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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 330 में से

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पृष्ठ 154

चतूरूपता ] अनुमाननिरूपणम् ८६
सिद्धिः । पक्षधर्मताबलात्तु साध्यस्य पक्षसम्बन्धित्वं विशेषः सिद्ध्यति ।
पर्वतधर्मेण, धूमवत्त्वेन वह्निरपि पर्वतसम्बद्ध एवानुमीयते । अन्यथा
साध्यसामान्यस्य व्याप्तिग्रहादेव सिद्धेः कृतमनुमानेन ।
यस्त्वन्योऽप्यन्वयव्यतिरेकी हेतुः स सर्वः पञ्चरूपोपपन्न एव सद्धेतुः।
अन्यथा हेत्वाभासो अहेतुरिति यावत् ।
केवलान्वयी चतूरूपोपपन्न एव स्वसाध्यं साधयति । तस्य हि विपक्षाद्
व्यावृत्तिर्नास्ति, विपक्षाभावात् ।
केवलव्यतिरेकी च चतूरूपोपपन्न एव । तस्य हि सपक्षे सत्त्वं नास्ति,
सपक्षाभावात् ।
धूम ] की ‘पक्षधर्मता’ [ अर्थात् पर्वत में विद्यमानता ] के बल से सिद्ध होता है ।
क्योंकि अनुमान के दो अङ्ग होते हैं [ एक ] ‘व्याप्ति’ और [दूसरी] ‘पक्षधर्मता’ ।
उसमें व्याप्ति से [ जहाँ धूम होगा वहाँ अग्नि होगी इस प्रकार के ] साध्य
सामान्य की सिद्धि होती है। और पक्षधर्मता [ हेतु की पक्ष में विद्यमानता ]
के बल से साध्य [ अग्नि ] के पक्षसम्बन्धित [ अर्थात् पर्वत में विद्यमानत्व ] रूप
विशेष की सिद्धि होती है। पक्ष [ पर्वत ] के धर्म [ अर्थात् पर्वत में विद्यमान ]
रूप धूमवत्त्व से अग्नि भी पर्वत सम्बन्ध ही गृहीत [ अनुमित ] होता है । अन्यथा
[ पक्षधर्मता के अभाव में ] साध्यसामान्य [ जहाँ धूम होगा वहाँ अग्नि होगी इस
प्रकार ] के व्याप्तिग्रह से ही सिद्ध होने से अनुमान की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।
[ इसी प्रकार ] जो और भी ‘अन्वयव्यतिरेकी’ हेतु है वह सब ‘पञ्चरूपोपपन्न’
होने पर ही शुद्ध हेतु है । अन्यथा [ किसी एक भी रूप से रहित होने पर ] हेतु
के समान प्रतीत होने वाला [हेतुवदाभासमान हेत्वाभास] अहेतु [अशुद्ध हेतु] है।
[दूसरा] केवलान्वयी हेतु चार रूपों से युक्त होकर ही अपने साध्य को सिद्ध
करता है । उसमें विपक्ष से व्यावृत्ति [ रूप तृतीय धर्म ] नहीं होती क्योंकि
उसमें विपक्ष का अभाव होता है ।
और केवल व्यतिरेकी [ भी ] चार रूप से युक्त ही [ होता है ] क्योंकि
उसका ‘सपक्ष’ न होने से [ उसमें ] सपक्षसत्त्व नहीं होता ।
अन्वय और व्यतिरेक से, दो प्रकार की व्याप्ति के आधार पर ‘केवलान्वयी’
और ‘केवल व्यतिरेकी’ यह दो भेद हेतु के होते हैं । और तीसरा भेद इन दोनों
के सम्मिश्रण से ‘अन्वयव्यतिरेकी’ भेद के नाम से होता है। इन व्याप्तियों में से
‘अन्वयव्याप्ति’ भावभूत धूम तथा वह्नि आदि की, और व्यतिरेक व्याप्ति वह्नयभाव