तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
उपाधिलक्षणम् ] अनुमाननिरूपणम् ७३
'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं पर्वतः' यह तृतीय ज्ञान ही वह्नि ज्ञान के प्रति 'करण'
है और इसी को 'अनुमान' कहते हैं ।
इस तृतीय ज्ञान के दो अंश हैं एक अंश 'व्याप्ति' को सूचित करता है
और दूसरा 'पक्ष धर्मता' को । 'वह्निव्याप्य' इतने अंश से व्याप्ति सूचित होती
है और 'धूमवांश्च पर्वतः' इस अंश से धूम का पर्वत रूप पक्ष में अस्तित्व
प्रतीत होता है । इसको 'पक्षधर्मता' ज्ञान कहते हैं । इस प्रकार अनुमान के
मुख्य दो अंश होते हैं, एक 'व्याप्ति' और दूसरा 'पक्षधर्मता' । 'वह्निव्याप्यधू-
मवांश्च पर्वतः' इस तृतीय ज्ञान में यह दोनों अंश प्रतीत होते हैं । इसलिए
इस 'तृतीय ज्ञान' को 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञान' भी कह सकते हैं । इसलिए
'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः' 'और लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः'
यह दोनों ही 'परामर्श' के लक्षण कहे जाते हैं । 'लिङ्गपरामर्शो अनुमानम्'
'लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः' । लिङ्ग का 'तृतीय ज्ञान' अथवा 'व्याप्तिविशिष्ट-
पक्षधर्मताज्ञान' रूप 'परामर्श' ही 'अनुमान' कहलाता है । इसमें से धूम और
वह्नि के जितने बार के 'सहचारदर्शन' से 'व्याप्ति' का निश्चय होता है, वह सब
मिलकर प्रथम ज्ञान कहलाता है, इस प्रकार प्रथम ज्ञान तो यहाँ दिखा दिया
है और द्वितीय, तृतीय ज्ञान का वर्णन आगे चल कर करेंगे ।
'व्याप्ति' का ग्रहण 'भूयः सहचार दर्शन' से होता है और 'व्याप्ति' 'स्वाभाविक
सम्बन्ध' होता है ये दो बातें प्रतिपादित की हैं । इस पर यह शङ्का करते हैं कि
सर्वत्र 'भूयः सहचार दर्शन' से 'स्वाभाविक सम्बन्ध' का निश्चय नहीं होता है ।
जैसे 'जहाँ-जहाँ धूम है वहाँ-वहाँ वह्नि है' यह तो स्वाभाविक सम्बन्ध है, और
व्याप्ति ठीक है। परन्तु इसको यदि उलटा करके यों कहा जाय कि 'यत्र यत्र वह्नि-
स्तत्र तत्र धूमः' 'जहाँ-जहाँ वह्नि है वहाँ-वहाँ धूम है' तो इनका भूयः सहचार
दर्शन होने पर भी यह 'स्वाभाविक सम्बन्ध' या 'व्याप्ति' नहीं होगा। क्योंकि यदि
लोहे के एक गोले को गर्म कर दिया जाय तो उसमें अग्नि तो होती है परन्तु धूम
नहीं होता । इसलिए 'यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः' यह स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं
अपितु 'औपाधिक' सम्बन्ध कहलाता है। इसमें 'आर्द्र इन्धन संयोग' 'उपाधि' है।
'उपाधि' का लक्षण है 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वमुपाधिः' ।
जो धर्म साध्य का व्यापक हो और साधन का अव्यापक हो उसको 'उपाधि'
कहते हैं । जैसे यदि कोई यह अनुमान बनावे कि 'अयोगोलकं धूमवत् वह्नेः'
लोहे का गोला वह्नियुक्त होने से धूमवान् है तो इस अनुमान में धूम 'साध्य' है,
वह्नि 'साधन' है, और 'आर्द्वेन्धनसंयोग' को यहाँ उपाधि कहा है । यह
७४ तर्कभाषा [ उपाधिलक्षणम्
'आर्द्रेन्धन संयोग' रूप धर्म, साध्य जो धूम है, उसका व्यापक है । अर्थात्
जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ-वहाँ आर्द्रेन्धन संयोग अवश्य होता है । यह
'साध्यव्यापकत्व' हुआ । इसके विपरीत 'आर्द्रेन्धन संयोग' साधनभूत धर्म वह्नि
का व्यापक नहीं है । अर्थात् जहाँ-जहाँ वह्नि हो वहाँ-वहाँ 'आर्द्रेन्धन संयोग' का
होना आवश्यक नहीं है । जैसे इसी अयोगोलक ( लोहे के गोले ) में अग्नि तो
है परन्तु 'आर्द्रेन्धन संयोग' नहीं है । यह 'साधनाव्यापकत्व' हुआ । इस प्रकार
'आर्द्रेन्धन संयोग' में 'साध्यव्यापकत्व' और 'साधनाव्यापकत्व' दोनों अंश घट
जाने से उसमें 'उपाधि' का पूरा लक्षण घट जाता है । इसलिए यह हेतु
'सोपाधिक' है । अर्थात् 'यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः' यह सम्बन्ध स्वाभाविक
नहीं औपाधिक है ।
'औपाधिक सम्बन्ध' का दूसरा उदाहरण यह है कि कोई 'मैत्री' नामक स्त्री
व्यक्ति है । उसके पाँच पुत्र हैं, जिनमें से चार को हमने देखा है और वह सब
श्याम वर्ण के हैं। पाँचवें पुत्र को हमने नहीं देखा है किन्तु वह गौर वर्ण का
है। परन्तु जिसने मैत्री के चार पुत्रों में श्यामत्व देखा है वह उस 'भूयः सहचार दर्शन'
के आधार पर 'मैत्रीतनयत्व' और 'श्यामत्व' का 'स्वाभाविक सम्बन्ध' अथवा
व्याप्ति मान कर उस न देखे हुए पाँचवें पुत्र में भी श्यामत्व का अनुमान 'सः
श्यामः मैत्रीतनयत्वात् परिदृश्यमानमैत्रीतनयस्तोमवत्' इस प्रकार कर सकता
है। यहाँ 'मैत्रीतनयत्वात्' हेतु 'श्यामत्व' की सिद्धि के लिए दिया गया है ।
परन्तु यह हेतु 'सोपाधिक' है । इस में 'शाक-पाक जन्यत्व' रूप 'उपाधि'
विद्यमान है । अर्थात् 'श्यामत्व' का प्रयोजक 'मैत्रीतनयत्व' नहीं अपितु 'शाक-
पाक-जन्यत्व' है । इस प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं । उपाधि का लक्षण
'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वम्' है । वह 'शाक-पाक-जन्यत्व' में पूर्ण
रूप से घट जाता है । यहाँ साध्य श्यामत्व और साधन मैत्रीतनयत्व है ।
'शाकपाकजन्यत्वं' साध्य रूप श्यामत्व का व्यापक है । यत्र यत्र श्यामत्वं तत्र
तत्र शाकपाकजन्यत्वं' यह साध्यव्यापकत्व हुआ ।
'शाक-पाक-जन्यत्व' का अभिप्राय यह है कि बालक के गौर और श्याम
वर्ण पर गर्भ काल में किए गए माता के आहार का प्रभाव पड़ता है । यदि माता
दुग्ध, दधि आदि पदार्थों का अधिक सेवन करती है तो बालक गौर वर्ण का होता
है । इसके विपरीत यदि गर्भ काल में माता हरे शाक आदि का अधिक सेवन
करती है तो बालक का वर्ण श्याम होता है । अर्थात् श्यामत्व का प्रयोजक या
कारण 'मैत्रीतनयत्व' नहीं अपितु 'शाकपाकजन्यत्व' है । जहाँ-जहाँ 'शाक-पाक-
जन्यत्व' होता है वहाँ-वहाँ श्यामत्व अवश्य होता है यह साध्य-व्यापकत्व हुआ ।
उपाधि निरूपणम् ] अनुमाननिरूपणम् ७५
यद्यपि यत्र यत्र मैत्रीतनयत्वं तत्र तत्र श्यामत्वमपीति भूयो दर्शनं
समानमवगम्यते, तथापि मैत्रीतनयत्वश्यामत्वयोर्न स्वाभाविकः सम्बन्धः
किन्तूपाधिक एव । शाकाद्यन्नपरिणामस्योपाधेर्विद्यमानत्वात् ।
तथा हि श्यामत्वे मैत्रीतनयत्वं न प्रयोजकं किन्तु शाकाद्यन्नपरिणति-
भेद एव प्रयोजकः । प्रयोजकश्चोपाधिरित्युच्यते ।
न च धूमाग्न्योः सम्बन्धे कश्चिदुपाधिरस्ति । अस्ति चेत्, यो-
परन्तु जहां जहां मैत्रीतनयत्व होता है वहां वहां 'शाक-पाक-जन्यत्व' अवश्य
हो यह आवश्यक नहीं है । माता गर्भ-काल में शाकादि के स्थान पर दुग्ध
आदि का सेवन करे यह भी हो सकता है । ऐसी दशा में 'यत्र यत्र मैत्रीतनयत्वं
तत्र तत्र शाक-पाक-जन्यत्वं' यह आवश्यक न होने से साधनाव्यापकत्व हुआ ।
इस प्रकार 'शाक-पाक-जन्यत्व' रूप 'उपाधि' के वर्तमान होने से 'मैत्री तन-
यत्व' और श्यामत्व का स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है अपितु औपाधिक सम्बन्ध है।
इससे यह सिद्ध हुआ कि यद्यपि 'भूयः सहचार दर्शन' से स्वाभाविक
सम्बन्ध अथवा व्याप्ति का निश्चय होता है परन्तु जहां एक भी स्थल में उनके
