड़
कर दूसरा कोई साधन नहीं है। इसलिए 'अकामेनापि अनुमानं प्रमाणमभ्यु-
पेयम्' । न चाहते हुए भी चार्वाक को अनुमान प्रमाण मानना ही होगा ।
एक बात और भी है। चार्वाक केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है और
जो चीज प्रत्यक्ष नहीं उसका अस्तित्व नहीं मानना चाहता है। ऐसी दशा में घर
से बाहर आने पर चार्वाक को अपने गृहजनों का प्रत्यक्ष नहीं होता। तब क्या
उनका अभाव माना जायगा । इसलिए भी उसका कहना ठीक नहीं है।
इस विषय को हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इस प्रकार सङ्कलित किया है ।
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाकैः प्रमाणं यैस्तु मन्यते ।
अभ्युपेयमकामैरप्येतैरनुमानं परम् ॥ १ ॥
अदृष्टा अपि सन्त्यर्था गृहे दारा इव ध्रुवम् ।
अन्यथास्मिन् बहिर्याते किं विनष्टं नु तत्कुलम् ॥ २ ॥
पुरुषान्तरसंवादे कथं वाऽसौ प्रवर्तते ।
यदि तेषां गृहीतं स्याद् विषये नोऽज्ञानादिकम् ॥ ३ ॥
पुरुषान्तरसन्देहोऽज्ञानं वाऽथ विपर्ययः ।
प्रत्यक्षेण ग्रहीतुं तु न शक्यं लौकिकैर्जनैः ४ ॥
अधृताज्ञानसन्देहश्चेत् कथायां प्रवर्तते ।
उन्मत्तवदुपेक्ष्योऽसौ तदा सञ्जायते ध्रुवम् ॥ ५ ॥
वाक्यभेदादिलिङ्गाच्चेदनुमाय प्रवर्तते ।
पराऽज्ञानादिकं तस्मात् कथाऽप्यस्य प्रकल्पते ॥ ६ ॥
तस्मादनिच्छताऽप्यत्र मानमनुमानं ध्रुवम् ।
स्वीकार्यं नान्यथा तस्य व्यवहारोऽपि कल्पते १ ॥ ७ ॥
१ दर्शनमीमांसा ४।
७ त० भा०

६८ तर्कभाषा [ अनुमाने टिप्पण्यः
२ अनुमान का लक्षण और भेद ।
अनुमान प्रमाण के विषय में दार्शनिक जगत् में तीन प्रकार की परम्पराएँ
पाई जाती हैं। एक वैदिक-परम्परा, दूसरी बौद्ध-परम्परा और तीसरी नव्य न्याय
की परम्परा । अनुमान के लक्षण और भेदों का निरूपण सबसे पहिले वैदिक-
परम्परा में ही प्रारम्भ हुआ । इस वैदिक-परम्परा की भी दो धाराएँ मिलती
हैं । एक धारा तो वैशेषिक और मीमांसा की विचारधारा है और दूसरी धारा
में न्याय, सांख्य और चरक इन शास्त्रों का समावेश किया जा सकता है । इन
दोनों में भेद यह है कि वैशेषिक और मीमांसा वाली परम्परा में अनुमान के
दो भेद किए गए हैं और न्याय, सांख्य तथा चरक वाली परम्परा में दो के
स्थान पर तीन भेद किए गए हैं। पहिली वैशेषिक और मीमांसक परम्परा का
ज्ञान हमको 'प्रशस्तपादभाष्य' तथा 'शाबरभाष्य' में होता है। उन दोनों ने
अनुमान के दो भेद करते हुए लिखा है।
तत्तु द्विविधम्। प्रत्यक्षतो दृष्टसम्बन्धं सामान्यतो दृष्टसम्बन्धं च । [ मीमांसा१ ]
तत्तु द्विविधम् । दृष्टं सामान्यतो दृष्टं च । [ वैशेषिक२ ]
अर्थात् मीमांसा और वैशेषिक दोनों दर्शनों में अनुमान के दो भेद माने
हैं एक 'दृष्ट' अथवा 'प्रत्यक्षतो दृष्ट' और दूसरा 'सामान्यतो दृष्ट' । इन दोनों
दर्शनों में दूसरा भेद तो 'सामान्यतो दृष्ट' नाम से ही दोनों जगह कहा
गया है । परन्तु पहिले भेद को एक जगह 'प्रत्यक्षतो दृष्ट' तथा दूसरी जगह
केवल 'दृष्ट' शब्द से कहा गया है । परन्तु वह कोई विशेष महत्त्व की बात
नहीं है। दोनों लगभग समान ही हैं।
इसके विपरीत न्याय, सांख्य तथा चरक की परम्परा में अनुमान के तीन
प्रकारों का वर्णन पाया जाता है । न्याय-सूत्र में अनुमान का लक्षण तथा भेद
प्रदर्शित करते हुए लिखा है।
अथ३ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टं च ।
इस सूत्र में सूत्रकार ने अनुमान के १ 'पूर्ववत्', २ 'शेषवत्' और ३ 'सामान्यतो
दृष्ट' यह तीन भेद किए हैं। सांख्यकारिका में 'त्रिविधमनुमानमाख्यातम्'४ लिख कर
और उसकी टीका, माठरवृत्ति५ तथा चरक६ के सूत्रस्थान में भी 'प्रत्यक्षपूर्वं
