तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
षोढा सन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५७
घटाद्यभावो विशेषणं, भूतलं विशेष्यम् । यदा च मनःसंयुक्त आत्मनि
सुखाद्यभावो गृह्यते 'अहं सुखरहित' इति, तदा मनःसंयुक्तस्यात्मनः
सुखाद्यभावो विशेषणम् । यदा श्रोत्रसमवेते गकारे घत्वाभावो गृह्यते
तदा श्रोत्रसमवेतस्य गकारस्य घत्वाभावो विशेषणम् ।
तदेवं संक्षेपतः पञ्चविधसम्बन्धान्यतमसम्बन्धसम्बद्धविशेषणविशे-
ष्यभावलक्षणेनेन्द्रियार्थसन्निकर्षेण अभाव इन्द्रियेण गृह्यते ।
उसका विशेषण है। भूतल और घट का संयोग संबन्ध है। इस लिये
भूतल में घट संयोग सम्बन्ध से विशेषण है, यह कहा जा सकता है। इसी
प्रकार 'पटवन्तस्तन्तवः' इस प्रतीति में तन्तु विशेष्य है पट विशेषण है। इन
दोनों का समवाय सम्बन्ध है। इसलिए तन्तु में पट समवाय सम्बन्ध से विशेषण
है। इस प्रकार विशेषण विशेष्यभाव सम्बन्ध के अन्तर्गत कोई एक सम्बन्ध
और होना चाहिए। वह सम्बन्ध ऊपर गिनाए हुए सम्बन्धों में से ही कोई हो
सकता है। ऊपर इन्द्रिय और अर्थ के छः प्रकार के सम्बन्ध गिनाए हैं। इनमें
से एक तो स्वयं विशेष्यविशेषण भाव ही है। इसलिए उसको छोड़कर शेष
पाँच सम्बन्ध और रह जाते हैं जो इस विशेष्यविशेषण भाव सम्बन्ध के
नियामक हो सकते हैं इसलिए उन पञ्चविध सम्बन्धों में से अन्यतम सम्बन्ध
से घटादि विशेषण भूतलादि विशेष्य के साथ सम्बद्ध हो सकते हैं। और जिस
सम्बन्ध से घटादि भाव पदार्थ भूतलादि में विशेषण होते हैं उन घटादि का
अभाव भी उसी सम्बन्ध से भूतल आदि में विशेषण होता है। इसलिए पूर्वोक्त
पञ्चविध सम्बन्ध में से अन्यतम सम्बन्ध द्वारा घटाभावादि भूतलादि में विशेष्य
या विशेषण हो सकते हैं। इसी विशेष्यविशेषण भाव से चक्षुः आदि द्वारा
घटाभावादि का ग्रहण होता है। ऊपर संयोग सम्बन्ध का उदाहरण दिया था,
आगे समवायादि सम्बन्ध के भी उदाहरण देकर इस बात को स्पष्ट करेंगे।
और जब मन से संयुक्त आत्मा में सुखादि [गुणों] का अभाव 'मैं सुखरहित
हूँ' इस रूप में गृहीत होता है तब मन से संयुक्त आत्मा में सुखाभाव [समवाय
सम्बन्ध से] विशेषण होता है। [और] जब श्रोत्र में समवायसम्बन्ध से रहने
वाले गकार में घत्व आदि [जाति] का अभाव गृहीत होता है तब श्रोत्रसमवेत
गकार का घत्वाभाव [समवेत समवाय सम्बन्ध से] विशेषण होता है। [और
उनका ग्रहण विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध से होता है]
इस प्रकार संक्षेप में [१ संयोग, २ संयुक्तसमवाय, ३ संयुक्तसमवेतसमवाय,
४ समवाय और ५ समवेतसमवाय इन] पाँच प्रकार के सम्बन्धों में किसी एक
५८ तर्कभाषा [ षोढा सन्निकर्षः
एवं समवायोऽपि । चक्षुःसम्बद्धस्य तन्तोर्विशेषणभूतः पटसमवायो
गृह्यते 'इह तन्तुषु पटसमवाय' इति ।
तदेवं षोढा सन्निकर्षो वर्णितः । संग्रहश्च—