सहचार का अभाव अथवा व्यभिचार का ग्रहण हो जाता है वहां वह 'भूयः
सहचार दर्शन' भी व्यर्थ हो जाता है और वह उनके स्वाभाविक सम्बन्ध का बोध
नहीं करा सकता है । इसलिए केवल 'भूयः सहचार दर्शन' ही व्याप्ति ग्राहक
नहीं है अपितु उसके साथ व्यभिचार का अदर्शन होना भी आवश्यक है ।
अर्थात् 'व्यभिचारादर्शनसहकृत भूयः सहचार दर्शन' व्याप्ति का ग्राहक होता
है । भूयः सहचार दर्शन होते हुए मैत्रीतनयत्व और श्यामत्व का उपाधि स्थल
में व्यभिचार दर्शन हो जाने से व्याप्ति सिद्ध नहीं हो सकती । अतः उनका
स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है । यही आगे कहते हैं ।
यद्यपि जहां जहां मैत्रीतनयत्व है वहां वहां श्यामत्व भी है इस प्रकार [मैत्री-
तनयत्व और श्यामत्व का भूयःसहचार मैत्री के चार पुत्रों में, धूम और वह्नि के
भूयः सहचार दर्शन के समान] भूयो दर्शन समान रूप से प्रतीत होता है । फिर
भी मैत्रीतनयत्व और श्यामत्व का स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है अपितु औपाधिक
[ सम्बन्ध ] ही है । शाकादि अन्न परिणाम रूप उपाधि के विद्यमान होने से ।
क्योंकि श्यामत्व का प्रयोजक मैत्रीतनयत्व नहीं है किन्तु शाकादि अन्न परिणाम
ही [ श्यामत्व में ] प्रयोजक है । प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं ।
[ प्रकृत में ] धूम और अग्नि के सम्बन्ध में कोई उपाधि नहीं है । [ इसलिए
उनका सम्बन्ध स्वाभाविक सम्बन्ध अथवा व्याप्ति है । यदि यह कहो कि धूम और
अग्नि के सम्बन्ध में भी कोई उपाधि है तो प्रश्न यह होगा कि ] यदि [ धूम और
७६ तर्कभाषा [ उपाधिनिरूपणम्
ग्योऽयोग्यो वा । अयोग्यस्य शङ्कितुमशक्यत्वात्, योग्यस्य चानुपल-
भ्यमानत्वात् । यत्रोपाधिरस्ति तत्रोपलभ्यते । यथाग्नेर्धूमसम्बन्धे
आर्द्वेन्धनसंयोगः । हिंसात्वस्य चाधर्मसाधनत्वेन सह सम्बन्धे निषिद्ध-
त्वमुपाधिः । मैत्रीतनयत्वस्य च श्यामत्वेन सह सम्बन्धे शाकाद्यन्न-
परिणतिभेदः ।
न चेह धूमस्याग्निसहचर्ये कश्चिदुपाधिरस्ति । यद्यभविष्यत्ततोऽद्रक्ष्यत्,
ततो दर्शनाभावान्नास्ति । इति तर्कसहकारिणानुपलम्भसनाथेन । प्रत्य-
क्षेणैवोपाध्यभावोऽवधार्यते । तथा च उपाध्यभावग्रहणजनितसंस्कारसह-
कृतेन साहचर्यग्राहिणा प्रत्यक्षेणैव धूमाग्न्योर्व्याप्तिरवधार्यते। तेन धूमाग्न्योः
स्वाभाविक एव सम्बन्धो न त्वौपाधिकः । स्वाभाविकश्च सम्बन्धो व्याप्तिः ।
अग्नि के सम्बन्ध में कोई उपाधि ] है तो [ वह उपाधि प्रत्यक्ष होने के ] योग्य है
अथवा अयोग्य । [ यदि प्रत्यक्ष होने के अयोग्य उपाधि है, यह कहना चाहें तो
ठीक नहीं है क्योंकि ] अयोग्य [ है तो उस ] की शङ्का करना भी उचित नहीं
[ जिस उपाधि का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है वह है ही इस में क्या प्रमाण होगा ।
इसलिए उसकी शङ्का भी करना अनुचित है । अर्थात् अयोग्य उपाधि है यह नहीं
कह सकते । ] और [ प्रत्यक्ष के ] योग्य [ उपाधि ] की उपलब्धि नहीं होती ।
[ यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः इत्यादि स्थलों में ] जहाँ [ आर्द्वेन्धन संयोग आदि
रूप ] उपाधि है वहाँ उपलब्ध होती है जैसे १ अग्नि के धूम के साथ [ यत्र यत्र
अग्निस्तत्र तत्र धूमः ] इस सम्बन्ध में आर्द्वेन्धन संयोग [ उपाधि है तो वह उप-
लब्ध भी होती है ] और २ हिंसात्व के अधर्म साधनत्व के साथ सम्बन्ध में
निषिद्धत्व उपाधि है और ३ मैत्रीतनयत्व के श्यामत्व के साथ [ यत्र यत्र मैत्री-
तनयत्वं तत्र तत्र श्यामत्वं ] इस सम्बन्ध में शाकादि अन्न परिणाम भेद [ शाक-
पाक-जन्यत्व उपाधि है और उपलब्ध होती है ]
यहाँ धूम के अग्नि के साथ साहचर्य में कोई उपाधि नहीं है । यदि होती तो
दिखाई देती । दिखाई नहीं देती अतः नहीं है । इस प्रकार तर्क सहकृत और
अनुपलब्धियुक्त प्रत्यक्ष से ही उपाधि का अभाव निश्चय होता है । इसलिए उपाधि
के अभाव के ज्ञान से उत्पन्न संस्कार से सहकृत और भूयः सहचार दर्शन जन्य
संस्कार के सहकृत [ धूम तथा अग्नि के ] साहचर्य को ग्रहण कराने वाले प्रत्यक्ष
[प्रमाण] से ही धूम और अग्नि की व्याप्ति गृहीत होती है । इसलिए धूम और अग्नि
का स्वाभाविक सम्बन्ध ही है औपाधिक नहीं । और स्वाभाविक सम्बन्ध [को ही]
व्याप्ति [ कहते ] हैं ।
लिङ्गपरामर्शः ] अनुमाननिरूपणम् ७७
तदनेन न्यायेन धूमाग्न्योर्व्याप्तौ गृह्यमाणायां, महानसे यद्धूमज्ञानं
तत्प्रथमम् । पर्वतादौ पक्षे यद्धूमज्ञानं तद्द्वितीयम् । ततः पूर्वगृहीतां
धूमाग्न्योर्व्याप्तिं स्मृत्वा यत्र धूमस्तत्राग्निरिति तत्रैव पर्वते पुनर्धूमं परा-
मृशति । अस्त्यत्र पर्वते वह्निना व्याप्तो धूम इति । तदिदं धूमज्ञानं तृतीयम् ।
एतच्चावश्यमभ्युपेतव्यम् । अन्यथा यत्र धूमस्तत्राग्निरित्येव स्यात् ।
इह तु कथमग्निना भवितव्यम् । तस्मादिहापि धूमोऽस्ति इति ज्ञानमन्वे-
षितव्यम् । अयमेव लिङ्गपरामर्शः । अनुमिति प्रति करणत्वाच्चानुमानम् ।
तस्मात्, अस्त्यत्र पर्वतेऽग्निरित्यनुमितिज्ञानमुत्पद्यते ।
ननु कथं प्रथमं महानसे यद्धूमज्ञानं तन्नाग्निमनुमापयति ?
इसलिए, इस प्रकार से [ व्यभिचारादर्शन सहकृत भूयः सहचार दर्शन से ]
धूम और अग्नि की व्याप्ति के ग्रहण में महानस [ रसोई घर ] में जो [ जितनी
बार सहचार दर्शन से व्याप्तिग्रह हो, उतनी बार का सम्मिलित ] धूमज्ञान है वह
प्रथम [ ज्ञान है, इस व्याप्तिग्रह के बाद ] पर्वतादि रूप पक्ष [ 'सन्दिग्धसाध्य-
वान् पक्षः' जिस पर्वतादि में साध्य वह्नि संदिग्ध अवस्था में है उसको 'पक्ष' कहते
हैं ] में जो धूम का ज्ञान है वह द्वितीय [ ज्ञान है ], उस [ पर्वतादि में द्वितीय
धूम दर्शन ] से, पूर्व गृहीत धूम और अग्नि की 'जहाँ धूम होता है वहीं वह्नि
होती है इस 'व्याप्ति' को स्मरण कर उसी पर्वत में [ वह्नि व्याप्ति विशिष्ट ] धूम का
फिर [ 'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं पर्वत.' इस रूप में ] परामर्श करता है । इस पर्वत
में वह्नि के साथ व्याप्त धूम है। यह [ वह्नि व्याप्य धूमवांश्चायं पर्वतः इस प्रकार
का ] धूम ज्ञान, तृतीय ज्ञान [ लिङ्ग परामर्श रूप ] है । [ इसी को 'लिङ्गपरामर्श'
तथा 'अनुमान' कहते हैं। उसी से 'पर्वतो वह्निमान्' यह 'अनुमिति' होती है ]
इस [ तृतीय ज्ञान ] को अवश्य मानना होगा । अन्यथा जहां धूम
होगा वहाँ अग्नि होगी यह [ सामान्य ज्ञान ] ही होगा । यहां [ पर्वत रूप स्थल
विशेष में ] अग्नि क्यों होनी चाहिए । इस [ के उपपादन के ] लिए यहाँ [पर्वत में]
भी धूम है इस प्रकार का ज्ञान मानना चाहिए । यही [ पर्वत में व्याप्तिस्मृति के
बाद हुआ धूम का परामर्श ] लिङ्ग का परामर्श [ कहलाता ] है और [ 'तस्मात्
पर्वतो वह्निमान्' इस प्रकार की ] अनुमिति के प्रति करण होने से अनुमान
[ कहलाता ] है । क्योंकि उस [ लिङ्ग परामर्श रूप तृतीय ज्ञान ] से इस पर्वत में
अग्नि है इस प्रकार का अनुमिति रूप ज्ञान उत्पन्न होता है ।
[ प्रश्न ] अनुमिति के लिए तृतीय ज्ञान तक क्यों जाते हैं । महानस में जो
प्रथम [ बार का ] धूमज्ञान ज्ञान है उसी से अग्नि का अनुमान क्यों नहीं हो
जाता है ?