त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते' लिखकर न्याय-सूत्र के अनुसार बिल्कुल इसी नाम से
१ शाबरभाष्य १।१।५ २ प्रशस्तपादभाष्य पृ० १०४
३ न्याय० १।१।५ ४ सांख्यकारिका ५ ।
५ माठरवृत्ति सां० का० ५ । ६ चरक सूत्रस्थान ११, २२

अनुमाने टिप्पणयः] अनुमाननिरूपणम् ६१
अनुमान के तीन भेद किये हैं। इस प्रकार वैदिक दर्शनों में यह दो प्रकार की
'द्विविध' और 'त्रिविध' भेद वाली परम्पराएँ पाई जाती हैं।
परन्तु श्री वाचस्पति मिश्र, जिन्होंने सभी दर्शनों पर टीकाएँ लिखी हैं इन
दोनों परम्पराओं का समन्वय करते हुए दिखाई देते हैं। उन्होंने अपनी 'सांख्य-
तत्त्वकौमुदी' में पांचवीं कारिका की टीका में पहिले वैशेषिक तथा मीमांसक-
परम्परा के अनुसार अनुमान के दो भेद किए। एक वीत और दूसरा अवीत।
'तत्र अन्वयमुखेन प्रवर्तमानं विधायकं वीतम्' । और 'निषेधमुखेन प्रवर्तमानम्
अविधायकमवीतम्' । अर्थात् अन्वयमुख से प्रवर्तमान विधायक अनुमान को
'वीत' अनुमान कहते हैं। और निषेधमुख से प्रवर्तमान अविधायक अनुमान
को अवीत' अनुमान कहते हैं। इनमें से जो 'अवीत' अनुमान है वही न्याय-
परम्परा का 'शेषवत्' है।
तत्रावीतं शेषवत् । शिष्यते परिशिष्यते इति शेषः। स एव विषयतया
यस्यास्त्यनुमानज्ञानस्य तच्छेषवत् । यदाहुः प्रसक्तप्रतिषेधे अन्यत्राप्रसङ्गाच्छि-
ष्यमाणे सम्प्रत्ययः परिशेषः' ।
अनुमान का दूसरा भेद 'वीत' है। सांख्यतत्त्वकौमुदी में इसके फिर दो भेद
किए गये हैं उनमें से एक को 'पूर्ववत्' तथा दूसरे को 'सामान्यतो दृष्ट' कहा है।
'वीतं च द्वेधा । पूर्ववत् सामान्यतो दृष्टं च । तत्रैकं दृष्टस्वलक्षणसामान्य-
विषयं तत्पूर्ववत्। पूर्वप्रसिद्धं दृष्टस्वलक्षणसामान्यमिति यावत् तदस्य विषयत्वेना-
स्त्यनुमानज्ञानस्येति पूर्ववत् । यथा धूमाद् वह्नित्वसामान्यविशेषः पर्वतेऽनुमीयते।
तस्य च वह्नित्वसामान्यस्य स्वलक्षणं वह्निविशेषो दृष्टो रसवत्याम् ।
अपरं च वीतं सामान्यतो दृष्टम्, अदृष्टस्वलक्षणसामान्यविषयं यथेन्द्रियविषय-
मनुमानम् । अत्र हि रूपादिज्ञानानां क्रियात्वेन करणत्वमनुमीयते । यद्यपि
करणत्वसामान्यस्य छिदादौ वाश्यादि स्वलक्षणमुपलब्धं, तथापि यज्जातीयस्य
रूपादिज्ञाने करणत्वमनुमीयते तज्जातीयस्य करणस्य न दृष्टं स्वलक्षणं प्रत्यक्षेण ।
इन्द्रियजातीयं हि तत्करणं, न चेन्द्रियत्वसामान्यस्य स्वलक्षणमिन्द्रियविशेषः
प्रत्यक्षगोचरोऽर्वाग्दृशां यथा वह्नित्वसामान्यस्य स्वलक्षणं वह्निः। सोऽयं पूर्ववतः
सामान्यतो दृष्टात् सत्यपि वीतत्वेन तुल्यत्वे विशेषः ।
इस प्रकार वाचस्पति मिश्र ने पहिले अनुमान के 'वीत' और 'अवीत' दो
भेद करके मीमांसा और वैशेषिक की द्विविध भेद वाली परम्परा का समन्वय
करने का प्रयत्न किया है। और उसके बाद त्रिविध भेद वाली न्याय तथा सांख्य-
परम्परा को प्रदर्शित किया है। वाचस्पति मिश्र का यह समन्वय केवल संख्या
१-२ सांख्यतत्त्वकौमुदी कारिका ५।

१०० तर्कभाषा अनुमाने टिप्पण्यः
भेद की सीमा तक ही रहता है अर्थ का समन्वय नहीं हो पाता है। क्योंकि
मीमांसा और वैशेषिक परम्परा में 'वीत' और 'अवीत' इन नामों तथा 'अवीत'
अर्थात् 'शेषवत्' इस भेद का उल्लेख नहीं मिलता है।
३-बौद्ध-परम्परा में अनुमान के भेद ।
अनुमान के विषय में दूसरी परम्परा बौद्धों की है। इस परम्परा में भी
दो प्रकार की धाराएँ पाई जाती हैं। प्रारम्भ में बौद्धों ने वैदिक-परम्परा का ही
अनुगमन किया है और न्यायसूत्र के अनुसार त्रिविध अनुमान का ही वर्णन
किया है। यह त्रिविध अनुमान का वर्णन बौद्धों के केवल एक ग्रन्थ 'उपायहृदयम्'