अक्षजा प्रमितिर्द्वेधा सविकल्पाविकल्पिका ।
करणं त्रिविधं तस्याः सन्निकर्षश्च षड्विधः ॥
घट—तन्नील—नीलत्व—शब्द--शब्दत्वजातयः ।
अभावसमवायौ च ग्राह्याः सम्बन्धषट्कतः ॥
सम्बन्ध से सम्बद्ध विशेष्यविशेषणभाव रूप इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से
अभाव का इन्द्रिय द्वारा [ ही ] ग्रहण किया जाता है ।
इसी प्रकार समवाय भी [विशेष्य विशेषण भाव सम्बन्ध द्वारा] इन्द्रिय से ही
गृहीत होता है । चक्षु से संयुक्त तन्तु का विशेषणभूत पटसमवाय 'इन तन्तुओं में
पटसमवाय [ सम्बन्ध से ] है' इस [प्रतीति] में [विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध से ]
गृहीत होता है ।
इस प्रकार छः प्रकार के सन्निकर्ष का वर्णन किया गया । और [ इस सब ]
विषय का [ संग्रह ] संक्षेप [ इस प्रकार ] है ।
[ इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न ] इन्द्रियजन्य [ प्रत्यक्ष ] प्रमिति
दो प्रकार की है एक सविकल्पक और दूसरा निर्विकल्पक । उस [ प्रत्यक्ष प्रमा ]
के करण [ १ कभी इन्द्रिय २ कभी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष, और ३ कभी निर्विकल्पक
ज्ञान ] तीन प्रकार के हैं और [ इन्द्रिय तथा अर्थ का ] सन्निकर्ष [ १ संयोग,
२ संयुक्तसमवाय, ३ संयुक्तसमवेतसमबाय, ४ समवाय, ५ समवेतसमवाय और
३ विशेष्यविशेषणभाव ] छः प्रकार का है ।
[ इस छः प्रकार के सन्निकर्ष से क्रमशः ] १ घट [का १ संयोग सम्बन्ध से]
[ घट ] में रहने वाले नील [ रूप गुण का ग्रहण संयुक्तसमवायसम्बन्ध से और
उस नील गुण में रहने वाली जाति ] नीलत्व [ का ३ संयुक्तसमवेतसमवाय
सम्बन्ध से तथा ] शब्द [ रूप गुण का कर्णाशष्कुली से अवच्छिन्न आकाश रूप
श्रोत्र से समवाय सम्बन्ध से ] और [ उस शब्द में रहने वाली ] शब्दत्व जाति
[ का समवेतसमवाय सम्बन्ध से ] तथा अभाव और समवाय [ का विशेष्य-
विशेषणभाव से ] का छः सम्बन्धों से [ यथाक्रम ] ग्रहण होता है ।
अलौकिक सन्निकर्ष—
ऊपर जिन छः प्रकार के इन्द्रियार्थसन्निकर्षों का वर्णन किया है वे सब
लौकिक सन्निकर्ष हैं । इनके अतिरिक्त तीन प्रकार के अलौकिक सन्निकर्ष भी
अलौकिकसन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५६
माने गये हैं। १ 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' २ 'ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति' और
३ 'योगज प्रत्यासत्ति' । इनका वर्णन करते हुये 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावलीकार'
श्री विश्वनाथ ने लिखा है—
'अलौकिकस्तु व्यापारस्त्रिविधः परिकीर्तितः ।
सामान्यलक्षणो ज्ञानलक्षणो योगजस्तथा ॥'
१ इनमें से योगज सन्निकर्ष सबसे अधिक स्पष्ट है। योगियों को भूत,
भविष्यत्, सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट सभी वस्तुओं का प्रत्यक्ष हो सकता है।