७८ तर्कभाषा [ तृतीयं ज्ञानम्
सत्यम् । व्याप्तेरगृहीतत्वात् । गृहीतायामेव व्याप्तावनुमित्युदयात् ।
अथ व्याप्तिनिश्चयोत्तरकालं महानस एवाग्निरनुमीयताम् ।
मैवम् । अग्नेर्दृष्टत्वेन सन्देहस्यानुदयात् । सन्दिग्धश्चार्थोऽनुमीयते ।
यथोक्तं भाष्यकृता । 'नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थे न्यायः प्रवर्तते किन्तु सन्दिग्धे' ।
अथ पर्वतगतमात्रस्य पुंसो यद्धूमज्ञानं, तत् कथं नाग्निमनुमापयति?
अस्ति चात्राग्निसन्देहः । साधकबाधकप्रमाणाभावेन संशयस्य न्याय-
प्राप्तत्वात् ।
सत्यम् । अगृहीतव्याप्तेरिव गृहीतविस्मृतव्याप्तेरपि पुंसोऽनुमानानु-
[ उत्तर ] आपका प्रश्न ठीक है । [ परन्तु ] व्याप्ति का ग्रहण न होने से
[ प्रथम बार के धूमज्ञान से अग्नि का अनुमान नहीं हो सकता है [ क्योंकि ]
व्याप्ति के गृहीत होने पर ही अनुमिति का उदय हो [ सकने ] ने से । प्रथमज्ञान
से अनुमिति नहीं होती ]
[ प्रश्न ] अच्छा तो व्याप्ति के ग्रहण होने के पश्चात् महानस में ही अग्नि का
अनुमान होना चाहिए ।
[ उत्तर ] यह [ कहना भी ] ठीक नहीं है । [ क्योंकि महानस में ] अग्नि
के प्रत्यक्ष होने से सन्देह का उदय न होने से [ व्याप्तिग्रह के बाद महानस में
अग्नि का अनुमान नहीं हो सकता है ] । और सन्दिग्ध अर्थ का ही अनुमान
होता है । जैसा कि [ न्याय दर्शन के ] भाष्यकार [ वात्स्यायन ] ने कहा है
[ कि सर्वथा ] अनुपलब्ध [ अर्थात् अज्ञात ] अर्थ [ के विषय ] में न्याय
[ अर्थात् अनुमान ] की प्रवृत्ति नहीं होती । और न [ सर्वथा ] निर्णीत अर्थ
में न्याय प्रवृत्त होता है किन्तु सन्दिग्ध अर्थ में [ ही न्याय अर्थात् अनुमान की
प्रवृत्ति होती है । ]
[ प्रश्न ] अच्छा [ व्याप्तिग्रह के बाद ] पर्वत में पहुँचे हुए मनुष्य का जो
धूम ज्ञान [ अर्थात् व्याप्ति स्मृति के पूर्व का, द्वितीय ज्ञान ] वह अग्नि का अनुमान
क्यों नहीं कराता ? यहाँ अग्नि का सन्देह तो है । [ क्योंकि अग्नि के ] साधक
अथवा बाधक प्रमाण के अभाव में सन्देह होना उचित ही है ।
[ उत्तर ] [ आपका प्रश्न ] ठीक है । [ परन्तु द्वितीय ज्ञान के समय व्याप्ति
की स्मृति न होने से ] अगृहीत व्याप्तिक पुरुष के समान [ गृहीत होने पर भी
जिसको व्याप्ति विस्मृत हो गई उस ] गृहीत विस्मृत व्याप्तिक पुरुष को भी अनुमान
को उदय न होने से व्याप्ति स्मृति के भी अनुमिति के प्रति हेतु होने से [ व्याप्ति
न्याय दर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, १,
स्वार्थानुमानम् ] अनुमाननिरूपणम् ७६
दयेन व्याप्तिस्मृतेरप्यनुमितिहेतुत्वात् । धूमदर्शनाच्चोद्बुद्धसंस्कारो व्याप्तिं
स्मरति । यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान् यथा महानस इति । तेन
धूमदर्शने जाते व्याप्तिस्मृतौ भूतायां यद्धूमज्ञानं तत् तृतीयं 'धूमवांश्चा-
यम्' इति । तदेवाग्निमनुमापयति नान्यत् । तदेवानुमानम् । स एव
लिङ्गपरामर्शः । तेन व्यवस्थितमेत—ल्लिङ्गपरामर्शोऽनुमानमिति ।
तच्चानुमानं द्विविधम् । स्वार्थं परार्थं चेति । स्वार्थं स्वप्रतिपत्तिहेतुः ।
तथा हि स्वयमेव महानसादौ विशिष्टेन प्रत्यक्षेण धूमाग्न्योर्व्याप्तिं गृहीत्वा-
पर्वतसमीपं गतस्तद्गते चाग्नौ सन्दिहानः पर्वतवर्तिनीमविच्छिन्नमूला-
मभ्रंलिहां धूमलेखां पश्यन् धूमदर्शनाच्चोद्बुद्धसंस्कारो व्याप्तिं स्मरति ।
यत्र धूमस्तत्राग्निरिति । ततोऽत्रापि धूमोऽस्तीति प्रतिपद्यते । तस्मादत्र
पर्वतेऽग्निरप्यस्तीति स्वयमेव प्रतिपद्यते । तत्स्वार्थानुमानम् ।
स्मृति के अभाव में अनुमिति नहीं हो सकती है । अतः [ द्वितीय बार के ] धूम
दर्शन से उद्बुद्ध संस्कार [ पुरुष ] 'जो जो धूमवान् होता है वह वह वह्निमान्
होता है' इस रूप में व्याप्ति को स्मरण करता है । इसलिए धूम दर्शन होने के
बाद व्याप्ति स्मृति होने पर जो धूमज्ञान [होता है] वह तृतीय 'धूमवांश्चायं पर्वतः'
यह पर्वत धूमवान् है इस प्रकार का जो ज्ञान होता है वही अग्नि का अनुमान
कराता है । उससे भिन्न [ प्रथम या द्वितीयादि ] अन्य कोई नहीं । उसी [ तृतीय
ज्ञान ] को 'अनुमान' कहते हैं । वही 'लिङ्ग परामर्श' [ लिङ्ग का तृतीय ज्ञान ]
है । इसलिए 'लिङ्गपरामर्शो अनुमानम्' यह लक्षण स्थिर हुआ ।
अनुमान के भेद—
वह अनुमान स्वार्थ [ अनुमान ] और परार्थ [ अनुमान ] इस प्रकार दो
तरह का है । स्वयं अपने ज्ञान का हेतु [ भूत अनुमान ] स्वार्थानुमान
[ कहलाता ] है । जैसे महानस आदि में विशेष प्रत्यक्ष से स्वयं ही धूम और
अग्नि की व्याप्ति को ग्रहण कर के पर्वत के समीप गया हुआ और पर्वतगत अग्नि
के विषय में [ पर्वत में अग्नि है या नहीं इस प्रकार का ] सन्देह करता हुआ पर्वत
पर विद्यमान अविच्छिन्नमूला धूम की रेखा को देख कर, धूम के दर्शन से
[ संस्कार का उद्बोध हो जाने से ] उद्बुद्ध संस्कार [ वाला पुरुष ], जहाँ धूम
होता है वहाँ अग्नि होती है' इस व्याप्ति को स्मरण करता है । उसके बाद यहाँ
[ पर्वत में ] भी धूम है इस प्रकार [ तृतीय बार पर्वत में वह्नि व्याप्य धूम को ]
जानता है । इसलिए इस पर्वत पर अग्नि भी है इस प्रकार स्वयमेव [ पर्वत पर
अग्नि को ] जान लेता है । वही स्वार्थानुमान है ।
८२ तर्कभाषा [ परार्थानुमानम्
यत्तु कश्चित् स्वयं धूमादग्निमनुमाय परं बोधयितुं पञ्चावयवमनुमान-
वाक्यं प्रयुङ्क्ते तत् परार्थानुमानम् । तद्यथा पर्वतोऽग्निमान्, धूमवत्वात्,
यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान्, यथा महानसः, तथा चायं, तस्मात्तथा, इति।
अनेन वाक्येन प्रतिज्ञादिमता प्रतिपादितात् पञ्चरूपोपपन्नाल्लिङ्गात्
परोऽप्यग्निं प्रतिपद्यते । तेनैतत् परार्थानुमानम् ।
अत्र पर्वतस्याग्निमत्वं साध्यं, धूमवत्वं हेतुः। स चान्वयव्यतिरेकी,
अन्वयेन व्यतिरेकेण च व्याप्तिमत्वात् । तथा हि यत्र यत्र धूमवत्वं तत्रा-
ग्निमत्वं यथा महानसे इत्यन्वयव्याप्तिः । महानसे धूमाग्न्योरन्वयसद्भा-
और जो कोई धूम से स्वयं अग्नि का अनुमान करके [ उसी को ] दूसरे को
बोध कराने के लिए पञ्चावयव अनुमान वाक्य का प्रयोग करता है वह परार्थानु-
मान होता है । जैसे [ अञ्चावयव युक्त अनुमान वाक्य के प्रयोग का उदाहरण
देते हैं ] १. यह पर्वत अग्निमान् है [ यह प्रथम अवयव प्रतिज्ञा है ] २. धूम युक्त
होने से [ यह हेतु रूप दूसरा अवयव है ] ३. जो जो धूमयुक्त होता है वह वह
वह्नि युक्त भी होता है जैसे रसोई घर [यह उदाहरण रूप तीसरा अवयव हुआ]
४. यह [ पर्वत ] भी उसी प्रकार का [ धूम युक्त ] है [ यह चौथा अवयव
उपनय रूप हुआ । इसको 'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं' इस रूप से बोलना चाहिए ।