[ पृष्ठ १३ ] में पाया जाता है। 'उपायहृदयम्' को कुछ लोग नागार्जुनकृत
मानते हैं। यदि वह नागार्जुनकृत न हो, तो भी वह दिङ्नाग का पूर्ववर्ती अवश्य
होना चाहिए। इस प्रकार दिङ्नाग के पूर्व ईसा की चौथी शताब्दी तक बौद्ध
दार्शनिक भी न्याय की वैदिक-परम्परा का ही अनुगमन करते रहे। ईसा की
पाँचवीं शताब्दी में आचार्य दिङ्नाग ने, जो कि वस्तुतः बौद्ध न्याय के जन्म-
दाता हैं, इस विषय में भी वैदिक-परम्परा से भिन्न अपनी स्वतन्त्र नई परम्परा
स्थापित की और न्याय-परम्परा से भिन्न प्रकारसे अनुमान के लक्षण, भेद आदि
किए। आगे सभी बौद्ध दार्शनिकों ने दिङ्नाग की नवीन पद्धति को अपनाया है !
४-तर्कभाषा में अनुमान के भेद—
प्रकृत तर्कभाषा ग्रन्थ में अनुमान के पूर्ववत्, शेषवत्, सामान्यतो दृष्ट भेद
नहीं दिखलाए हैं। अपितु उनके स्थान पर स्वार्थानुमान और परार्थानुमान यह
दो भेद दिखलाए हैं। यह भेद मुख्यतः और स्पष्टतः वैशेषिक-परम्परा में प्रति-
पादित किए हैं।
पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानम्। पञ्चाव-
यवेनैव वाक्येन संशयितविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां परेषां स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं
परार्थानुमानं विज्ञेयम्¹।
बौद्धों ने भी स्वार्थानुमान और परार्थानुमान के इस भेदको अपनाया है।
और उनके अनुमान के लक्षण पर भी वैशेषिक की छाया दिखाई देती है।
वैशेषिक दर्शन में अनुमान को 'लैङ्गिक' पद से निर्दिष्ट किया है। और
'लिङ्गदर्शनात् संजायमानं लैङ्गिकम्' यह उसका लक्षण किया है। बौद्धों के
'अनुमानं लिङ्गादर्थदर्शनम्²' इस लक्षण पर वैशेषिक के पूर्वोक्त 'लिङ्गदर्शनात्
संजायमानं लैङ्गिकम्' इस लक्षण की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। और
१ प्रशस्तपाद भाष्य पृ० ११३ । २ न्याय प्र० पृ० ७, न्यायबिन्दु २।३, तत्त्व-
संग्रहकारिका १३६२ ।

द्वादश प्रमेय विचार: आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि व अपवर्ग

अनुमाने टिप्पणयः ] अनुमाननिरूपणम् १०१
उनके स्वार्थानुमान तथा परार्थानुमान भेदों पर भी वैशेषिक की
छाया स्पष्ट है । इस प्रकार यद्यपि बौद्ध दार्शनिकों ने न्याय-परम्परा के
अनुमान, लक्षण तथा भेदों का खण्डन करने का प्रबल प्रयत्न किया है फिर
भी वह वैदिक-परम्परा के प्रभाव से अपने को बचा नहीं सके हैं। न्याय-पर-
म्परा के 'अथ तत्पूर्वकमनुमानम्' इस लक्षण और 'त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेष-
वत्सामान्यतो दृष्टं च' इन भेदोंको स्वीकार न करने पर भी वैशेषिक-प्रतिपादित
अनुमान-लक्षण और भेदोंका अनुगमन उन्होंने किया ही है ।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इस विषय का सङ्कलन इस प्रकार किया है ।
द्वैध¹मत्रानुमानं यत्, परार्थस्वार्थभेदतः ।
संविभक्तं तदन्यत्र चान्यथा तु द्विधा त्रिधा ॥ १ ॥
पूर्ववच्छेषवच्चैव दृष्टं सामान्यतस्तथा ।
सूत्रकारेण न्याये तु भेदस्तस्य त्रिधा कृतः ॥ २ ॥
सांख्ये वीतमवीतं च पूर्वं तावद् द्विधा कृतम् ।
वीतं पुनर्द्विधा कृत्वा तृतीयं शेषवन्मतम् ॥ ३ ॥
तत्र न्यायस्य भेदानां व्याख्या भाष्ये द्विधा कृता ।
न्याय एव तयोराद्या परा सांख्येऽपि सम्मता ॥ ४ ॥
त्रिविधभेदों की न्यायाभिमत प्रथम व्याख्या—
पूर्ववत् कारणज्ञानात् कार्य यदनुमीयते ।
भाविवृष्टेर्यथा ज्ञानं मेघैर्मेदुरितेऽम्बरे ॥ ५ ॥
कार्याद्धेतोश्च यज्ज्ञानं 'शेषवत्' तत्प्रकीर्तितम् ।
भूतवृष्टेर्यथा ज्ञानं स्रोतोभेदादिभिर्भवेत् ॥ ६ ॥
