तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० तर्कभाषा [ हेत्वाभासाः
के पुनः पक्ष-सपक्ष-विपक्षाः ? उच्यन्ते । सन्दिग्धसाध्यधर्मा धर्मी पक्षः।
यथा धूमानुमाने पर्वतः पक्षः । सपक्षस्तु निश्चितसाध्यधर्मा धर्मी । यथा
महानसो धूमानुमाने । विपक्षस्तु निश्चितसाध्याभाववान् धर्मी । यथा
तत्रैव महाह्रद इति ।
तदेवमन्वयव्यतिरेकि-केवलान्वयि-केवलव्यतिरेकिणो दर्शिताः ।
अतोऽन्ये हेत्वाभासाः । ते च असिद्ध-विरुद्ध-अनैकान्तिक-प्रकरणसम-काला-
त्यापदिष्टभेदात् पञ्चैव ।
तथा धूमाभाव रूप अभावों की होती है। केवलान्वयी में अन्वय व्याप्ति का ही
उदाहरण मिलता है, व्यतिरेक व्याप्ति का नहीं । इसलिए उसमें 'विपक्ष' कोई
होता ही नहीं । अतः विपक्ष के न होने से 'विपक्षव्यावृत्तत्व' रूप धर्म उसमें
नहीं बन सकता है । अतः वह चार रूप से ही युक्त होता है। इसी प्रकार
'केवलव्यतिरेकी' हेतु में व्यतिरेक व्याप्ति का ही उदाहरण मिलता है अन्वय-
व्याप्ति का नहीं । अतः उसका 'सपक्ष' कोई न होने से उसमें 'सपक्षसत्त्व' रूप
धर्म नहीं बन सकता है । अतः वह भी चार रूप से ही युक्त होता है। इस प्रकार
'अन्वयव्यतिरेकी' हेतु 'पञ्चरूपोपपन्न' होने पर तथा 'केवलान्वयी' और 'केवल-
व्यतिरेकी' हेतु चार रूपों से युक्त होने पर ही अपने साध्य को सिद्ध कर सकते
हैं । इन धर्मों में कमी होने पर हेत्वाभास हो जाते हैं ।
[ प्रश्न ] अच्छा फिर पक्ष, सपक्ष और विपक्ष कौन [ कहलाते ] हैं।
[ उत्तर ] कहते हैं । सन्दिग्ध साध्यधर्म से युक्त धर्मी [पर्वतादि] पक्ष [होता]
है । जैसे धूम [ लिङ्गक ] अनुमान में पर्वत पक्ष है । [ क्योंकि उसमें अग्नि है या
नहीं यह सन्देह रहता ही है अतः 'सन्दिग्धसाध्यवान्' होने से पर्वत 'पक्ष'
कहलाता है ] निश्चित साध्यधर्म से युक्त धर्मी सपक्ष [ कहलाता ] है । जैसे धूम
[ लिङ्गक उक्त ] अनुमान में महानस [ रसोई घर में अग्नि का निश्चय होने से
वह 'सपक्ष' कहलाता है ] और निश्चित रूप से साध्याभाव युक्त धर्मी विपक्ष
[ कहलाता ] है । जैसे उसी [ धूमलिङ्गक अनुमान ] में महाह्रद ।
इस प्रकार १ अन्वयव्यतिरेकी, २ केवलान्वयी और ३ केवलव्यतिरेकी [तीनों
प्रकार के हेतु ] प्रदर्शित कर दिए ।
इस प्रकार यहाँ तक अनुमान का सामान्यतः निरूपण किया गया इसके
आगे इस अनुमान प्रकरण के अन्तिम भाग हेत्वाभासों का विवेचन किया जायगा ।
इन [ त्रिविध शुद्ध हेतुओं ] के अतिरिक्त अन्य [ सब ] हेत्वाभास होते हैं ।
और वह १ असिद्ध, २ विरुद्ध, ३ अनैकान्तिक, ४ प्रकरणसम तथा ५ कालात्य-
यापदिष्ट भेद से पाँच प्रकार के ही होते हैं ।