परन्तु संक्षेप में उसको 'तथा चायं' कह कर भी व्यवहार किया जाता है । इसमें
व्याप्ति और पक्षधर्मता दोनों प्रतीति होती हैं। इसलिए इसको 'व्याप्तिविशिष्टपक्ष-
धर्मताज्ञान' या 'लिङ्गपरामर्श' रूप 'अनुमान' भी कहते हैं। क्योंकि इसके बाद
निगमन रूप पञ्चम अवयव ] इस लिए वैसा [ अर्थात् अग्नियुक्त ] है [ इस
प्रकार का ज्ञान हो जाता है जो अनुमिति रूप है । यह पाँचवां अवयव निगमन
कहलाता है ] ।
[ इस प्रकार ] प्रतिज्ञा आदि [ पाँचों अवयवों ] से युक्त इस [ अनुमान ]
वाक्य द्वारा प्रतिपादित [ १ पक्षसत्त्व, २ सपक्षसत्त्व, ३ विपक्षव्यावृत्तत्व,
४ अबाधितविषयत्व और ५ असत्प्रतिपक्षत्व इन आगे कहे जाने वाले ] पाँच
रूपों से युक्त लिङ्ग [ हेतु ] से, दूसरा [ व्यक्ति ] भी अग्नि को जान लेता है ।
इसलिए यह 'परार्थानुमान' [ दूसरे का बोधक अनुमान ] है ।
यहाँ [ इस अनुमान में ] पर्वत का अग्निमत्व साध्य है धूमवत्व हेतु है ।
और वह [ हेतु ] अन्वय व्यतिरेकी [ हेतु ] है । [ क्योंकि उसकी अन्वय और
व्यतिरेक दोनों प्रकार की व्याप्ति में उदाहरण मिल जाते हैं अतः वह ] अन्वय
तथा व्यतिरेक से व्याप्ति युक्त होने से । जैसे कि जहाँ-जहाँ धूमवत्व [ होता है ]
वहाँ-वहाँ अग्निमत्व [ होता है ] जैसे महानस में । यह अन्वय व्याप्ति हुई ।
व्याप्तिक्रमः ] ८१
वात् । एवं यत्राग्निर्नास्ति तत्र धूमोऽपि नास्ति यथा महाह्रदे इतीयं व्यति-
रेकव्याप्तिः । महाह्रदे धूमाग्न्योर्व्यतिरेकस्य सद्भावदर्शनात् ।
व्यतिरेकव्याप्तेस्त्वयं क्रमः । अन्वयव्याप्तौ यद्व्याप्यं तदभावोऽत्र
व्यापकः । यच्च व्यापकं तदभावोऽत्र व्याप्य इति । तदुक्तम्—
व्याप्यव्यापकभावो हि भावयोर्यादृगिष्यते ।
तयोरभावयोस्तस्माद् विपरीतः प्रतीयते ॥
अन्वये साधनं व्याप्यं साध्यं व्यापकमिष्यते ।
तदभावोऽन्यथा व्याप्यो व्यापकः साधनात्ययः ॥
व्याप्यस्य वचनं पूर्वं व्यापकस्य ततः परम् ।
एवं परीक्षिता व्याप्तिः स्फुटीभवति तत्त्वतः १ ॥
महानस [ रसोई घर ] में धूम और अग्नि के सद्भाव होने से । इसी प्रकार जहां
अग्नि नहीं होती है वहाँ धूम भी नहीं होता जैसे महाह्रद [ तालाब ] में । यह
व्यतिरेक व्याप्ति हुई । महाह्रद में धूम और अग्नि के व्यतिरेक [ अभाव ] होने
से । [ वहाँ अग्नि के अभाव में धूम का अभाव होने से व्यतिरेक व्याप्ति होती है ।
इस प्रकार अन्वय व्याप्ति में महानस, और व्यतिरेक व्याप्ति में महाह्रद, यह दोनों
उदाहरण बन जाते हैं अतएव धूमवत्त्व हेतु अन्वयव्यतिरेकी हेतु है ]
व्यतिरेक व्याप्ति [ के बनाने ] का तो यह क्रम है । [ कि ] अन्वयव्याप्ति में
जो व्याप्य [ होता है उसका अभाव यहाँ [ व्यतिरेक व्याप्ति में ] व्यापक [ होता
है ] और जो व्यापक होता है उसका अभाव यहाँ व्याप्य होता है । जैसा कि
[ कुमारिल भट्ट ने अपने श्लोकवार्तिक नामक ग्रन्थ में ] कहा है—
भाव अर्थात् सत्पदार्थों [ धूम और अग्नि ] का जैसा व्याप्य व्यापक भाव
[ धूम अर्थात् साधन व्याप्य और साध्य अर्थात् वह्नि व्यापक ] होता है उनके
अभाव [ अर्थात् वह्न्यभाव और धूमाभाव ] का उसके उल्टा [ वह्न्यभाव व्याप्य
और धूमाभाव व्यापक ] होता है ।
अन्वय [ व्याप्ति ] में साधन [ हेतु ] व्याप्य और साध्य व्यापक होता है ।
उससे भिन्न [ व्यतिरेक व्याप्ति ] में साध्याभाव व्याप्य और साधनाभाव व्यापक
होता है ।
[ व्याप्ति के बोलते समय ] व्याप्य को पहिले [ यत्र यत्र के साथ ] और
व्यापक को उसके बाद [ तत्र तत्र के साथ ] बोलना चाहिए । इस प्रकार भली
प्रकार से परीक्षित हुई व्याप्ति तत्त्वतः स्पष्ट हो जाती है ।
१. श्लोकवार्तिकम् १२१-१२३ ।
६ त० भा०
८२ तर्कभाषा [ अन्वयव्यतिरेकी हेतुः
तदेवं धूमवत्त्वे हेतावन्वयेन व्यतिरेकेण च व्याप्तिरस्ति । यत्तु वाक्ये
केवलमन्वयव्याप्तेरेव प्रदर्शनं तदेकेनापि चरितार्थत्वात् । तत्राप्यन्वय-
स्यावक्रत्वात् प्रदर्शनम् । ऋजुमार्गेण सिद्धयतोऽर्थस्य वक्रेण साधना-
योगात् । न तु व्यतिरेकव्याप्तेरभावात् ।
तदेवं धूमवत्त्वं हेतुरन्वयव्यतिरेकी । एवमन्येऽप्यनित्यत्वाद्यौ साध्ये
कृतकत्वादयो हेतवोऽन्वयव्यतिरेकिणो द्रष्टव्याः । यथा शब्दोऽनित्यः
कृतकत्वादूघटवत् । यत्र कृतकत्वं तत्रानित्यत्वम् । यत्रानित्यत्वाभावस्तत्र
कृतकत्वाभावो यथा गगने ।
इस प्रकार धूमत्व हेतु में अन्वय और व्यतिरेक [ दोनों प्रकार की व्याप्ति में
उदाहरण मिल जाने से दोनों प्रकार ] से व्याप्ति है । [ परन्तु पर्वतो वह्निमान्,
धूमवत्त्वात्, यो यो धूमवान् सोऽग्निमान् यथा महानसः, इत्यादि अनुमान वाक्य
में ] जो केवल अन्वय व्याप्ति का ही प्रदर्शन किया गया है वह एक [ ही प्रकार
की व्याप्ति प्रदर्शन ] से भी काम चल सकता है [ इसलिए किया गया है । ]
उसमें भी [ व्यतिरेक व्याप्ति की अपेक्षा ] अन्वय [ व्याप्ति ] के सरल होने से
[ केवल अन्वय व्याप्ति का ] प्रदर्शन किया गया है । सरल मार्ग से सिद्ध होने वाले
अर्थ को वक्र मार्ग से साधन अयुक्त होने से [ केवल अन्वय व्याप्ति का प्रदर्शन
किया गया है ] न कि व्यतिरेक व्याप्ति के अभाव के कारण [ केवल अन्वय
व्याप्ति का प्रदर्शन किया गया है । ]
इस प्रकार [ अन्वय व्याप्ति में महानस और व्यतिरेक व्याप्ति में महाह्रद
दोनों प्रकार के उदाहरण मिल जाने से ] धूमवत्त्व हेतु अन्वयव्यतिरेकी [हेतु] है।
इसी प्रकार अनित्यत्वादि की सिद्धि में [ प्रयुक्त ] कृतकत्वादि अन्य हेतु भी अन्वय
व्यतिरेकी [ हेतु ही ] समझने चाहिए । जैसे कृतक [ जन्य ] होने से शब्द घट के
समान अनित्य है। जहाँ कृतकत्व [ अर्थात् जन्यत्व ] रहता है वहाँ अनित्यत्व
[भी] रहता है । [ यह अन्वय व्याप्ति हुई और उसका उदाहरण घट है । क्योंकि
घट में कृतकत्व और अनित्यत्व दोनों पाए जाते हैं ] जहाँ अनित्यत्व का अभाव
होता है वहाँ कृतकत्व का [भी] अभाव होता है। जैसे आकाश में [यह व्यतिरेक
व्याप्ति हुई । अन्वय व्याप्ति 'यत् कृतकं तदनित्यम्' में कृतकत्व हेतु व्याप्य है इस
लिए उसका प्रयोग पहिले किया जाता है । व्यतिरेक व्याप्ति बनाने का जो क्रम
अभी दिखाया है उसके अनुसार व्यतिरेकव्याप्ति बनाते समय उन दोनों के साथ
अभाव पद जुड़ जाता है । और उनका 'व्याप्यव्यापकभाव' बदल कर उल्टा हो
जाता है । इसलिए 'यत्र यत्र अनित्यत्वाभावः तत्र तत्र कृतकत्वाभावः' यह व्यतिरेक
व्याप्ति बनती है । और उसका उदाहरण आकाश मिल जाता है । इसलिए यह
केवलव्यतिरेकी हेतुः ] अनुमाननिरूपणम् ८३
कश्चिद्धेतुः केवलव्यतिरेकी । तद्यथा, सात्मकत्वे साध्ये प्राणादिमत्त्वं
हेतुः । यथा जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात् । यत् सात्मकं न भवति