कार्यकारणभावादि सम्बन्धेतरहेतुकम् ।
ज्ञानं 'सामान्यतो दृष्टं' गतिमच्चन्द्रतारकम् ॥ ७ ॥
इतीयं प्रथमा व्याख्या प्रायो न्याये समाहृता ।
क्वचित् सांख्येऽपि संदृष्टा परा सांख्यानुगापि च ॥ ८ ॥
त्रिविध भेदों की न्यायोक्त तथा सांख्याभिमत द्वितीय व्याख्या—
'पूर्ववद्' धूमवह्न्याद्योः पूर्वं प्रत्यक्षभूतयोः ।
वह्नेरनुमानं धूमात्, सांख्ये दृष्टस्वलक्षणम् ॥ ९ ॥
इन्द्रियाद्यनुमानं च करणत्वादिहेतुकम् ।
न्याये 'सामान्यतो दृष्टं' सांख्येऽदृष्टस्वलक्षणम् ॥ १० ॥
१ दर्शनमीमांसा ४ ।

१०२ तर्कभाषा [अनुमाने टिप्पण्यः
प्रसक्तप्रतिषेधे यत् परिशेषान्नियम्यते ।
सांख्येऽवीतं तु तत्प्रोक्तं न्याये तच्छेषवन्मतम् ॥ ११ ॥
द्विविध भेदवादी मत-
जैमिनीये च काणादे शेषवन्न समीरितम् ।
दृष्टं, सामान्यतो दृष्टं, संविभक्तमिति द्विधा ॥ १२ ॥
जैनैर्बौद्धैस्तथा नव्यैरनुमाननिरूपणे ।
द्वौ तु तस्य कृतौ भेदौ नूनं स्वार्थपरार्थकौ ॥ १३ ॥
५—परार्थानुमान के पञ्चावयव—
वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में जो परार्थानुमान का लक्षण किया है
उसमें पञ्चावयवों का उल्लेख किया है । ‘पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थ-
प्रतिपादनं परार्थानुमानम्’ । तर्कभाषा में भी इसी प्रकार परार्थानुमान का लक्षण
किया है । उन पाँच अवयवों के नाम—१ प्रतिज्ञा, २ हेतु, ३ उदाहरण,
४ उपनयन और ५ निगमन हैं । इन पाँच अवयवों का इन्हीं नामों से न्याय-
सूत्र में उल्लेख किया गया है ।
‘प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः ।
परन्तु वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में उनके नाम—१ प्रतिज्ञा,
२ अपदेश, ३ निदर्शन, ४ अनुसन्धान और ५ प्रत्याम्नाय पाए जाते हैं ।
‘अवयवाः पुनः, प्रतिज्ञापदेशनिदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः ।
वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में एक विशेष बात और है कि न्याय-
दर्शन में तो केवल हेतु को दूषित मान कर हेत्वाभासोंका उल्लेख किया गया है।
तर्कभाषा में भी न्याय के अनुसार पाँच प्रकार के हेत्वाभासों का वर्णन किया
गया है । परन्तु प्रशस्तपाद भाष्य में हेत्वाभासों के अतिरिक्त प्रतिज्ञाभास तथा
निदर्शनाभासों का वर्णन भी किया है ।
‘तत्रानुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा ।····अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमानाभ्यु-
पगतस्वशास्त्रस्ववचनविरोधिनी निरस्ता भवन्ति । १ यथानुष्णोऽग्निरिति
प्रत्यक्षविरोधी । २ घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी । ३ ब्राह्मणेन सुरा पेये-
त्यागमविरोधी । ४ वैशेषिकस्य सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी ।
५ न शब्दोऽर्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी³ ।
१ न्याय दर्शन १, १, ३२ । २ प्रशस्त० पृ० ११४ ।
३ प्रशस्तपादभाष्य पृ० ११५ ।

अनुमाने टिप्पण्यः ] अनुमाननिरूपणम् १०३
इस प्रकार पाँच प्रकार के हेत्वाभासों के समान वैशेषिक प्रशस्तपाद भाष्य
में पाँच प्रकार के प्रतिज्ञाभासों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त
निदर्शनाभासों का भी वर्णन है।
अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति ।···
लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगतविपरीतानुगताः साधर्म्यनिदर्शनाभासाः।
लिङ्गानुमेयोभयव्यावृत्ताश्रयासिद्धव्यावृत्तविपरीतव्यावृत्ता वैधर्म्यनिदर्शनाभासाः।
अर्थात् १ लिङ्गासिद्ध, २ अनुमेयासिद्ध, ३ उभयासिद्ध, ४ आश्रयासिद्ध, ५
