तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंएषमसत्प्रतिपक्षत्वम्-असन् प्रतिपक्षो यस्येत्यसत्प्रतिपक्षं धूमवत्त्वं हेतुः।
तथाहि, साध्यविपरीतसाधकं हेत्वन्तरं प्रतिपक्ष इत्युच्यते । स च
धूमवत्त्वे हेतौ नास्त्येवानुपलम्भात् ।
तदेवं पञ्चरूपाणि धूमवत्त्वे हेतौ विद्यन्ते । तेनैतद् धूमवत्त्वमग्नि-
मत्त्वस्य गमकम्, अग्निमत्त्वस्य साधकम् ।
अग्नेः पक्षधर्मत्वं हेतोः पक्षधर्मताबलात् सिद्ध्यति । तथाहि, अनु-
मानस्य द्वे अङ्गे, व्याप्तिः पक्षधर्मता च । तत्र व्याप्त्या साध्यसामान्यस्य
अर्थात् खण्डित नहीं है [ अर्थात् पर्वत में वह्नि का अभाव किसी प्रमाण से
गृहीत नहीं है। अतः यह धूमवत्त्व हेतु 'अबाधित' विषय है।]
इस प्रकार धूमवत्त्व हेतु में पांचवां धर्म 'असत्प्रतिपक्षत्व' भी है। 'असत्प्रति-
पक्ष' को समझने के लिए पहिले उसके विरोधी 'सत्प्रतिपक्ष' को समझना
चाहिए। जिस हेतु का प्रतिपक्ष विद्यमान है उसको सत्प्रतिपक्ष कहते हैं।
प्रतिपक्ष का लक्षण 'साध्यविपरीतसाधकं तुल्यबलं हेत्वन्तरं प्रतिपक्षः' है। एक
हेतु का जो साध्य है उससे विपरीत बात को सिद्ध करनेवाला तुल्यबल दूसरा
हेतु 'प्रतिपक्ष' कहलाता है। जिस हेतु का इस प्रकार का प्रतिपक्ष विद्यमान है
उसको 'सत्प्रतिपक्ष' हेत्वाभास कहते हैं। जैसे 'शब्दो नित्यः अनित्यधर्मानुप-
लब्धेः' और 'शब्दः अनित्यो नित्यधर्मानुपलब्धेः' यह दोनों तुल्यबल विरोधी
हेतु हैं। अतः यह एक दूसरे के 'प्रतिपक्ष' हैं और वह दोनों हेतु 'सत्प्रतिपक्ष'
नामक हेत्वाभास कहे जाते हैं। परन्तु प्रकृत धूमवत्त्व हेतु का इस प्रकार का
साध्यविपरीत साधक तुल्यबलविरोधी कोई दूसरा हेतु नहीं पाया जाता है।
अतएव वह 'सत्प्रतिपक्ष' नहीं है। अर्थात् उसमें 'असत्प्रतिपक्षत्व' रूप पञ्चम
हेतुरूप भी विद्यमान है। अतः धूमवत्त्व हेतु 'पञ्चरूपोपपन्न' होने से 'सद् हेतु'
है। यही बात ग्रन्थकार आगे प्रतिपादित करते हैं—
इस प्रकार असत्प्रतिपक्षत्व [ धर्म भी धूमवत्त्व हेतु में है। असत्प्रतिपक्ष का
अर्थ है ] अविद्यमान है प्रतिपक्ष जिसका इस प्रकार का असत्प्रतिपक्ष धूमवत्त्व हेतु
है। क्योंकि [ एक हेतु के ] साध्य के विपरीत [ अर्थ ] को सिद्ध करने वाले दूसरे
हेतु को प्रतिपक्ष कहते हैं। और वह [ प्रतिपक्ष रूप साध्य विपरीत साधक तुल्य-
बल हेत्वन्तर ] धूमवत्त्व हेतु में उपलब्ध'न होने से नहीं है।
इस प्रकार धूमवत्त्व हेतु में पांचों रूप विद्यमान हैं। इसलिए धूमवत्त्व अग्नि-
मत्त्व का बोधक अग्निमत्त्व का साधक [ शुद्ध हेतु ] है।
अग्नि का 'पक्षधर्मत्व' [ अर्थात् पक्ष रूप पर्वत में विद्यमानत्व ] हेतु [ अर्थात्