तन् प्राणादिमन्न भवति । यथा घटः । न चेदं जीवच्छरीरं तथा तस्मान्न
तथेति । अत्र हि जीवच्छरीरस्य सात्मकत्वं साध्यं, प्राणादिमत्त्वं हेतुः ।
स च केवलव्यतिरेकी, अन्वयव्याप्तेरभावात् । तथाहि यत् प्राणादिमत्
कृतकत्व हेतु दोनों प्रकार की व्याप्ति में उदाहरण मिल जाने से 'अन्वय व्यतिरेकी'
हेतु कहलाता है ]
ऊपर अन्वयव्याप्ति तथा व्यतिरेकव्याप्ति इस प्रकार दो प्रकार की व्याप्ति दिखाई
गई है । इस दो प्रकार की व्याप्ति से 'केवलान्वयी' और 'केवलव्यतिरेकी' तथा
उन दोनों के मेल से तीसरा 'अन्वयव्यतिरेकी' यह तीन प्रकार के हेतु माने गए
हैं । जिसमें अन्वयव्याप्ति तथा व्यतिरेकव्याप्ति दोनों के उदाहरण मिल जावें वह
हेतु अन्वयव्यतिरेकी हेतु कहलाता है । जैसे धूमवत्त्व और कृतकत्व यह दोनों हेतु
अन्वयव्यतिरेकी हेतु हैं यह ऊपर दिखाया जा चुका है । जिस हेतु का अन्वयव्याप्ति
में उदाहरण न मिल सके और केवल व्यतिरेकव्याप्ति में उदाहरण मिले उसको
केवल व्यतिरेकी हेतु कहते हैं । जैसे 'जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात्' । इस
अनुमान में प्राणादिमत्त्व हेतु है और सात्मकत्व साध्य है । इन दोनों की अन्वय-
व्याप्ति इस प्रकार बनेगी । 'यत्र यत्र प्राणादिमत्त्वं तत्र तत्र सात्मकत्वम्' । इस
व्याप्ति का उदाहरण कोई जीवित शरीर ही होगा । परन्तु जीवित शरीर सब पक्ष
कोटि के अन्तर्गत हैं । इसलिए अन्वयव्याप्ति में उदाहरण मिलना सम्भव नहीं
है । तब व्यतिरेकव्याप्ति इस प्रकार बनेगी । 'यत्र यत्र सात्मकत्वाभावस्तत्र तत्र
प्राणादिमत्त्वाभावः । इस व्याप्ति में घट-पट आदि सहस्रों उदाहरण मिल सकते
हैं । इसलिए इस अनुमान में केवल व्यतिरेक व्याप्ति में ही उदाहरण सम्भव
होने से यह प्राणादिमत्त्व हेतु 'केवल व्यतिरेकी' हेतु है । यही बात आगे कहते हैं ।
कोई हेतु केवल व्यतिरेकी [ ही होती ] है । जैसे सात्मकत्व के साध्य होने में
प्राणादिमत्त्व हेतु [ केवल व्यतिरेकी हेतु है ] जैसे जीवित शरीर सात्मक है प्राणा-
दियुक्त होने से [इस अनुमानमें] जो सात्मक नहीं होता वह प्राणादि युक्त नहीं होता
[यह व्यतिरेक व्याप्ति हुई इसमें उदाहरण] जैसे घट । और यह जीवित शरीर वैसा
[अर्थात् प्राणादिमत्त्वाभाववत्] नहीं है इसलिये वैसा [अर्थात् सात्मकत्वाभाववत्]
नहीं है [ अर्थात् सात्मक है ] यहाँ [ इस अनुमान में ] जीवित शरीर का सात्म-
कत्व साध्य है और प्राणादिमत्त्व हेतु है, और वह [ हेतु ] अन्वयव्याप्ति [ में
उदाहरण ] के अभाव होने से केवल व्यतिरेकी है । क्योंकि जो प्राणादिमत् है
८४ तर्कभाषा [ केवलव्यतिरेकी हेतुः
तत् सात्मकं यथा अमुक इति दृष्टान्तो नास्ति। जीवच्छरीरं सर्वं
पक्ष एव।
लक्षणमपि केवलव्यतिरेकी हेतुः। यथा पृथिवीलक्षणं गन्धवत्त्वम्।
विवादपदं पृथिवीति व्यवहर्तव्यं, गन्धवत्त्वात्। यन्न पृथिवीति व्यवह्रियते
तन्न गन्धवत् यथापः।
प्रमाणलक्षणं वा। यथा प्रमाकरणत्वम्। तथाहि, प्रत्यक्षादिकं प्रमाण-
मिति व्यवहर्तव्यं प्रमाकरणत्वात्। यत्प्रमाणमिति न व्यवह्रियते तन्न
प्रमाकरणं यथा प्रत्यक्षाभासादि। न पुनस्तथेदं, तस्मान्न तथेति। न
पुनरत्र यत्प्रमाकरणं तत्प्रमाणमिति व्यवहर्तव्यं यथाऽमुक इत्यन्वयदृष्टा-
न्तोऽस्ति, प्रमाणमात्रस्य पक्षीकृतत्वात्।
वह सात्मक है जैसे अमुक इस प्रकार का [ अन्वय [ व्याप्ति का ] दृष्टान्त नहीं
मिलता ] है। [ क्योंकि उदाहरण बन सकने योग्य ] सारे जीवित शरीर पक्ष
[ कोटि में ] ही [ अन्तर्भूत ] हैं।
[ इसी प्रकार ] लक्षण भी [ जब हेतु रूप में प्रयुक्त होते हैं तब वह ] केवल
व्यतिरेकी हेतु होते हैं। जैसे पृथिवी का लक्षण गन्धवत्त्व [ गन्धवती पृथिवी यह
पृथिवी का लक्षण है। उसको हेतु बना कर जब किसी विवादग्रस्त पदार्थ को
पृथिवी सिद्ध करने के लिए ] विवादास्पद [ वस्तु ] को पृथिवी यह [ कह कर ]
व्यवहार करना चाहिये गन्धवत् होने से। जहां पृथिवी यह व्यवहार नहीं होता
है वह गन्धवत् नहीं होता है [ यह व्यतिरेक व्याप्ति हुई और उसमें उदाहरण है ]
जैसे जल। [ परन्तु इसकी अन्वय व्याप्ति 'यत्र यत्र गन्धवत्त्वं तत्र तत्र पृथिवीति
व्यवहारः' में कोई पार्थिव पदार्थ ही उदाहरण हो सकता है। परन्तु पार्थिव
पदार्थ तो सब के सब पक्ष कोटि में हैं अतः अन्वय-व्याप्ति में कोई उदाहरण न
मिलने से और व्यतिरेक व्याप्ति में उदाहरण मिल जाने से यह हेतु केवल
व्यतिरेकी हेतु ही है ]
अथवा प्रमाण का लक्षण जैसे प्रमाकरणत्व [ भी हेतु रूप में प्रयुक्त होने पर
केवल व्यतिरेकी हेतु ही होगा ] जैसे प्रमा का करण होने से प्रत्यक्षादि में प्रमाण
यह व्यवहार करना चाहिए। जिसमें प्रमाण यह व्यवहार नहीं होता है वह प्रमा का
करण नहीं होता है [ यह व्यतिरेक व्याप्ति हुई और उसमें उदाहरण है ] जैसे
प्रत्यक्षाभास आदि। यह [ विवादास्पद प्रत्यक्षादि ] वैसा [ अर्थात् प्रमाण
व्यवहाराभाव युक्त अतएव प्रमाकरणत्वाभाव युक्त ] नहीं है इसलिए वैसा [ प्रमाण
व्यवहाराभाव योग्य ] नहीं है [ अर्थात् प्रमाण व्यवहार योग्य है ] परन्तु यहाँ जो
केवलान्वयी हेतुः ] अनुमाननिरूपणम् ८५
अत्र च व्यवहारः साध्यो न तु प्रमाणत्वं, तस्य प्रमाकरणत्वाद्धेतोर-
भेदेन साध्याभेददोषप्रसङ्गात् । तदेवं केवलव्यतिरेकिणो दर्शिताः ।
कश्चिदन्यो हेतुः केवलान्वयी । यथा शब्दोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् ।
यत्प्रमेयं तदभिधेयं यथा घटः । तथा चायं तस्मात्तथेति । अत्र शब्दस्या-
भिधेयत्वं साध्यं प्रमेयत्वं हेतुः । स च केवलान्वय्येव । यदभिधेयं न
भवति तत्प्रमेयमपि न भवति यथामुक इति व्यतिरेकदृष्टान्ताभावात् ।
सर्वत्र हि प्रामाणिक एवार्थो दृष्टान्तः । स च प्रमेयश्चाभिधेयश्चेति ।
प्रमाकरण होता है वह प्रमाण होता है जैसे अमुक इस प्रकार का अन्वय दृष्टान्त
नहीं है। प्रमाणमात्र के पक्ष कोटि में होने से। इसलिए यह 'केवल व्यतिरेकी' हेतु है।
यहाँ [ प्रत्यक्षादिकं प्रमाणमिति व्यवहर्त्तव्यं प्रमाकरणत्वात् इस अनुमान में ]
व्यवहार साध्य है, प्रमाणत्व नहीं । उस [ प्रमाणत्व ] के प्रमाकरणत्व [ रूप ]
हेतु से अभिन्न होने से साध्याभेद [ हेतु और साध्य का अभेद रूप ] दोष प्राप्त
हो जाने से । [ इस लिए यहाँ प्रमाणत्व साध्य नहीं है अपितु प्रमाण व्यवहार
साध्य है । ]
इस प्रकार केवल व्यतिरेकी [ हेतु के तीन उदाहरण ] दिखा दिए । [ आगे
केवलान्वयी हेतु का वर्णन करते हैं ]
कोई हेतु 'केवलान्वयी' होता है। जैसे शब्द 'अभिधेय' [किसी शब्द द्वारा कथन
करने योग्य] है 'प्रमेय' [ ज्ञान प्रमा का विषय ] होने से । जो 'प्रमेय होता है सो
