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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 330 में से

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पृष्ठ 160

कालात्ययापदिष्टः ] अनुमाननिरूपणम् ६५
विद्यते । स यथा शब्दोऽनित्यो नित्यधर्मरहितत्वात् । शब्दो नित्योऽनि-
त्यधर्मरहितत्वादिति । अयमेव हि सत्प्रतिपक्ष इति चोच्यते ।
५ पक्षे प्रमाणान्तरावधृतसाध्याभावो हेतुर्बाधितविषयः । कालात्यया-
पदिष्ट इति चोच्यते । यथा अग्निरनुष्णः कृतकत्वाज्जलवत् । अत्र हि
कृतकत्वस्य हेतोः साध्यमनुष्णत्वं तदभावः प्रत्यक्षेणैवावधारितः स्पार्शन-
प्रत्यक्षेणैवोष्णत्वोपलम्भात् ।
है अनित्य धर्म से रहित होने से । यह [ है ] । यही [ प्रकरणसम ] सत्प्रतिपक्ष-
भी कहलाता है ।
यहाँ पहिले अनुमान में नित्यधर्मरहितत्वात् और दूसरे अनुमान में अनित्य-
धर्मरहित्वात् यह दोनों हेतु एक दूसरे के साध्य से विपरीत अर्थ को सिद्ध करते
हैं । एक शब्द में नित्यत्व सिद्ध करना चाहता है और दूसरा उसी शब्द में
अनित्यत्व सिद्ध कर रहा है । इसलिए साध्यविपरीतसाधक तुल्यबल दूसरे हेतु
के विद्यमान होने से यह दोनों हेतु परस्पर 'सत्प्रतिपक्ष' हेत्वाभास कहलाते हैं ।
और उनमें से कोई भी अपने साध्य को सिद्ध करने में समर्थ नहीं होता ।
इसमें दोनों हेतुओं का तुल्य बल होना आवश्यक है अन्यथा एक के दुर्बल और
दूसरे के प्रबल होने पर 'सत्प्रतिपक्ष' नहीं होगा । क्योंकि उनमें से प्रबल हेतु
'उपजीव्य' होने से उपजीवक दुर्बल का सदा बाध ही करेगा । अर्थात् दुर्बल
उपजीवक सदा बाध्य और प्रबल उपजीव्य सदा बाधक ही होगा । दुर्बल और
प्रबल में पक्ष प्रतिपक्ष भाव नहीं होता। अतः तुल्यबल विरोधी हेतु ही 'प्रतिपक्ष'
कहलाता है । इस हेत्वाभास को 'प्रकरणसम' और सत्प्रतिपक्ष' दोनों नामों
से कहा जाता है । इसी प्रकार 'अनैकान्तिक' को भी 'सव्यभिचार' तथा
'अनैकान्तिक' दोनों नामों से कहा जाता है । और अगले 'कालात्ययापदिष्ट'
को भी 'कालात्ययापदिष्ट' तथा 'बाधितविषय' इन दोनों नामों से कहा जाता है।
इस प्रकार अन्तिम तीन हेत्वाभासों के दो-दो नाम हैं। आगे 'बाधितविषय'
नामक पञ्चम हेत्वाभास का निरूपण करते हैं ।
[ जिस हेतु के ] पक्ष में किसी अन्य [ प्रबलतर ] प्रमाण से साध्य का
अभाव निश्चित हो गया है वह 'बाधित विषय' [ हेत्वाभास ] है । और
'कालात्ययापदिष्ट' [ हेत्वाभास ] कहलाता है । जैसे अग्नि अनुष्ण [ अर्थात्
शीतल ] है, कृतक [ जन्य ] होने से, जल के समान। यहाँ कृतकत्व हेतु का साध्य
अनुष्णत्व, उसका अभाव [ अर्थात् उष्णत्व का अग्नि रूप पक्ष में ] प्रत्यक्ष
[ प्रमाण ] से ही निश्चित हो चुका है । [ क्योंकि पक्षभूत अग्नि में ] स्पार्शन
[ त्वाच ] प्रत्यक्ष से ही उष्णत्व का ग्रहण होने से ।