व्यवहित, भूत, भविष्यत् आदि की वस्तुओं के साथ लौकिक इन्द्रिय और अर्थ
का सन्निकर्ष नहीं बन सकता है अतएव वहां योगज सामर्थ्य से अलौकिक
इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष हो जाता है। वह भी 'युक्त' और 'युञ्जान' भेद से दो
प्रकार का होता है। 'युक्त' योगी को सर्वदा भान होता है और 'युञ्जान' को
चिन्ता करने से अर्थ का भान होता है।
'युक्तस्य सर्वदा भानं चिन्तासहकृतोऽपरः ।' १
२ 'ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति' का उदाहरण 'सुरभि चन्दनखण्डम्' यह ज्ञान है।
एक दिन बाजार में किसी ने चन्दन के टुकड़े को सूँघकर परीक्षा कर निश्चय कर
लिया कि यह सुगंधित चंदन का टुकड़ा है। दूसरे दिन किसी ग्राहक ने वह चंदन
का टुकड़ा उस व्यक्ति को दिखलाकर उसके विषय में उसकी सम्मति पूछी। तो उसने
दूर से ही उसको देखकर कहा कि यह सुगन्धित चन्दन है। यहाँ उसने चंदन
को आँख से तो देखा। परन्तु इस समय उसकी गन्ध को घ्राणेन्द्रिय से ग्रहण
नहीं किया है फिर भी 'सुरभिचन्दनखण्डम्' यह प्रतीति हो रही है। इस
प्रतीति में चन्दन, उसमें रहने वाली चन्दनत्व जाति, और उसके सौरभ गुण,
इन तीनों का प्रत्यक्ष होता है इसमें से चंदन के साथ चक्षु का संयोग सम्बन्ध, और
चन्दनत्व सामान्य के साथ संयुक्तसमवाय सम्बन्ध होता है। यह दोनों लौकिक
सन्निकर्ष के अन्तर्गत ही हैं। परंतु सौरभ के साथ तो चक्षु का लौकिक सन्निकर्ष
नहीं बन सकता है। अतएव उसके साथ 'ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति' रूप अलौकिक
सन्निकर्ष बनता है। यहाँ चक्षु का और सौरभ का चक्षुःसंयुक्तमनःसंयुक्तात्मस-
मवेतज्ञानरूपेण' अथवा 'चक्षुःसंयुक्तात्मसमवेतसंस्काररूपेण' अर्थात् चक्षु से संयुक्त
जो मन उससे संयुक्त जो आत्मा उस आत्मा में समवेत जो सौरभगुण का ज्ञान
अथवा उस सौरभज्ञान से उत्पन्न संस्कार के द्वारा चक्षुः से ही उस सौरभ का
अलौकिक सन्निकर्ष द्वारा ग्रहण हो जाता है। इसलिये सौरभ के चक्षु का विषय
१, २ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली ६३, ६६ ।
६० तर्कभाषा [ अलौकिकसन्निकर्षः
न होने पर भी ऐसे स्थल में ‘सुरभि चन्दनखण्डम् इस ज्ञान को चाक्षुष प्रत्यक्ष
मानते हैं । इसी के लिये नैयायिक ‘ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति’ स्वीकार करते हैं ।
३ तीसरी ‘सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति’ मानी जाती है । जब हम एक वस्तु
का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो उस प्रकार की समस्त वस्तुओं को अपने-आप
समझ लेते हैं । हर एक वस्तु के ज्ञान के लिये अलग प्रयत्न नहीं करना पड़ता
है । उनमें रहने वाले सामान्य धर्म के द्वारा एक वस्तु के ज्ञान से ही सजातीय