'अभिधेय' होता है जैसे घट, यह [शब्द] भी उसी प्रकार का [प्रमेय] है, अतएव
वैसा ही [ अभिधेय ] है। यहाँ शब्द का 'अभिधेयत्व' साध्य है, 'प्रमेयत्व' हेतु है,
और वह 'केवलान्वयी' ही है। [ क्योंकि उसकी ] जो अभिधेय नहीं होता है वह
प्रमेय भी नहीं होता है [ इस व्यतिरेक व्याप्ति में ] जैसे अमुक इस प्रकार का
'व्यतिरेक दृष्टान्त' नहीं मिलता है। [ क्योंकि ] सर्वत्र [ प्रत्यक्षादि प्रमाणों से
ज्ञात होने वाला ] प्रामाणिक अर्थ ही दृष्टान्त हो सकता है और वह प्रमेय भी
होता है और अभिधेय भी । [ इसलिए व्यतिरेक व्याप्ति में यहाँ उदाहरण नहीं
मिल सकता है। अतः यह हेतु 'केवलान्वयी' हेतु ही है। ]
इस प्रकार १ अन्वयव्यतिरेकी, २ केवलव्यतिरेकी और ३ केवलान्वयी तीनों
हेतुओं का उदाहरण सहित प्रदर्शन कर दिया । अब आगे हेतु के पाँच रूपों
का वर्णन करते हैं। इन पाँच रूपों से युक्त हेतु ही ठीक हेतु या शुद्ध हेतु
कहलाते हैं। उसमें से किसी एक भी रूप की कमी हो जाने पर वह हेतु शुद्ध
हेतु नहीं अपितु हेत्वाभास हो जाते हैं और अपने साध्य की सिद्धि करने में
असमर्थ हो जाते हैं। यही बात आगे कहते हैं ।
८६ तर्कभाषा [ पञ्चरूपाणि
एतेषां च अन्वयव्यतिरेकि-केवलान्वयि-केवलव्यतिरेकि-हेतूनां
त्रयाणां मध्ये यो हेतुरन्वयव्यतिरेकी स पञ्चरूपोपपन्न एव स्वसाध्यं
साधयितुं क्षमते, नत्वेकेनापि रूपेण हीनः । तानि पञ्चरूपाणि पक्षसत्त्वं,
सपक्षसत्त्वं, विपक्षव्यावृत्तिः, अबाधितविषयत्वं, असत्प्रतिपक्षत्वं चेति ।
और इन १ अन्वयव्यतिरेकी, २ केवलान्वयी तथा ३ केवलव्यतिरेकी तीनों
हेतुओं में से जो अन्वयव्यतिरेकी हेतु है वह पाँच रूपों से युक्त होने पर ही अपने
साध्य को सिद्ध करने में समर्थ होता है । एक भी रूप से हीन होने पर नहीं । वे
पाँच रूप [ निम्न प्रकार के हैं ] —
१ पक्षसत्त्व [ पक्षधर्मत्व ], २ सपक्षसत्त्व, ३ विपक्षव्यावृत्तत्व, ४ अबाधित-
विषयत्व और ५ असत्प्रतिपक्षत्व ।
इन पञ्च रूपों में 'पक्ष' सपक्ष' और 'विपक्ष' शब्द आए हैं । उनको समझे
बिना इनका समझना कठिन होगा । इसलिए पहिले 'पक्ष' 'सपक्ष' 'विपक्ष' को
समझ लेना चाहिए । इन तीनों के लक्षण 'सन्दिग्धसाध्यवान् पक्षः', 'निश्चित-
साध्यवान् सपक्षः', और 'निश्चितसाध्याभाववान् विपक्षः' इस प्रकार किए गए
हैं । अर्थात् जिसमें साध्य वह्नि आदि सन्दिग्ध अवस्था में हों उसको 'पक्ष'
कहते हैं । जैसे 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि अनुमान में पर्वत में अग्नि की सिद्धि
की जा रही है । जब तक अग्नि की सिद्धि न हो जाय तब तक पर्वत में वह्नि
का सन्देह ही है । इसलिए सन्दिग्धसाध्यवान् होने से पर्वत 'पक्ष' कहलाता
है । और धूम हेतु उसमें रहता है । यह उस धूम हेतु का प्रथम रूप 'पक्षसत्त्व'
हुआ । दूसरा शब्द 'सपक्ष' है । 'सपक्ष' उसको कहते हैं जिसमें साध्य वह्नि
आदि का निश्चय हो । 'निश्चितसाध्यवान् सपक्षः' । निश्चित साध्य से युक्त धर्मी
को 'सपक्ष' कहते हैं । जैसे उपर्युक्त वह्नि के अनुमान में महानस अर्थात्
रसोईघर 'सपक्ष' है क्योंकि उनमें साध्य वह्नि का निश्चय है । इस सपक्ष रूप
महानस में धूम रूप हेतु रहता है । यह हेतु धूम का दूसरा रूप 'सपक्षसत्त्व'
हुआ । तीसरा शब्द 'विपक्ष' है । विपक्ष का लक्षण 'निश्चितसाध्याभाववान्
विपक्षः' है । अर्थात् जिसमें साध्य का अभाव निश्चित हो उसको 'विपक्ष' कहते
हैं । जैसे उपर्युक्त अनुमान में महाह्रद 'विपक्ष' है । क्योंकि महाह्रद अर्थात्
तालाब में, साध्यरूप वह्नि का अभाव निश्चित है । इसलिए महाह्रद 'विपक्ष'
कहलाता है । उस महाह्रद रूप विपक्ष में धूम भी नहीं रहता है । यह उसका
तीसरा रूप 'विपक्षव्यावृत्तत्व' हुआ ।
पञ्चरूपाणि ] अनुमाननिरूपणम् ८७
एतानि तु पञ्चरूपाणि धूमवत्त्वादौ अन्वयव्यतिरेकिणि हेतौ
विद्यन्ते । तथाहि, धूमवत्त्वं पक्षस्य पर्वतस्य धर्मः । पर्वते तस्य विद्यमा-
नत्वात् । एवं सपक्षे सत्त्वम् , सपक्षे महानसे तद् विद्यत इत्यर्थः । एवं
विपक्षान्महाह्रदाद् व्यावृत्तिस्तत्र नास्तीत्यर्थः ।
एवमबाधितविषयत्वं धूमवत्त्वम् । तथाहि धूमवत्त्वस्य हेतोर्विषयः साध्य-
धर्मस्तच्चाग्निमत्त्वम् , तत्केनापि प्रमाणेन न बाधितं न खण्डितमित्यर्थः ।
यह पाँचों रूप तो धूमवत्त्व आदि 'अन्वयव्यतिरेकी' हेतु में विद्यमान हैं। क्योंकि
उस [ धूम ] के पर्वत में विद्यमान होने से धूमवत्त्व पक्ष का धर्म है। इसी प्रकार
'सपक्षसत्त्व' है। 'सपक्ष' अर्थात् महानस में वह [ धूमवत्त्व ] विद्यमान है [ अतः
सपक्षसत्त्व भी धूमवत्त्व हेतु में पाया जाता है] इसी प्रकार 'विपक्ष' अर्थात् महाह्रद
से व्यावृत्ति [ भी ] है । अर्थात् उस [ महाह्रद रूप विपक्ष ] में [ धूमवत्त्व हेतु ]
नहीं [ रहता ] है।
इसी प्रकार धूमवत्त्व हेतु 'अबाधित विषय' भी है । 'अबाधित विषय' पद से
'विषय' शब्द का अर्थ साध्य है । अबाधित विषय को समझने के लिए पहिले
बाधित विषय को समझना चाहिए । बाधित विषय का लक्षण 'प्रमाणान्तराव-
धृतसाध्याभावो हेतुर्बाधितविषयः' इस प्रकार किया गया है। जिस हेतु के 'विषय'
अर्थात् साध्य का अभाव किसी प्रमाणान्तर अर्थात् प्रबलतर दूसरे प्रमाण से
निश्चित हो उस हेतुको 'बाधितविषय' कहते हैं। जैसे कोई यह अनुमान प्रस्तुत
करे कि 'वह्निरनुष्णः कृतकत्वात् घटवत् ।' अग्नि कृतक होने से घट के समान
अनुष्ण अर्थात् शीतल है। घट कृतक अर्थात् जन्य है और अनुष्ण है। इसी
प्रकार अग्नि भी जन्य होने से घट के समान अनुष्ण है । इस अनुमान में अग्नि
'पक्ष' है उसमें 'अनुष्णत्व' 'साध्य' है और कृतकत्व 'हेतु' है। इस 'कृतकत्व'
हेतु का जो साध्य 'अनुष्णत्व' है उसका अभाव अर्थात् 'उष्णत्व' अग्नि में स्पर्श
द्वारा त्वाच-प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है। इसलिए 'त्वाचप्रत्यक्ष' रूप प्रमाणान्तर
से 'कृतकत्वात्' इस हेतु के विषय अर्थात् साध्य रूप अनुष्णत्व का अभाव
'उष्णत्व' अग्नि में पूर्व सिद्ध होने से यह 'बाधितविषय' नाम का हेत्वाभास
कहलाता है। इसी प्रकार यदि वह्निविषयक अनुमान में प्रयुक्त धूमवत्त्व हेतु
के साध्य रूप वह्नि का पर्वत में किसी प्रबल प्रमाणान्तर से अभाव निश्चित होता
तो धूमवत्त्व हेतु 'बाधितविषय' कहा जाता । परन्तु ऐसा नहीं है इसलिए—
इस प्रकार धूमवत्त्व हेतु 'अबाधित-विषय' है। क्योंकि धूमवत्त्व हेतु का विषय
अर्थात् साध्य जो कि अग्निमत्त्व है वह [पर्वत रूप पक्ष में] किसी प्रमाण से बाधित
एषमसत्प्रतिपक्षत्वम्-असन् प्रतिपक्षो यस्येत्यसत्प्रतिपक्षं धूमवत्त्वं हेतुः।
