तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चरूपाणि ] अनुमाननिरूपणम् ८७
एतानि तु पञ्चरूपाणि धूमवत्त्वादौ अन्वयव्यतिरेकिणि हेतौ
विद्यन्ते । तथाहि, धूमवत्त्वं पक्षस्य पर्वतस्य धर्मः । पर्वते तस्य विद्यमा-
नत्वात् । एवं सपक्षे सत्त्वम् , सपक्षे महानसे तद् विद्यत इत्यर्थः । एवं
विपक्षान्महाह्रदाद् व्यावृत्तिस्तत्र नास्तीत्यर्थः ।
एवमबाधितविषयत्वं धूमवत्त्वम् । तथाहि धूमवत्त्वस्य हेतोर्विषयः साध्य-
धर्मस्तच्चाग्निमत्त्वम् , तत्केनापि प्रमाणेन न बाधितं न खण्डितमित्यर्थः ।
यह पाँचों रूप तो धूमवत्त्व आदि 'अन्वयव्यतिरेकी' हेतु में विद्यमान हैं। क्योंकि
उस [ धूम ] के पर्वत में विद्यमान होने से धूमवत्त्व पक्ष का धर्म है। इसी प्रकार
'सपक्षसत्त्व' है। 'सपक्ष' अर्थात् महानस में वह [ धूमवत्त्व ] विद्यमान है [ अतः
सपक्षसत्त्व भी धूमवत्त्व हेतु में पाया जाता है] इसी प्रकार 'विपक्ष' अर्थात् महाह्रद
से व्यावृत्ति [ भी ] है । अर्थात् उस [ महाह्रद रूप विपक्ष ] में [ धूमवत्त्व हेतु ]
नहीं [ रहता ] है।
इसी प्रकार धूमवत्त्व हेतु 'अबाधित विषय' भी है । 'अबाधित विषय' पद से
'विषय' शब्द का अर्थ साध्य है । अबाधित विषय को समझने के लिए पहिले
बाधित विषय को समझना चाहिए । बाधित विषय का लक्षण 'प्रमाणान्तराव-
धृतसाध्याभावो हेतुर्बाधितविषयः' इस प्रकार किया गया है। जिस हेतु के 'विषय'
अर्थात् साध्य का अभाव किसी प्रमाणान्तर अर्थात् प्रबलतर दूसरे प्रमाण से
निश्चित हो उस हेतुको 'बाधितविषय' कहते हैं। जैसे कोई यह अनुमान प्रस्तुत
करे कि 'वह्निरनुष्णः कृतकत्वात् घटवत् ।' अग्नि कृतक होने से घट के समान
अनुष्ण अर्थात् शीतल है। घट कृतक अर्थात् जन्य है और अनुष्ण है। इसी
प्रकार अग्नि भी जन्य होने से घट के समान अनुष्ण है । इस अनुमान में अग्नि
'पक्ष' है उसमें 'अनुष्णत्व' 'साध्य' है और कृतकत्व 'हेतु' है। इस 'कृतकत्व'
हेतु का जो साध्य 'अनुष्णत्व' है उसका अभाव अर्थात् 'उष्णत्व' अग्नि में स्पर्श
द्वारा त्वाच-प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है। इसलिए 'त्वाचप्रत्यक्ष' रूप प्रमाणान्तर
से 'कृतकत्वात्' इस हेतु के विषय अर्थात् साध्य रूप अनुष्णत्व का अभाव
'उष्णत्व' अग्नि में पूर्व सिद्ध होने से यह 'बाधितविषय' नाम का हेत्वाभास
कहलाता है। इसी प्रकार यदि वह्निविषयक अनुमान में प्रयुक्त धूमवत्त्व हेतु
के साध्य रूप वह्नि का पर्वत में किसी प्रबल प्रमाणान्तर से अभाव निश्चित होता
तो धूमवत्त्व हेतु 'बाधितविषय' कहा जाता । परन्तु ऐसा नहीं है इसलिए—
इस प्रकार धूमवत्त्व हेतु 'अबाधित-विषय' है। क्योंकि धूमवत्त्व हेतु का विषय
अर्थात् साध्य जो कि अग्निमत्त्व है वह [पर्वत रूप पक्ष में] किसी प्रमाण से बाधित