अननुगत, ६ विपरीतानुगत इस प्रकार ६ तरह के साधर्म्य निदर्शनाभास और
१ लिङ्गव्यावृत्त, २ अनुमेयव्यावृत्त, ३ उभयव्यावृत्त, ४ आश्रयासिद्धव्यावृत्त,
और ५ विपरीतव्यावृत्त यह पाँच प्रकार के वैधर्म्य निदर्शनाभास भी प्रशस्तपाद ने
प्रतिपादित किए हैं। इन प्रतिज्ञाभास और निदर्शनाभासों का उल्लेख न्याय में
नहीं पाया जाता है। इसीलिए न्यायप्रधान तर्कभाषा में भी उनका वर्णन नहीं
किया गया है।
६—पञ्चावयवों के प्रयोग में भेद—
न्याय और वैशेषिक दर्शनों में अनुमान के पाँच अवयवों का उल्लेख किया
गया है। परन्तु अन्य दर्शनों में इनके प्रयोग के विषय में कई मत पाए जाते
हैं। सांख्य के तार्किक, प्रतिज्ञा, हेतु और दृष्टान्त इन तीन अवयवों का ही प्रयोग
मानते हैं। इसका उल्लेख सांख्यकारिका की माठरवृत्ति की पाँचवीं कारिका में
मिलता है। प्रभाकर के अनुयायी मीमांसक शालिकनाथ ने अपनी 'प्रकरण-
पञ्चिका' में [पृष्ठ ८३, ८५] तथा कुमारिल भट्ट के अनुयायी मीमांसक पार्थसारथिमिश्र
ने 'श्लोकवार्तिक' की व्याख्या [अनुमान, श्लोक ५४] में तीन अवयवों के प्रयोग
को प्रतिपादित किया हैं। जैनों के आचार्य हेमचन्द्र तथा अनन्तवीर्य ने
मीमांसकों के चार अवयव मानने वाले किसी सम्प्रदाय का भी उल्लेख [प्रमेयर०
३, ३७] भी किया है परन्तु वैसा कोई प्रसिद्ध सम्प्रदाय नहीं मिलता है। क्योंकि
मीमांसकों के कुमारिलभट्ट तथा प्रभाकर दोनों के अनुयायी सम्प्रदाय, तीन अवयवों
का ही प्रयोग मानते हैं। बौद्ध तथा कुछ जैन तार्किक अधिक से अधिक हेतु तथा
दृष्टान्त दो अवयवों का [प्रमाणवार्तिक १, २८ स्याद्वाद र० पृ० ५५९] प्रयोग
मानते हैं अन्यथा केवल एक हेतु से भी काम चलाने का प्रतिपादन करते हैं।
[ प्रमाणवार्तिक १, २८ ] । जैन आचार्य माणिक्य नन्दी ने प्रदेश भेद की दृष्टि
से दो तथा पाँच अवयवों के प्रयोग की व्यवस्था का भी प्रतिपादन किया है।
उनके मतानुसार 'वाद' प्रदेश में तो पाँच अवयवों के प्रयोग का नियम समझना

१०४ तर्कभाषा [ अनुमाने टिप्पण्यः
चाहिए । परन्तु शास्त्र प्रदेश में अधिकारी के अनुसार दो अथवा पाँच अवयवों
का प्रयोग वैकल्पिक है। वादिदेव नामक जैन आचार्य, और बौद्ध आचार्य,
विशिष्ट विद्वानों के लिए, केवल हेतु मात्र एक अवयव का प्रयोग ही पर्याप्त
मानते हैं ।
इसके विपरीत न्याय दर्शन के 'वात्स्यायन भाष्य' में दश अवयव माननेवाले
किसी प्राचीन सम्प्रदाय का भी उल्लेख किया गया है ।
'दशावयवानेके नैयायिका वाक्ये संचक्षते, जिज्ञासा, संशयः, शक्यप्राप्तिः,
प्रयोजनं, संशयव्युदास' इति ।
न्याय में प्रतिपादित प्रतिज्ञादि पाँच अवयवों के अतिरिक्त यह जिज्ञासादि
पाँच और अवयव प्राचीन आचार्य मानते थे । उनका खण्डन कर, केवल पाँच
अवयवों की उपयोगिता न्याय में प्रतिपादित की गई है और वैशेषिक में भी
पाँच ही अवयव माने गए हैं ।
७-हेतु के पञ्च रूप—
अनुमान वाक्य के पाँच अवयवों के समान हेतु के १ पक्षसत्त्व, २ सपक्ष-
सत्त्व, ३ विपक्षव्यावृत्तत्व, ४ असत्प्रतिपक्षत्व और ५ अबाधितविषयत्व इन पाँच
रूपों का वर्णन भी तर्कभाषा में किया गया है । कोई अन्वयव्यतिरेकी सद्धेतु
इन पाँच रूपों से उपपन्न होने पर ही अपने साध्य को सिद्ध कर सकता है ।
यह न्याय का सिद्धान्त है । परन्तु हेतु के स्वरूप के विषय में भी अनेक मत हैं
जिन्हें हम मुख्यतः 'पञ्चरूपता' और 'त्रिरूपतावादी' दो वर्गों में विभक्त कर
सकते हैं । वैशेषिक, सांख्य और बौद्ध यह तीन दर्शन हेतु की त्रिरूपता को
मानते हैं । और नैयायिक पञ्चरूपतावादी हैं । वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद
भाष्य में हेतु या लिङ्ग का वर्णन करते हुए लिखा है—
२यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्विते ।
तदभावे च नास्त्येव तल्लिङ्गमनुमापकम् ॥
जो अनुमेय अर्थात् पक्ष से सम्बद्ध पक्षसत् , और तदन्वित अर्थात् सपक्ष
में प्रसिद्ध-सपक्षसत् हो और उसके अभाव अर्थात् विपक्ष सें न हो विपक्षव्यावृत्त
हो वही लिङ्ग अनुमापक होता है । इस प्रकार पक्षसत्त्व, और विपक्षव्यावृत्तत्व
यह तीन ही हेतु के धर्म वैशेषिक दर्शन में माने गए हैं ।
३विपरीतमतो यत्स्यादेकेन द्वितयेन वा
विरुद्ध|सिद्धसन्दिग्धमलिङ्गं काश्यपोऽब्रवीत् ? ॥
१ न्याय० शा० भा० १, १, ३२ । २, ३, प्रशस्तपाद पृ० ६०० ।

अनुमाने टिप्पण्यः ] अनुमाननिरूपणम् १०५
ऊपर उद्धृत दोनों कारिकाएँ प्रशस्तपाद भाष्य में पाई जाती हैं जिससे
विदित होता है कि प्रशस्तपाद ने किसी अपने पूर्ववर्ती काश्यपाचार्य के मता-
नुसार इस त्रैरूप्य-सिद्धान्त का विवेचन किया है। प्रसिद्ध रूसी विद्वान् प्रो०
श्चेरबात्स्की ने अपनी 'बुद्धिस्ट लाजिक' नामक पुस्तक के [पृ० २४] में यह प्रति-
पादन किया है कि त्रैरूप्य-सिद्धान्त के सम्बन्ध में वैशेषिक के ऊपर बौद्धों का
प्रभाव पड़ा है। बौद्धों के अभिधर्मकोश, प्रमाणसमुच्चय, न्यायप्रवेश [पृ०
१] न्यायबिन्दु [२,५] हेतुबिन्दु [पृ० ९] और तत्त्वसंग्रह [कारिका
५३६२] आदि सभी ग्रन्थों में त्रैरूप्य-सिद्धान्त का ही समर्थन किया गया है
और न्यायसम्मत पञ्चरूपता का खण्डन किया गया है। सांख्यकारिका की
माठरवृत्ति में भी पाँचवीं कारिका की व्याख्या में इसी त्रैरूप्यसिद्धान्त का सम-
र्थन किया गया है। इस प्रकार वैशेषिक, सांख्य तथा बौद्ध दर्शन हेतु के पक्ष-
सत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षव्यावृत्तत्व इन तीन धर्मों को ही स्वीकार करते हैं।
न्याय-परम्परा में इन तीन रूपों के अतिरिक्त अबाधितविषयत्व और
असत्प्रतिपक्षत्व इन दो रूपों को और सम्मिलित कर हेतु की पञ्चरूपता का
प्रतिपादन किया गया है। इस पञ्चरूपता-सिद्धान्त के प्रथम 'प्रवर्तक' कदाचित्
श्री उद्योतकराचार्य रहे हों। उनके बाद वाचस्पतिमिश्र तथा जयन्त भट्ट आदि
ने भी इस पञ्चरूपता का समर्थन किया है। और तर्कभाषा में भी उन पाँच
रूपों का वर्णन किया गया है। परन्तु यह पञ्चरूपता का सिद्धान्त न्याय-पर-
म्परा में भी उतनी दृढ़ता से अथवा मृतकमुष्टि की भाँति स्थिर नहीं रहा है।
नव्य न्याय में गदाधर भट्टाचार्य आदि ने हेतु की गमकतोपयोगी व्याप्ति तथा
पक्षधर्मताको प्राधान्य प्रदान कर वस्तुतः हेतु की त्रिरूपता का ही पोषण किया है।
जिस प्रकार हेतु की त्रिरूपता और पञ्चरूपता के विषय में मतभेद है
उसी प्रकार हेत्वाभासों की संख्या के विषय में भी मतभेद है। वैशेषिक दर्शन
ने जब हेतु की त्रिरूपता का प्रतिपादन किया उसके साथ ही हेत्वाभासों की
भी त्रिरूपता का प्रतिपादन किया है। इसके विपरीत न्याय में हेतु की पञ्चरू-
पता स्वीकार की गई है अतएव उनके यहाँ हेत्वाभास भी पांच प्रकार के माने
गए हैं। हेत्वाभासों की संख्या हेतुरूपों के साथ सम्बद्ध है।
न्याय-दर्शन में पांच हेत्वाभासों के नाम सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम,
साध्यसम, और अतीत काल कहे गये हैं। इनमें से तर्कभाषा के असिद्ध के
स्थान पर साध्यसम को और कालात्ययापदिष्ट के स्थान पर अतीत काल को
रखा जा सकता है। परन्तु उनके स्वरूप में कुछ अन्तर रहेगा।

१०६ तर्कभाषा [ उपमानम्
उपमानम् ।
अतिदेशवाक्यार्थस्मरणसहकृतं गोसादृश्यविशिष्टपिण्डज्ञानमुपमानम् !