समस्त वस्तुओं का सामान्य ज्ञान हो जाता है । यह ज्ञान सामान्य के आधार
पर होता है इसलिये अन्य पदार्थों के साथ लौकिक सन्निकर्ष न होने पर भी सामान्य
द्वारा उन सबके साथ अलौकिक सन्निकर्ष हो जाने से उन सबका ज्ञान हो सकता
है । जैसे महानस में धूम और वह्नि को देखते हैं । तो वहाँ धूमत्व सामान्य से
समस्त धूमों का और वह्नित्व सामान्य से समस्त वह्नियों का प्रत्यक्ष हो जाता
है । तब ही धूम सामान्य और वह्नि सामान्य की व्याप्ति का ग्रहण होता है। इसके
लिये ‘सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति’ को भी एक अलौकिक सन्निकर्ष माना है ।
सामान्य-लक्षणा और ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति में परस्पर यह भेद है कि
सामान्य लक्षणा प्रत्यासत्ति में धूमत्व और वह्नित्व रूप सामान्य के आश्रयभूत
जो धूम और वह्नि हैं उनके साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष होता है और सामान्य के
द्वारा ही व्यवहित विप्रकृष्ट या अतीत, अनागत धूम और वह्नि रूप आश्रय के साथ
भी सन्निकर्ष होता है । परन्तु ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति में आश्रय के साथ नहीं
अपितु जिसका ज्ञान होता है उसी के साथ सन्निकर्ष होता है । ‘सुरभि चन्दन-
खण्डम्’ इस प्रतीति में चन्दनखण्ड के साथ नहीं अपितु साक्षात् सौरभ के साथ
ही ‘ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति’ से चक्षु का सन्निकर्ष होता है । और सामान्य-
लक्षणा के स्थल में धूमत्व और वह्नित्व सामान्य के साथ नहीं अपितु उनके
आधारभूत धूम और वह्नि के साथ सामान्य द्वारा इन्द्रिय का अलौकिक
सन्निकर्ष होता है । जैसा कि कहा भी है ।
‘आसत्तिराश्रयाणान्तु सामान्यज्ञानमिष्यते ।
विषयी यस्य तस्यैव व्यापारो ज्ञानलक्षणः ॥’
ज्ञानलक्षणा और सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति के विषय में सब लोग एक मत
नहीं हैं। स्वयं नैयायिकों में भी रघुनाथ शिरोमणि आदि सामान्यलक्षणा प्रत्या-
सत्ति को नहीं मानते हैं । परन्तु सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति मानने वालों का
कहना है कि यदि सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति न मानी जाय तो ‘धूमो वह्निव्याप्यो
१. न्यायमुक्तावली ६५
अलौकिकसन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६१
न वा' इस प्रकार का संशय ही नहीं बन सकता है। क्योंकि वर्तमान धूम और
वह्नि का तो सम्बन्ध गृहीत ही है। उनमें व्यभिचार शङ्का हो ही नहीं सकती ।
और कालान्तर देशान्तर के धूम का ग्रहण 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' द्वारा ही
हो सकता है अतएव 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' अवश्य माननी चाहिए । इसी
