तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याप्यत्वासिद्धः ] अनुमाननिरूपणम् ६३
द्वितीयो यथा ऋत्वन्तर्वर्तिनी हिंसा अधर्मसाधनं, हिंसात्वात्, क्रतु-
बाह्यहिंसावत् । अत्र ह्यधर्मसाधनत्वे हिंसात्वं न प्रयोजकं किंतु निषिद्धत्व-
मेव प्रयोजकम् , उपाधिरिति यावत् । तथा हि 'साध्यव्यापकत्वे सति साधना-
व्यापक' उपाधिरित्युपाधिलक्षणम् । तच्चास्ति निषिद्धत्वे । निषिद्धत्वं हि
साध्यस्याधर्मसाधनत्वस्य व्यापकम् । यतो यत्र यत्राधर्मसाधनत्वं तत्र
तत्रावश्यं निषिद्धत्वमपीति । एवं साधनं हिंसात्वं, न व्याप्नोति निषि-
द्धत्वम् । न हि यत्र यत्र हिंसात्वं तत्र तत्रावश्यं निषिद्धत्वं, यज्ञीयपशु-
हिंसाया निषिद्धत्वाभावात् । तदेवं निषिद्धत्वस्योपाधेः सद्भावादन्यप्रयुक्त-
व्याप्त्युपजीवि हिंसात्वं व्याप्यत्वासिद्धमेव ।
अर्थ होगा । जो अभीष्ट नहीं है । अतः इसको 'उपाधिसद्भावात् व्याप्यत्वासिद्ध'
न मान कर 'व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात्' ही व्याप्यत्वासिद्ध मानना चाहिए ।
यह सिद्धान्तपक्ष का अभिप्राय है ।
आगे 'उपाधि सद्भाव' से होनेवाले 'व्याप्यत्वासिद्ध' का उदाहरण देते हैं—
दूसरा [अर्थात् 'उपाधिसद्भावात् व्याप्यत्वासिद्ध' का उदाहरण] जैसे यज्ञ के
मध्य में की गई हिंसा अधर्मजनिका है, हिंसा होने से, यज्ञ [क्रतु] से बाहर की
हिंसा के समान । यहाँ अधर्मसाधनत्व में हिंसात्व प्रयोजक नहीं है किन्तु निषिद्धत्व ही
[प्रयोजक है। और उस प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं। इसलिए वह निषिद्धत्व
ही यहाँ] प्रयोजक अर्थात् उपाधि है । क्योंकि साध्य का व्यापक होने पर [भी
जो] साधन का अव्यापक हो वह उपाधि है यह उपाधि का लक्षण है। और वह
[साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्व रूप उपाधि लक्षण] निषिद्धत्व में [पाया
जाता] है। निषिद्धत्व साध्यरूप अधर्मसाधनत्व का व्यापक है क्योंकि जहाँ जहाँ
अधर्मसाधनत्व होता है वहाँ वहाँ निषिद्धत्व भी अवश्य होता है [यह साध्य
व्यापकत्व हुआ] इसी प्रकार साधनभूत हिंसात्व का व्यापक निषिद्धत्व नहीं होता
[अर्थात् जहाँ जहाँ हिंसात्व है वहाँ वहाँ निषिद्धत्व भी अवश्य हो यह बात नहीं
है] यज्ञीय पशु-हिंसा के [विहित होने से] निषिद्ध न होने से। [यह
साधनाव्यापकत्व हुआ। इस प्रकार 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वम्' रूप
उपाधि का लक्षण निषिद्धत्व में घट जाता है इसलिए निषिद्धत्व उपाधि है] इस
प्रकार निषिद्धत्व उपाधि के विद्यमान होने से अन्य प्रयुक्त [अर्थात् निषिद्धत्व
प्रयुक्त] व्याप्ति के आश्रित रहनेवाला हिंसात्व [हेतु] 'व्याप्यत्वासिद्ध' ही है।
[निषिद्धत्व ही वस्तुतः अधर्मजनकत्व का प्रयोजक है। वह निषिद्धत्व का अधर्म-
जनकत्व धर्म यहाँ हिंसात्व में प्रतीत होता है। इसलिए 'उप' अर्थात् अपने समीप-