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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 330 में से

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पृष्ठ 151

८६ तर्कभाषा [ पञ्चरूपाणि
एतेषां च अन्वयव्यतिरेकि-केवलान्वयि-केवलव्यतिरेकि-हेतूनां
त्रयाणां मध्ये यो हेतुरन्वयव्यतिरेकी स पञ्चरूपोपपन्न एव स्वसाध्यं
साधयितुं क्षमते, नत्वेकेनापि रूपेण हीनः । तानि पञ्चरूपाणि पक्षसत्त्वं,
सपक्षसत्त्वं, विपक्षव्यावृत्तिः, अबाधितविषयत्वं, असत्प्रतिपक्षत्वं चेति ।
और इन १ अन्वयव्यतिरेकी, २ केवलान्वयी तथा ३ केवलव्यतिरेकी तीनों
हेतुओं में से जो अन्वयव्यतिरेकी हेतु है वह पाँच रूपों से युक्त होने पर ही अपने
साध्य को सिद्ध करने में समर्थ होता है । एक भी रूप से हीन होने पर नहीं । वे
पाँच रूप [ निम्न प्रकार के हैं ] —
१ पक्षसत्त्व [ पक्षधर्मत्व ], २ सपक्षसत्त्व, ३ विपक्षव्यावृत्तत्व, ४ अबाधित-
विषयत्व और ५ असत्प्रतिपक्षत्व ।
इन पञ्च रूपों में 'पक्ष' सपक्ष' और 'विपक्ष' शब्द आए हैं । उनको समझे
बिना इनका समझना कठिन होगा । इसलिए पहिले 'पक्ष' 'सपक्ष' 'विपक्ष' को
समझ लेना चाहिए । इन तीनों के लक्षण 'सन्दिग्धसाध्यवान् पक्षः', 'निश्चित-
साध्यवान् सपक्षः', और 'निश्चितसाध्याभाववान् विपक्षः' इस प्रकार किए गए
हैं । अर्थात् जिसमें साध्य वह्नि आदि सन्दिग्ध अवस्था में हों उसको 'पक्ष'
कहते हैं । जैसे 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि अनुमान में पर्वत में अग्नि की सिद्धि
की जा रही है । जब तक अग्नि की सिद्धि न हो जाय तब तक पर्वत में वह्नि
का सन्देह ही है । इसलिए सन्दिग्धसाध्यवान् होने से पर्वत 'पक्ष' कहलाता
है । और धूम हेतु उसमें रहता है । यह उस धूम हेतु का प्रथम रूप 'पक्षसत्त्व'
हुआ । दूसरा शब्द 'सपक्ष' है । 'सपक्ष' उसको कहते हैं जिसमें साध्य वह्नि
आदि का निश्चय हो । 'निश्चितसाध्यवान् सपक्षः' । निश्चित साध्य से युक्त धर्मी
को 'सपक्ष' कहते हैं । जैसे उपर्युक्त वह्नि के अनुमान में महानस अर्थात्
रसोईघर 'सपक्ष' है क्योंकि उनमें साध्य वह्नि का निश्चय है । इस सपक्ष रूप
महानस में धूम रूप हेतु रहता है । यह हेतु धूम का दूसरा रूप 'सपक्षसत्त्व'
हुआ । तीसरा शब्द 'विपक्ष' है । विपक्ष का लक्षण 'निश्चितसाध्याभाववान्
विपक्षः' है । अर्थात् जिसमें साध्य का अभाव निश्चित हो उसको 'विपक्ष' कहते
हैं । जैसे उपर्युक्त अनुमान में महाह्रद 'विपक्ष' है । क्योंकि महाह्रद अर्थात्
तालाब में, साध्यरूप वह्नि का अभाव निश्चित है । इसलिए महाह्रद 'विपक्ष'
कहलाता है । उस महाह्रद रूप विपक्ष में धूम भी नहीं रहता है । यह उसका
तीसरा रूप 'विपक्षव्यावृत्तत्व' हुआ ।