लिए आचार्य पक्षधर मिश्र ने 'सामान्यलक्षणा' को न मानने वाले श्रीरघुनाथ
शिरोमणि का, जो कि काणे थे, उपहास करते हुए कहा था:—
'वक्षोजपानकृत् काण ! संशये जाग्रति स्फुटे ।
सामान्यलक्षणा कस्मादकस्मादपलप्यते ॥'
तर्कभाषाकार ने केवल षोढा लौकिक सन्निकर्ष का ही प्रतिपादन किया है ।
अधिक क्लिष्ट होने से त्रिविध अलौकिक सन्निकर्ष का प्रतिपादन नहीं किया है ।
हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में इस त्रिविध अलौकिक सन्निकर्ष का निरूपण
इस प्रकार किया है—
इन्द्रियार्थसन्निकर्षं दर्शयति—
न्यायादौ प्राप्यकारित्वमिन्द्रियाणां यदिष्यते ।
तदिन्द्रियार्थसम्बन्धजिज्ञासां सन्तनोति वै ॥
लौकिकोऽलौकिकश्चेति स तु तावद् द्विधाकृतः ।
षड्विधो लौकिकस्तत्र त्रिविधश्चास्त्यलौकिकः ॥
अलौकिकं सन्निकर्षं त्रिधा विभजते—
ज्ञानलक्षणसम्बन्धस्तथा सामान्यलक्षणः ।
योगजश्चेति विज्ञेयस्त्रिविधोऽयमलौकिकः ॥
तत्र ज्ञानलक्षणप्रत्यासत्तिं दर्शयति—
चन्दनग्रहणे दूरात् सौरभं यत्तु गृह्यते ।
ज्ञानलक्षणसम्बन्धजन्यं तच्चाक्षुषं मतम् ॥
ज्ञानं गुणो निरंशोऽतो नांशभेदोऽत्र विद्यते ।
सौरभांशे स्मृतिर्नातो चाक्षुषं ज्ञानलक्षणात् ॥
सामान्यलक्षणप्रत्यासत्तिं दर्शयति—
धूमादिसहचारोऽयं सर्वधूमादिगोचरः ।
सन्, व्याप्तिं ग्राहयेत् तस्मान्मता सामान्यलक्षणा ॥
सर्वाग्निसहचारोऽयं धूमेष्वखिलकेषु च ।
कथं गृह्येत सामान्यलक्षणा चेन्न मन्यते ॥
१. दर्शन मीमांसा ४ ।
६२ तर्कभाषा [चाक्षुषे विज्ञानमतम्
धूमश्च वह्निव्याप्योऽयं न वेत्येवं हि संशयः ।
नोपपद्येत सामान्यलक्षणा चेन्न सम्भवेत् ॥
अत एव पुरा गीतं पद्यं पञ्चधरैरिदम् ।
श्रीमन्तं रघुनाथं तु समुद्दिश्य विनोदतः ॥
'वक्षोजपानकृत् काण ! संशये जाग्रति स्फुटे ।
सामान्यलक्षणा कस्मादकस्मादपलप्यते ॥
योगजप्रत्यासत्तिं दर्शयति—
सूक्ष्मे व्यवहिते दूरेऽतीतेऽर्थेऽनागते तथा ।
प्रत्यक्षं योगिनां ज्ञेयं सन्निकर्षस्तु योगजात्¹ ॥
चाक्षुषप्रत्यक्ष का वैज्ञानिक प्रकार ।
इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से अर्थ का ग्रहण होता है । इस प्रसङ्ग में
चक्षु के साथ घटादि अर्थों के सन्निकर्ष को लेकर बहुत चर्चा हुई है । चक्षु
शरीर देश में होती है और घटादि अर्थ शरीर से अलग भिन्न देश में होते हैं ।
ऐसी दशा में उन दोनों का सम्बन्ध कैसे होता है ? न तो अर्थ उठकर चक्षु के
पास आता है और न चक्षु चलकर घटादि अर्थ के पास जाती दीखती है । तब
उनका संयोग कैसे होता है । इस विषय में आधुनिक 'प्रकाश विज्ञान' का
सिद्धान्त यह है कि प्रकाश की जो किरणें पदार्थ पर पड़ती हैं वे वहाँ से प्रतिक्षिप्त
होकर देखने वाले की आँख तक पहुँचती हैं और देखने वाले के नेत्र की
कनीनिका के भीतर से जाकर 'रेटीना' नामक केन्द्र पर पदार्थ का प्रतिबिम्ब