तथाहि, साध्यविपरीतसाधकं हेत्वन्तरं प्रतिपक्ष इत्युच्यते । स च
धूमवत्त्वे हेतौ नास्त्येवानुपलम्भात् ।
तदेवं पञ्चरूपाणि धूमवत्त्वे हेतौ विद्यन्ते । तेनैतद् धूमवत्त्वमग्नि-
मत्त्वस्य गमकम्, अग्निमत्त्वस्य साधकम् ।
अग्नेः पक्षधर्मत्वं हेतोः पक्षधर्मताबलात् सिद्ध्यति । तथाहि, अनु-
मानस्य द्वे अङ्गे, व्याप्तिः पक्षधर्मता च । तत्र व्याप्त्या साध्यसामान्यस्य
अर्थात् खण्डित नहीं है [ अर्थात् पर्वत में वह्नि का अभाव किसी प्रमाण से
गृहीत नहीं है। अतः यह धूमवत्त्व हेतु 'अबाधित' विषय है।]
इस प्रकार धूमवत्त्व हेतु में पांचवां धर्म 'असत्प्रतिपक्षत्व' भी है। 'असत्प्रति-
पक्ष' को समझने के लिए पहिले उसके विरोधी 'सत्प्रतिपक्ष' को समझना
चाहिए। जिस हेतु का प्रतिपक्ष विद्यमान है उसको सत्प्रतिपक्ष कहते हैं।
प्रतिपक्ष का लक्षण 'साध्यविपरीतसाधकं तुल्यबलं हेत्वन्तरं प्रतिपक्षः' है। एक
हेतु का जो साध्य है उससे विपरीत बात को सिद्ध करनेवाला तुल्यबल दूसरा
हेतु 'प्रतिपक्ष' कहलाता है। जिस हेतु का इस प्रकार का प्रतिपक्ष विद्यमान है
उसको 'सत्प्रतिपक्ष' हेत्वाभास कहते हैं। जैसे 'शब्दो नित्यः अनित्यधर्मानुप-
लब्धेः' और 'शब्दः अनित्यो नित्यधर्मानुपलब्धेः' यह दोनों तुल्यबल विरोधी
हेतु हैं। अतः यह एक दूसरे के 'प्रतिपक्ष' हैं और वह दोनों हेतु 'सत्प्रतिपक्ष'
नामक हेत्वाभास कहे जाते हैं। परन्तु प्रकृत धूमवत्त्व हेतु का इस प्रकार का
साध्यविपरीत साधक तुल्यबलविरोधी कोई दूसरा हेतु नहीं पाया जाता है।
अतएव वह 'सत्प्रतिपक्ष' नहीं है। अर्थात् उसमें 'असत्प्रतिपक्षत्व' रूप पञ्चम
हेतुरूप भी विद्यमान है। अतः धूमवत्त्व हेतु 'पञ्चरूपोपपन्न' होने से 'सद् हेतु'
है। यही बात ग्रन्थकार आगे प्रतिपादित करते हैं—
इस प्रकार असत्प्रतिपक्षत्व [ धर्म भी धूमवत्त्व हेतु में है। असत्प्रतिपक्ष का
अर्थ है ] अविद्यमान है प्रतिपक्ष जिसका इस प्रकार का असत्प्रतिपक्ष धूमवत्त्व हेतु
है। क्योंकि [ एक हेतु के ] साध्य के विपरीत [ अर्थ ] को सिद्ध करने वाले दूसरे
हेतु को प्रतिपक्ष कहते हैं। और वह [ प्रतिपक्ष रूप साध्य विपरीत साधक तुल्य-
बल हेत्वन्तर ] धूमवत्त्व हेतु में उपलब्ध'न होने से नहीं है।
इस प्रकार धूमवत्त्व हेतु में पांचों रूप विद्यमान हैं। इसलिए धूमवत्त्व अग्नि-
मत्त्व का बोधक अग्निमत्त्व का साधक [ शुद्ध हेतु ] है।
अग्नि का 'पक्षधर्मत्व' [ अर्थात् पक्ष रूप पर्वत में विद्यमानत्व ] हेतु [ अर्थात्
चतूरूपता ] अनुमाननिरूपणम् ८६
सिद्धिः । पक्षधर्मताबलात्तु साध्यस्य पक्षसम्बन्धित्वं विशेषः सिद्ध्यति ।
पर्वतधर्मेण, धूमवत्त्वेन वह्निरपि पर्वतसम्बद्ध एवानुमीयते । अन्यथा
साध्यसामान्यस्य व्याप्तिग्रहादेव सिद्धेः कृतमनुमानेन ।
यस्त्वन्योऽप्यन्वयव्यतिरेकी हेतुः स सर्वः पञ्चरूपोपपन्न एव सद्धेतुः।
अन्यथा हेत्वाभासो अहेतुरिति यावत् ।
केवलान्वयी चतूरूपोपपन्न एव स्वसाध्यं साधयति । तस्य हि विपक्षाद्
व्यावृत्तिर्नास्ति, विपक्षाभावात् ।
केवलव्यतिरेकी च चतूरूपोपपन्न एव । तस्य हि सपक्षे सत्त्वं नास्ति,
सपक्षाभावात् ।
धूम ] की ‘पक्षधर्मता’ [ अर्थात् पर्वत में विद्यमानता ] के बल से सिद्ध होता है ।
क्योंकि अनुमान के दो अङ्ग होते हैं [ एक ] ‘व्याप्ति’ और [दूसरी] ‘पक्षधर्मता’ ।
उसमें व्याप्ति से [ जहाँ धूम होगा वहाँ अग्नि होगी इस प्रकार के ] साध्य
सामान्य की सिद्धि होती है। और पक्षधर्मता [ हेतु की पक्ष में विद्यमानता ]
के बल से साध्य [ अग्नि ] के पक्षसम्बन्धित [ अर्थात् पर्वत में विद्यमानत्व ] रूप
विशेष की सिद्धि होती है। पक्ष [ पर्वत ] के धर्म [ अर्थात् पर्वत में विद्यमान ]
रूप धूमवत्त्व से अग्नि भी पर्वत सम्बन्ध ही गृहीत [ अनुमित ] होता है । अन्यथा
[ पक्षधर्मता के अभाव में ] साध्यसामान्य [ जहाँ धूम होगा वहाँ अग्नि होगी इस
प्रकार ] के व्याप्तिग्रह से ही सिद्ध होने से अनुमान की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।
[ इसी प्रकार ] जो और भी ‘अन्वयव्यतिरेकी’ हेतु है वह सब ‘पञ्चरूपोपपन्न’
होने पर ही शुद्ध हेतु है । अन्यथा [ किसी एक भी रूप से रहित होने पर ] हेतु
के समान प्रतीत होने वाला [हेतुवदाभासमान हेत्वाभास] अहेतु [अशुद्ध हेतु] है।
[दूसरा] केवलान्वयी हेतु चार रूपों से युक्त होकर ही अपने साध्य को सिद्ध
करता है । उसमें विपक्ष से व्यावृत्ति [ रूप तृतीय धर्म ] नहीं होती क्योंकि
उसमें विपक्ष का अभाव होता है ।
और केवल व्यतिरेकी [ भी ] चार रूप से युक्त ही [ होता है ] क्योंकि
उसका ‘सपक्ष’ न होने से [ उसमें ] सपक्षसत्त्व नहीं होता ।
अन्वय और व्यतिरेक से, दो प्रकार की व्याप्ति के आधार पर ‘केवलान्वयी’
और ‘केवल व्यतिरेकी’ यह दो भेद हेतु के होते हैं । और तीसरा भेद इन दोनों
के सम्मिश्रण से ‘अन्वयव्यतिरेकी’ भेद के नाम से होता है। इन व्याप्तियों में से
‘अन्वयव्याप्ति’ भावभूत धूम तथा वह्नि आदि की, और व्यतिरेक व्याप्ति वह्नयभाव
६० तर्कभाषा [ हेत्वाभासाः
के पुनः पक्ष-सपक्ष-विपक्षाः ? उच्यन्ते । सन्दिग्धसाध्यधर्मा धर्मी पक्षः।
यथा धूमानुमाने पर्वतः पक्षः । सपक्षस्तु निश्चितसाध्यधर्मा धर्मी । यथा
महानसो धूमानुमाने । विपक्षस्तु निश्चितसाध्याभाववान् धर्मी । यथा
तत्रैव महाह्रद इति ।
तदेवमन्वयव्यतिरेकि-केवलान्वयि-केवलव्यतिरेकिणो दर्शिताः ।
अतोऽन्ये हेत्वाभासाः । ते च असिद्ध-विरुद्ध-अनैकान्तिक-प्रकरणसम-काला-
त्यापदिष्टभेदात् पञ्चैव ।
तथा धूमाभाव रूप अभावों की होती है। केवलान्वयी में अन्वय व्याप्ति का ही
उदाहरण मिलता है, व्यतिरेक व्याप्ति का नहीं । इसलिए उसमें 'विपक्ष' कोई
होता ही नहीं । अतः विपक्ष के न होने से 'विपक्षव्यावृत्तत्व' रूप धर्म उसमें
नहीं बन सकता है । अतः वह चार रूप से ही युक्त होता है। इसी प्रकार
'केवलव्यतिरेकी' हेतु में व्यतिरेक व्याप्ति का ही उदाहरण मिलता है अन्वय-
व्याप्ति का नहीं । अतः उसका 'सपक्ष' कोई न होने से उसमें 'सपक्षसत्त्व' रूप
धर्म नहीं बन सकता है । अतः वह भी चार रूप से ही युक्त होता है। इस प्रकार
'अन्वयव्यतिरेकी' हेतु 'पञ्चरूपोपपन्न' होने पर तथा 'केवलान्वयी' और 'केवल-
व्यतिरेकी' हेतु चार रूपों से युक्त होने पर ही अपने साध्य को सिद्ध कर सकते
हैं । इन धर्मों में कमी होने पर हेत्वाभास हो जाते हैं ।
[ प्रश्न ] अच्छा फिर पक्ष, सपक्ष और विपक्ष कौन [ कहलाते ] हैं।
[ उत्तर ] कहते हैं । सन्दिग्ध साध्यधर्म से युक्त धर्मी [पर्वतादि] पक्ष [होता]
है । जैसे धूम [ लिङ्गक ] अनुमान में पर्वत पक्ष है । [ क्योंकि उसमें अग्नि है या