यथा गवयमजानन्नपि नागरिको 'यथा गौस्तथा गवय' इति वाक्यं कुत-
श्चिदारण्यकात्पुरुषाच्छ्रुत्वा वनं गतो वाक्यार्थं स्मरन् यदा गोसादृश्यवि-
शिष्टं पिण्डं पश्यति तदा तद्वाक्यार्थस्मरणसहकृतं गोसादृश्यविशिष्टपि-
ण्डज्ञानमुपमानमुपमितिकरणत्वात् । गोसादृश्यविशिष्टपिण्डज्ञानानन्तर-
मयमसौ गवयशब्दवाच्यः पिण्ड इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतीतिरूपमितिः ।
उपमाननिरूपण
प्रत्यक्ष तथा अनुमान के बाद तीसरा प्रमाण उपमान है। किसी नागरिक
पुरुष ने गवय अर्थात् नील गाय को कभी नहीं देखा। उसको किसी आरण्यक
पुरुष ने बताया कि 'यथा गौस्तथा गवयः' जैसी गाय होती है वैसा ही गवय
होता है। गौ के धर्म को गवय में अतिदेश करनेवाला 'यथा गौस्तथा गवयः'
यह वाक्य अतिदेश वाक्य कहलाता है। इसको सुनने के बाद कभी वह नाग-
रिक पुरुष जङ्गल में जाकर गोसदृश एक प्राणी को देखता है और उसके साथ
ही 'यथा गौस्तथा गवयः' इस अतिदेश वाक्य का उसको स्मरण हो आता है।
इस प्रकार अतिदेशवाक्यार्थस्मरणसहकृत-गोसादृश्य-पिण्ड का ज्ञान उसको
होता है। इसी का नाम उपमान प्रमाण है। इस उपमान प्रमाण का फल या
उपमिति है संज्ञा-संज्ञि सम्बन्ध की प्रतीति । अर्थात् अतिदेश-वाक्यार्थ-स्मरण-
सहकृत-सादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड के ज्ञान से नागरिक पुरुष को यह ज्ञान होता है
कि इसी प्राणी का नाम गवय है। यहाँ गोसादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड, संज्ञी है,
और गवय पद उसकी संज्ञा है। इस प्रकार संज्ञा तथा संज्ञी के सम्बन्ध की
प्रतीति उपमान प्रमाण का फल है।
अतिदेश वाक्य [ यथा गौस्तथा गवयः ] के अर्थ के स्मरण के साथ गोसा-
दृश्यविशिष्ट-पिण्ड [ अर्थात् गवय प्राणी ] का ज्ञान उपमान [ प्रमाण ] है। जैसे
गवय [ नील गाय ] को न जानने वाला नागरिक [ पुरुष ] भी किसी वनवासी
[ आरण्यक ] पुरुष से 'जैसी गाय होती है वैसा ही गवय होता है' यह वाक्य
सुन कर वन में जाकर वाक्यार्थ के स्मरण करते हुए जब गोसादृश्यविशिष्ट-
पिण्ड को देखता है [ अथवा उस पिण्ड को देख कर उस अतिदेश का जब उसको
स्मरण होता है ] तब उस वाक्यार्थ के स्मरणसहित उस गोसादृश्यविशिष्ट
पिण्ड का ज्ञान उपमिति [ संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतिपत्तिरूप फल ] का कारण
होने से उपमान प्रमाण [ कहलाता ] है। गोसादृश्यविशिष्ट-पिण्ड के ज्ञान के
बाद यह पिण्ड [ ही ] गवयपदवाच्य है इस प्रकार की संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध की

उपमानप्रयोजनम् ] उपमाननिरूपणम् १०७
सैव फलम् । इदन्तु प्रत्यक्षानुमानासाध्यप्रमासाधकत्वात् प्रमाणान्तर-
मुपमानमस्ति ।
इति व्याख्यातमुपमानम् ।
प्रतीति उपमिति है। वही [ उपमान प्रमाण का ] फल है। प्रत्यक्ष तथा
अनुमान से असाध्य प्रमा का साधन होने से उपमान अलग प्रमाण है।
उपमान की इस प्रकार व्याख्या हो गई है।
वैशेषिक, सांख्य तथा योग दर्शन में उपमान को अलग प्रमाण नहीं माना
गया है। वाचस्पतिमिश्र ने 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' में उपमान के स्वरूप के विषय
में तीन पक्ष दिखा कर उन तीनों अवस्थाओं में उसका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष,
अनुमान अथवा शब्द प्रमाण में कर लिया है। परन्तु उदयनाचार्य ने संज्ञा-
संज्ञि-सम्बन्ध के ग्रहण के लिए उपमान को आवश्यक माना है। हमने अपनी
दर्शनमीमांसा में उपमान का निरूपण इस प्रकार किया है।