उत्पन्न करती हैं । इसी से पदार्थ का दर्शन होता है । 'प्रकाश विज्ञान' का यह
भी सिद्धान्त है कि सामान्यतः प्रकाश की किरणें बिल्कुल सीधी चलती हैं ।
परन्तु जब उनकी गति के माध्यम में घन और विरल भाव का अन्तर होता है
तब किरणों का मार्ग एक नियमके अनुसार उस स्थान पर बनने वाले 'लम्ब' की
ओर या उससे दूर होता जाता है । यह किरणों का वक्रीभवन एक विशेष
बिन्दु जिसे वह 'क्रान्तिबिन्दु' [क्रिटिकल प्वाइंट] कहते हैं, तक होता है । उस
बिन्दु पर पहुँच कर किरण फिर उतने ही अंश का कोण बनाते हुए उल्टी
प्रतिक्षिप्त होने लगती है। इस प्रक्रिया का प्रयोग विशेषरूप से 'मरुमरीचिका' के
उदाहरण में होता है । मरुस्थल में अत्यधिक गर्मी के समय यात्री आदि को रेत में
भी पानी दीखने लगता है । ऐसे अवसर पर वास्तविक पानी तो नहीं दीखता है
१. दर्शन मीमांसा ४ ।
मरुमरीचिका ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६३
परन्तु प्रकाश की किरणों के 'माध्यम' रूप वायुमण्डल में अत्यन्त वेग से
परिवर्तन होने से उक्त 'वक्रीभवन' नियम के अनुसार किरणों के मार्ग में
परिवर्तन होने के कारण वृक्ष आदि का उल्टा प्रतिबिम्ब दीखने लगता है ।
जैसा कि निम्नांकित चित्र से प्रकट होगा ।
मरु मरीचिका
इस चित्र में बाईं ओर एक वृक्ष खड़ा है। इस वृक्ष के ऊपर के भाग से
प्रतिक्षिप्त होकर जो प्रकाश की किरण चलती है वह रेगिस्तान की वायु के
माध्यम में अति वेग से परिवर्तन होने के कारण अपने मार्ग से विचलित होते-
होते 'क्रान्तिबिन्दु' तक जा पहुँचती है। और फिर वहाँ से 'प्रतिक्षेप नियम' के
अनुसार उतने ही अंश का कोण बनाते हुए प्रतिक्षिप्त होकर दूसरी ओर देखने
वाले की आँख में पहुँचती है। देखने वाला अभ्यासवश जिधर से किरण आ
रही है उसकी सीध में अर्थ को देखता है जिसका परिणाम यह होता है कि वृक्ष
का पत्तों वाला ऊपर का भाग उसको नीचे की ओर दीखता है और नीचे का जड़
वाला भाग इसी प्रक्रिया से उसे ऊपर दीखने लगता है। अर्थात् वृक्ष उल्टा दीखता
है। तब देखने वाले को यह प्रतीत होता है कि मानो पानी में पेड़ का उल्टा
प्रतिबिम्ब पड़ रहा है। इसीसे वह पानी समझ कर वहाँ जाता है परन्तु पानी
नहीं पाता है। यह 'मरुमरीचिका' की वैज्ञानिक प्रक्रिया मानी जाती है।
मरुस्थल के वायुमण्डल में जो अत्यन्त शीघ्रता से परिवर्तन होता है
उसका कारण गर्मी की अधिकता ही होती है। मरुभूमि के अत्यधिक उष्ण
होने के कारण जो वायु भूतल का स्पर्श करती है वह तुरन्त उष्ण हो जाती है।
विज्ञान के साधारण नियम के अनुसार गर्मी से वस्तु हल्की हो जाती है। और
६४ तर्कभाषा [ मरुमरीचिका
हल्की वस्तु सदा ऊपर रहती है। इसलिये गर्म वायु भी हल्की होकर ऊपर
जाने लगती है और उसका स्थान लेने के लिए ऊपर की ठंडी वायु नीचे
आने लगती है। परन्तु नीचे आकर भूमि का स्पर्श होते ही वह भी गर्म और
