तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंकेवलान्वयी हेतुः ] अनुमाननिरूपणम् ८५
अत्र च व्यवहारः साध्यो न तु प्रमाणत्वं, तस्य प्रमाकरणत्वाद्धेतोर-
भेदेन साध्याभेददोषप्रसङ्गात् । तदेवं केवलव्यतिरेकिणो दर्शिताः ।
कश्चिदन्यो हेतुः केवलान्वयी । यथा शब्दोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् ।
यत्प्रमेयं तदभिधेयं यथा घटः । तथा चायं तस्मात्तथेति । अत्र शब्दस्या-
भिधेयत्वं साध्यं प्रमेयत्वं हेतुः । स च केवलान्वय्येव । यदभिधेयं न
भवति तत्प्रमेयमपि न भवति यथामुक इति व्यतिरेकदृष्टान्ताभावात् ।
सर्वत्र हि प्रामाणिक एवार्थो दृष्टान्तः । स च प्रमेयश्चाभिधेयश्चेति ।
प्रमाकरण होता है वह प्रमाण होता है जैसे अमुक इस प्रकार का अन्वय दृष्टान्त
नहीं है। प्रमाणमात्र के पक्ष कोटि में होने से। इसलिए यह 'केवल व्यतिरेकी' हेतु है।
यहाँ [ प्रत्यक्षादिकं प्रमाणमिति व्यवहर्त्तव्यं प्रमाकरणत्वात् इस अनुमान में ]
व्यवहार साध्य है, प्रमाणत्व नहीं । उस [ प्रमाणत्व ] के प्रमाकरणत्व [ रूप ]
हेतु से अभिन्न होने से साध्याभेद [ हेतु और साध्य का अभेद रूप ] दोष प्राप्त
हो जाने से । [ इस लिए यहाँ प्रमाणत्व साध्य नहीं है अपितु प्रमाण व्यवहार
साध्य है । ]
इस प्रकार केवल व्यतिरेकी [ हेतु के तीन उदाहरण ] दिखा दिए । [ आगे
केवलान्वयी हेतु का वर्णन करते हैं ]
कोई हेतु 'केवलान्वयी' होता है। जैसे शब्द 'अभिधेय' [किसी शब्द द्वारा कथन
करने योग्य] है 'प्रमेय' [ ज्ञान प्रमा का विषय ] होने से । जो 'प्रमेय होता है सो
'अभिधेय' होता है जैसे घट, यह [शब्द] भी उसी प्रकार का [प्रमेय] है, अतएव
वैसा ही [ अभिधेय ] है। यहाँ शब्द का 'अभिधेयत्व' साध्य है, 'प्रमेयत्व' हेतु है,
और वह 'केवलान्वयी' ही है। [ क्योंकि उसकी ] जो अभिधेय नहीं होता है वह
प्रमेय भी नहीं होता है [ इस व्यतिरेक व्याप्ति में ] जैसे अमुक इस प्रकार का
'व्यतिरेक दृष्टान्त' नहीं मिलता है। [ क्योंकि ] सर्वत्र [ प्रत्यक्षादि प्रमाणों से
ज्ञात होने वाला ] प्रामाणिक अर्थ ही दृष्टान्त हो सकता है और वह प्रमेय भी
होता है और अभिधेय भी । [ इसलिए व्यतिरेक व्याप्ति में यहाँ उदाहरण नहीं
मिल सकता है। अतः यह हेतु 'केवलान्वयी' हेतु ही है। ]
इस प्रकार १ अन्वयव्यतिरेकी, २ केवलव्यतिरेकी और ३ केवलान्वयी तीनों
हेतुओं का उदाहरण सहित प्रदर्शन कर दिया । अब आगे हेतु के पाँच रूपों
का वर्णन करते हैं। इन पाँच रूपों से युक्त हेतु ही ठीक हेतु या शुद्ध हेतु
कहलाते हैं। उसमें से किसी एक भी रूप की कमी हो जाने पर वह हेतु शुद्ध
हेतु नहीं अपितु हेत्वाभास हो जाते हैं और अपने साध्य की सिद्धि करने में
असमर्थ हो जाते हैं। यही बात आगे कहते हैं ।