प्रसिद्धार्थस्य साधर्म्यादप्रसिद्धप्रसाधनम् ।
उपमितिर्हेतुस्तस्या उपमानं सादृश्यधीः ॥ १ ॥
गवयं यो न जानाति गां जानाति स्वरूपतः ।
यथा गौर्गवयोऽप्येवं तं च कश्चिद् विबोधयेत् ॥ २ ॥
वनं प्राप्तो यदा पिण्डं पश्यति गोनिभं तु सः ।
संस्मरन्नतिदेशं तु गवयं निश्चिनोति तम् ॥ ३ ॥
तत्रातिदेशवाक्यार्थं उपमानं सादृश्यधीः ।
उपमितिः संज्ञासंज्ञिसम्बन्धस्य ग्रहस्तथा ॥ ४ ॥
उपमाने विप्रतिपत्तिं दर्शयति,
उपमानं पृथङ् मानं न्याये यत्तु प्रकीर्तितम् ।
न तत् सांख्ये न वा योगे न च वैशेषिके मतम् ॥ ५ ॥
अनुमानेऽथवा शब्दे क्वचित् प्रत्यक्षके तथा ।
अन्तर्भाव्य पृथक् तस्य प्रामाण्यं खण्डितं तु तैः ॥ ६ ॥
न्यायमतेन तदुपपादयति,
सम्बन्धस्य परिच्छेदः संज्ञायाः संज्ञिना सह ।
उपमानाद् भवेदाशु न तु शब्दादिभिस्तथा ॥ ७ ॥
तस्मादुपमानं न्याये प्रमाणन्तु पृथङ् मतम् ।
नान्तर्भावो भवेदस्य न्याय्यो न्यायनये क्वचित् ॥ ८ ॥

१०८ तर्कभाषा [ वाक्यलक्षणम्
शब्दः।
आप्तवाक्यं शब्दः । आप्तस्तु यथाभूतस्यार्थस्योपदेष्टा पुरुषः । वाक्यं
त्वाकाङ्क्षायोग्यतासन्निधिमतां पदानां समूहः। अतएव 'गौरश्वः पुरुषो हस्ती'
इति पदानि न वाक्यम् । परस्पराकाङ्क्षाविरहात् । 'वह्निना सिञ्चेदि'ति
न वाक्यं योग्यताविरहात् । नह्यग्निसकयोः परस्परान्वययोग्यतास्ति ।
तथाहि अग्निनेति तृतीयया सेकरूपं कार्यं प्रति करणत्वमग्नेः प्रतिपादितम् ।
न चाग्निः सेके करणीभवितुं योग्यः । तेन कार्यकारणभावलक्षणसम्बन्धे-
ऽग्निसकयोरयोग्यत्वादग्निना सिञ्चेदिति न वाक्यम् ।
एवमेकैकशः प्रहरे प्रहरे असहोच्चारितानि 'गामानय' इत्यादि पदानि
न वाक्यम् । सत्यामपि परस्पराकाङ्क्षायां सत्यामपि परस्परान्वययोग्य-
तायां परस्परसन्निध्याभावात् । यानि तु साकाङ्क्षाणि योग्यतावन्ति
सन्निहितानि पदानि तान्येव वाक्यम् । यथा—ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो
शब्दनिरूपणम्
प्रत्यक्ष, अनुमान तथा उपमान के बाद चौथा प्रमाण शब्द है । शब्द
प्रमाण में संकेतग्रह के अवसर पर अनुमान की आवश्यकता पड़ती है इसलिए
अनुमान के अनन्तर शब्द को रखा गया है । आगे शब्द प्रमाण का निरूपण
प्रारम्भ करते हैं ।
आप्त [ पुरुष के ] वाक्य [ को ] शब्द [ प्रमाण कहा जाता ] है । यथाभूत
अर्थ का उपदेश करनेवाला पुरुष आप्त [ कहलाता ] है [ और उसका वाक्य शब्द
प्रमाण है] आकांक्षा, योग्यता और आसत्ति से युक्त पदों के समूह को वाक्य कहते
हैं । इसलिए परस्पर आकांक्षा-विरहित होने से गाय, घोड़ा, मनुष्य, हाथी आदि
पद [ का समूह ] वाक्य नहीं है । [ इसी प्रकार ] योग्यता के अभाव होने से
अग्नि से सींचता है यह [ पदसमूह ] वाक्य नहीं है। अग्नि और सेचन में परस्पर
अन्वय की योग्यता नहीं है [ क्योंकि ] अग्नि से इस तृतीया [ विभक्ति ] से सेचन
रूप कार्य के प्रति अग्नि की करणता प्रतिपादित की है और अग्नि-सेचन का
करण होने योग्य नहीं है । इसलिए सेचन और अग्नि के कार्य-कारणभाव रूप
सम्बन्ध के अयोग्य होने से अग्नि से सींचता है। यह [ पदसमूह ] वाक्य नहीं है।
इसी प्रकार एक एक करके प्रहर-प्रहर के बाद अलग-अलग उच्चारित 'गाय को
ले आओ' इत्यादि पद [ समूह ] वाक्य नहीं है। [ उनमें ] परस्पर अन्वय की
आकांक्षा रहते हुए भी और परस्पर अन्वय की योग्यता होते हुए भी परस्पर
सन्निधि न होने से [ वे वाक्य नहीं कहलाते हैं ] जो आकांक्षा युक्त, योग्यता
युक्त, और सन्निधि युक्त पद हैं वे ही वाक्य [ कहलाते ] हैं। जैसे स्वर्ग की इच्छा