तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसिद्धः ] अनुमाननिरूपणम् ६१
१ तत्र लिङ्गत्वेनासिद्धो हेतुरसिद्धः। तत्रासिद्धस्त्रिविधः । आश्रयासिद्धः
स्वरूपासिद्धः, व्याप्यत्वासिद्धश्चेति ।
आश्रयासिद्धो यथा गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात् सरोजार-
विन्दवत् । अत्र गगनारविन्दमाश्रयः, स च नास्त्येव ।
स्वरूपासिद्धो यथा, अनित्यः शब्दः चाक्षुषत्वात् घटवत् । अत्र चाक्षु-
षत्वं हेतुः, स च शब्दे नास्त्येव, तस्य श्रावणत्वात् ।
व्याप्यत्वासिद्धस्तु द्विविधः । एको व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात् । अपर-
१ उनमें लिङ्गत्वरूप से अनिश्चित हेतु 'असिद्ध' [नामक हेत्वाभास कहलाता]
है। वह असिद्ध तीन प्रकार का होता है। १ 'आश्रयासिद्ध', २ 'स्वरूपासिद्ध'
और ३ व्याप्यत्वासिद्ध' ।
[ इनमें आश्रयासिद्ध का लक्षण है, 'यस्य हेतोराश्रयो नावगम्यते स आश्रया-
सिद्धः' जिस हेतु का आश्रय अर्थात् पक्ष न हो उसको आश्रयासिद्ध कहते हैं । ]
आश्रयासिद्ध 'जैसे [गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरोजारविन्दवत् ।'] आकाश
कमल सुगन्धित होता है, कमल होने से, सरोज कमल के समान । यहाँ [ इस
अनुमान में ] आकाश कमल [ गगनारविन्द ] आश्रय [ हेतु का आश्रय अर्थात्
पक्ष ] है और वह [ वस्तुतः ] है ही नहीं। [ अतः आश्रय अर्थात् पक्ष के न
होने से अरविन्दत्वात् हेतु आश्रयासिद्ध नामक हेत्वाभास कहलाता है ]
असिद्ध का दूसरा भेद 'स्वरूपासिद्ध' है । 'स्वरूपासिद्ध' का लक्षण है 'यो
हेतुराश्रये नावगम्यते स स्वरूपासिद्धः।' जो हेतु आश्रय में न पाया जाय उसको
स्वरूपासिद्ध कहते हैं । आश्रयासिद्ध का लक्षण 'यस्य हेतोराश्रयो नावगम्यते
स आश्रयासिद्धः' यह किया था और स्वरूपासिद्ध का लक्षण 'यो हेतुराश्रये
नावगम्यते स स्वरूपासिद्धः' यह किया गया है । अर्थात् जिस हेतु का आश्रय
तो हो, परन्तु हेतु उस आश्रय अर्थात् पक्ष में न रहता हो उसको 'स्वरूपासिद्ध'
कहते हैं। 'आश्रयासिद्ध' में तो आश्रय या पक्ष का अस्तित्व ही नहीं होता परन्तु
'स्वरूपासिद्ध' में आश्रय या पक्ष का अस्तित्व तो होता है लेकिन हेतु उस
आश्रय या पक्ष में नहीं रहता है अतः उसको 'स्वरूपासिद्ध' कहते हैं। यह
आश्रयासिद्ध और 'स्वरूपासिद्ध' का भेद हुआ ।
स्वरूपासिद्ध जैसे शब्द अनित्य है, चाक्षुष [ अर्थात् चक्षु से ग्राह्य ] होने से,
घट के समान । यहाँ चाक्षुषत्व हेतु है, और वह [ आश्रय या पक्ष रूप ] शब्द में
नहीं रहता । उस [ शब्द ] के श्रावण [ अर्थात् श्रोत्र ग्राह्य ] होने से ।
[ असिद्ध का तीसरा भेद 'व्याप्यत्वासिद्ध' है। जिसकी व्याप्ति सिद्ध न हो
उसको व्याप्यत्वासिद्ध कहते हैं ] व्याप्यत्वासिद्ध दो प्रकार का होता है। एक