सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157

६२ तर्कभाषा [ व्याप्यत्वासिद्धः
स्तूपधिसद्भावात् । तत्र प्रथमो यथा, शब्दः क्षणिकः सत्त्वात् । यत्सत्
तत्क्षणिकं यथा जलधरपटलं तथा च शब्दादिति । न च सत्त्वक्षणिक-
त्वयोर्व्याप्तिग्राहकं प्रमाणमस्ति । सोपाधिकतया व्याप्यत्वासिद्धौ उच्य-
मानायां क्षणिकत्वमन्यप्रयुक्तमित्यभ्युपगतं स्यात् ।
'व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात् ।' अर्थात् व्याप्तिग्राहक प्रमाण का अभाव होने से और
दूसरा उपाधि का सद्भाव होने से । उनमें से प्रथम [ व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात्
व्याप्यत्वासिद्ध का उदाहरण ] जैसे शब्द क्षणिक है सत् होने से । जो सत् होता है
वह क्षणिक होता है जैसे मेघसमूह । शब्द भी वैसा [ मेघसमूह के समान सत् ]
ही है। और [यहाँ यत्सत् तत्क्षणिकं जो सत् है वह क्षणिक होता है यह सत्त्व और
क्षणिकत्व की व्याप्ति बनती है परन्तु इस ] सत्त्व तथा क्षणिकत्व की व्याप्ति का
ग्राहक कोई प्रमाण नहीं है [ उसके विपरीत प्रत्यक्ष रूप से घटादि सत् पदार्थ
स्थिर ही दिखाई देते हैं। इसलिए व्याप्तिग्राहक प्रमाण के अभाव में यह सत्त्व
हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास होता है।] सोपाधिक होने से यदि इसको व्याप्यत्वा-
सिद्ध कहा जाय तो [ शब्दादि में ] अन्य [ उपाधिभूत धर्म ] प्रयुक्त क्षणिकत्व
है यह मानना होगा । [ जो कि नैयायिकों को अभीष्ट नहीं है ]
इसका अभिप्राय यह है कि 'व्याप्यत्वासिद्ध' दो प्रकार का माना है । एक
व्याप्ति-ग्राहक-प्रमाण के अभाव में और दूसरा उपाधि के सद्भाव में । उनमें
से व्याप्ति-ग्राहक-प्रमाणाभाव वाले 'व्याप्यत्वासिद्ध' का उदाहरण यह दिया है ।
यहाँ शङ्का यह हो सकती है कि इसको भी 'उपाधिसद्भावमूलक' 'व्याप्यत्वासिद्ध'
ही क्यों न मान लिया जाय । इसका उत्तर यह है कि उपाधि स्थल में साध्य का
अस्तित्व तो स्वीकार करना ही होता है। अन्तर केवल इतना होता है कि उस
साध्य का प्रयोजक या कारण हेतु रूप में प्रयुक्त धर्म नहीं, अपितु उपाधिभूत
धर्म होता है । जैसे ऊपर पृष्ठ ७५ पर दिए हुए 'स श्यामः, मैत्रीतनयत्वात्,
परिदृश्यमानमैत्रीतनयस्तोमवत्' इत्यादि उदाहरणों में श्यामत्व का प्रयोजक 'मैत्री-
तनयत्व' को नहीं अपितु 'उपाधिभूत' 'शाकपाकजन्यत्व' को माना जाता है। इसी
प्रकार यहाँ यदि सत्त्व और क्षणिकत्व की व्याप्ति में कोई उपाधिभूत धर्म बनाया
जाय तो उसका परिणाम यह होगा कि जैसे मैत्री के तनयों में रहने वाले श्यामत्व
का प्रयोजक 'मैत्रीतनयत्व' न होकर 'शाकपाकजन्यत्व' को मानते हैं। इसी प्रकार
यहाँ क्षणिकत्व का प्रयोजक सत्त्व के बजाय किसी अन्य धर्म को माना जायगा।
परन्तु सिद्धान्त पक्ष यह है कि उदाहरणभूत घटादि में क्षणिकत्व ही नहीं
है। यदि सत्त्व हेतु को सोपाधिक कहेंगे तो घटादि में क्षणिकत्व तो है परन्तु
उसका कारण या प्रयोजक सत्त्व नहीं अपितु अन्य कोई उपाधिभूत धर्म है यह