नहीं यह सन्देह रहता ही है अतः 'सन्दिग्धसाध्यवान्' होने से पर्वत 'पक्ष'
कहलाता है ] निश्चित साध्यधर्म से युक्त धर्मी सपक्ष [ कहलाता ] है । जैसे धूम
[ लिङ्गक उक्त ] अनुमान में महानस [ रसोई घर में अग्नि का निश्चय होने से
वह 'सपक्ष' कहलाता है ] और निश्चित रूप से साध्याभाव युक्त धर्मी विपक्ष
[ कहलाता ] है । जैसे उसी [ धूमलिङ्गक अनुमान ] में महाह्रद ।
इस प्रकार १ अन्वयव्यतिरेकी, २ केवलान्वयी और ३ केवलव्यतिरेकी [तीनों
प्रकार के हेतु ] प्रदर्शित कर दिए ।
इस प्रकार यहाँ तक अनुमान का सामान्यतः निरूपण किया गया इसके
आगे इस अनुमान प्रकरण के अन्तिम भाग हेत्वाभासों का विवेचन किया जायगा ।
इन [ त्रिविध शुद्ध हेतुओं ] के अतिरिक्त अन्य [ सब ] हेत्वाभास होते हैं ।
और वह १ असिद्ध, २ विरुद्ध, ३ अनैकान्तिक, ४ प्रकरणसम तथा ५ कालात्य-
यापदिष्ट भेद से पाँच प्रकार के ही होते हैं ।
असिद्धः ] अनुमाननिरूपणम् ६१
१ तत्र लिङ्गत्वेनासिद्धो हेतुरसिद्धः। तत्रासिद्धस्त्रिविधः । आश्रयासिद्धः
स्वरूपासिद्धः, व्याप्यत्वासिद्धश्चेति ।
आश्रयासिद्धो यथा गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात् सरोजार-
विन्दवत् । अत्र गगनारविन्दमाश्रयः, स च नास्त्येव ।
स्वरूपासिद्धो यथा, अनित्यः शब्दः चाक्षुषत्वात् घटवत् । अत्र चाक्षु-
षत्वं हेतुः, स च शब्दे नास्त्येव, तस्य श्रावणत्वात् ।
व्याप्यत्वासिद्धस्तु द्विविधः । एको व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात् । अपर-
१ उनमें लिङ्गत्वरूप से अनिश्चित हेतु 'असिद्ध' [नामक हेत्वाभास कहलाता]
है। वह असिद्ध तीन प्रकार का होता है। १ 'आश्रयासिद्ध', २ 'स्वरूपासिद्ध'
और ३ व्याप्यत्वासिद्ध' ।
[ इनमें आश्रयासिद्ध का लक्षण है, 'यस्य हेतोराश्रयो नावगम्यते स आश्रया-
सिद्धः' जिस हेतु का आश्रय अर्थात् पक्ष न हो उसको आश्रयासिद्ध कहते हैं । ]
आश्रयासिद्ध 'जैसे [गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरोजारविन्दवत् ।'] आकाश
कमल सुगन्धित होता है, कमल होने से, सरोज कमल के समान । यहाँ [ इस
अनुमान में ] आकाश कमल [ गगनारविन्द ] आश्रय [ हेतु का आश्रय अर्थात्
पक्ष ] है और वह [ वस्तुतः ] है ही नहीं। [ अतः आश्रय अर्थात् पक्ष के न
होने से अरविन्दत्वात् हेतु आश्रयासिद्ध नामक हेत्वाभास कहलाता है ]
असिद्ध का दूसरा भेद 'स्वरूपासिद्ध' है । 'स्वरूपासिद्ध' का लक्षण है 'यो
हेतुराश्रये नावगम्यते स स्वरूपासिद्धः।' जो हेतु आश्रय में न पाया जाय उसको
स्वरूपासिद्ध कहते हैं । आश्रयासिद्ध का लक्षण 'यस्य हेतोराश्रयो नावगम्यते
स आश्रयासिद्धः' यह किया था और स्वरूपासिद्ध का लक्षण 'यो हेतुराश्रये
नावगम्यते स स्वरूपासिद्धः' यह किया गया है । अर्थात् जिस हेतु का आश्रय
तो हो, परन्तु हेतु उस आश्रय अर्थात् पक्ष में न रहता हो उसको 'स्वरूपासिद्ध'
कहते हैं। 'आश्रयासिद्ध' में तो आश्रय या पक्ष का अस्तित्व ही नहीं होता परन्तु
'स्वरूपासिद्ध' में आश्रय या पक्ष का अस्तित्व तो होता है लेकिन हेतु उस
आश्रय या पक्ष में नहीं रहता है अतः उसको 'स्वरूपासिद्ध' कहते हैं। यह
आश्रयासिद्ध और 'स्वरूपासिद्ध' का भेद हुआ ।
स्वरूपासिद्ध जैसे शब्द अनित्य है, चाक्षुष [ अर्थात् चक्षु से ग्राह्य ] होने से,
घट के समान । यहाँ चाक्षुषत्व हेतु है, और वह [ आश्रय या पक्ष रूप ] शब्द में
नहीं रहता । उस [ शब्द ] के श्रावण [ अर्थात् श्रोत्र ग्राह्य ] होने से ।
[ असिद्ध का तीसरा भेद 'व्याप्यत्वासिद्ध' है। जिसकी व्याप्ति सिद्ध न हो
उसको व्याप्यत्वासिद्ध कहते हैं ] व्याप्यत्वासिद्ध दो प्रकार का होता है। एक
६२ तर्कभाषा [ व्याप्यत्वासिद्धः
स्तूपधिसद्भावात् । तत्र प्रथमो यथा, शब्दः क्षणिकः सत्त्वात् । यत्सत्
तत्क्षणिकं यथा जलधरपटलं तथा च शब्दादिति । न च सत्त्वक्षणिक-
त्वयोर्व्याप्तिग्राहकं प्रमाणमस्ति । सोपाधिकतया व्याप्यत्वासिद्धौ उच्य-
मानायां क्षणिकत्वमन्यप्रयुक्तमित्यभ्युपगतं स्यात् ।
'व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात् ।' अर्थात् व्याप्तिग्राहक प्रमाण का अभाव होने से और
दूसरा उपाधि का सद्भाव होने से । उनमें से प्रथम [ व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात्
व्याप्यत्वासिद्ध का उदाहरण ] जैसे शब्द क्षणिक है सत् होने से । जो सत् होता है
वह क्षणिक होता है जैसे मेघसमूह । शब्द भी वैसा [ मेघसमूह के समान सत् ]
ही है। और [यहाँ यत्सत् तत्क्षणिकं जो सत् है वह क्षणिक होता है यह सत्त्व और
क्षणिकत्व की व्याप्ति बनती है परन्तु इस ] सत्त्व तथा क्षणिकत्व की व्याप्ति का
ग्राहक कोई प्रमाण नहीं है [ उसके विपरीत प्रत्यक्ष रूप से घटादि सत् पदार्थ
स्थिर ही दिखाई देते हैं। इसलिए व्याप्तिग्राहक प्रमाण के अभाव में यह सत्त्व
हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास होता है।] सोपाधिक होने से यदि इसको व्याप्यत्वा-
सिद्ध कहा जाय तो [ शब्दादि में ] अन्य [ उपाधिभूत धर्म ] प्रयुक्त क्षणिकत्व
है यह मानना होगा । [ जो कि नैयायिकों को अभीष्ट नहीं है ]
इसका अभिप्राय यह है कि 'व्याप्यत्वासिद्ध' दो प्रकार का माना है । एक
व्याप्ति-ग्राहक-प्रमाण के अभाव में और दूसरा उपाधि के सद्भाव में । उनमें
से व्याप्ति-ग्राहक-प्रमाणाभाव वाले 'व्याप्यत्वासिद्ध' का उदाहरण यह दिया है ।
यहाँ शङ्का यह हो सकती है कि इसको भी 'उपाधिसद्भावमूलक' 'व्याप्यत्वासिद्ध'
ही क्यों न मान लिया जाय । इसका उत्तर यह है कि उपाधि स्थल में साध्य का
अस्तित्व तो स्वीकार करना ही होता है। अन्तर केवल इतना होता है कि उस
साध्य का प्रयोजक या कारण हेतु रूप में प्रयुक्त धर्म नहीं, अपितु उपाधिभूत
धर्म होता है । जैसे ऊपर पृष्ठ ७५ पर दिए हुए 'स श्यामः, मैत्रीतनयत्वात्,
परिदृश्यमानमैत्रीतनयस्तोमवत्' इत्यादि उदाहरणों में श्यामत्व का प्रयोजक 'मैत्री-
तनयत्व' को नहीं अपितु 'उपाधिभूत' 'शाकपाकजन्यत्व' को माना जाता है। इसी
प्रकार यहाँ यदि सत्त्व और क्षणिकत्व की व्याप्ति में कोई उपाधिभूत धर्म बनाया
जाय तो उसका परिणाम यह होगा कि जैसे मैत्री के तनयों में रहने वाले श्यामत्व
का प्रयोजक 'मैत्रीतनयत्व' न होकर 'शाकपाकजन्यत्व' को मानते हैं। इसी प्रकार
यहाँ क्षणिकत्व का प्रयोजक सत्त्व के बजाय किसी अन्य धर्म को माना जायगा।
परन्तु सिद्धान्त पक्ष यह है कि उदाहरणभूत घटादि में क्षणिकत्व ही नहीं
है। यदि सत्त्व हेतु को सोपाधिक कहेंगे तो घटादि में क्षणिकत्व तो है परन्तु
उसका कारण या प्रयोजक सत्त्व नहीं अपितु अन्य कोई उपाधिभूत धर्म है यह