हल्की होकर ऊपर जाने लगती है। इस प्रकार वायुमण्डल में अत्यन्त शीघ्रता
से परिवर्तन होने लगता है। इसी परिवर्तन के वेग के कारण मरुस्थल में
आँधियाँ बहुत अधिक आती हैं और यही वायुमण्डल का परिवर्तन प्रकाश
की किरणों के मार्ग परिवर्तन के द्वारा 'मरुमरीचिका' या 'मृगतृष्णा' आदि का
कारण होता है। 'मरीचि' शब्द का अर्थ किरण होता है। मरुस्थल के वृक्ष
आदि से प्रतिक्षिप्त होने वाली प्रकाश की किरणों के मार्ग के 'माध्यम' में
घन विरल भाव के तारतम्य से उनकी गति में क्रमिक परिवर्तन द्वारा वृक्ष आदि
का उल्टा प्रतिबिम्ब सा दीखने लगने के कारण ही मरुस्थल में जल की मिथ्या
प्रतीति होने लगती है। इसीलिए उस जल के मिथ्या ज्ञान को 'मरुमरीचिका'
कहा जाता है।
न्यायदर्शन के भाष्यकार वात्स्यायन ने प्रत्यक्ष सूत्र के भाष्य में लगभग
इसी रूप में 'मरुमरीचिका' का उल्लेख इस प्रकार किया है:—
'ग्रीष्मे¹ मरीचयो भौमेनोष्मणा संसृष्टाः स्पन्दमाना दूरस्थस्य चक्षुषा सन्नि-
कृष्यन्ते । तत्रेन्द्रियार्थसन्निकर्षादुदकमिति ज्ञानमुत्पद्यते । तत्प्रत्यक्षं प्रसज्यत
अत आह अव्यभिचारीति' ।
अर्थात् ग्रीष्मकाल में पृथिवी की गर्मी के कारण अपने मार्ग से विचलित
होकर प्रकाश की किरणें दूरस्थ पुरुष की आँखों में पहुँचती हैं। इसके कारण
उसको वहाँ जल का ज्ञान होता है। यह ज्ञान व्यभिचारी ज्ञान है। वह प्रत्यक्ष
की श्रेणी में न आ जाय इसलिए सूत्रकार ने प्रत्यक्ष के लक्षण में अव्यभिचारी
पद का ग्रहण किया है।
भाष्यकार ने प्रकाश की किरणों के मार्ग परिवर्तन के लिए 'स्पन्दमानाः'
पद का प्रयोग किया है। 'स्पदि' धातु जिससे 'स्पन्दमाना' पद बना है, का
अर्थ 'स्पदि किंचिच्चलने' है। अर्थात् प्रकाश की किरणों में परिवर्तन माध्यम के
परिवर्तन के अनुसार थोड़ा-थोड़ा होता है इस प्रकार यह अनुमान किया जा
सकता है कि 'प्रकाश विज्ञान' का यह सिद्धान्त प्राचीन आचार्यों को भी
विदित था।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष देश की
चर्चा करते हुए इस विषय में लिखा है—
१ न्यायदर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, ४ ।
सांख्ये चाक्षुष प्रक्रिया ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६५
इन्द्रियेण सहा१र्थस्य सम्बन्धः कुत्र जायते ।
अक्षदेशेऽर्थदेशे वा व्यवस्था चात्र भिद्यते ॥
चक्षुषो गमनं केचिदर्थदेशे तु मन्वते ।
इन्द्रियान्तरदेशे च सम्बद्धं विषयान्तरम् ॥
प्रकाशस्य तु रश्मीनां प्रतिषेपात् पदार्थतः ।
चक्षुषि भाष्यकृद्योगं विज्ञानं मनुते तथो२ ॥
चाक्षुषप्रत्यक्ष के विषय में सांख्यादि की प्रक्रिया—
सांख्य, योग तथा वेदान्त दर्शन की प्रत्यक्षादि ज्ञान की प्रक्रिया न्याय की
प्रक्रिया से कुछ भिन्न है। उन तीनों दर्शनों ने अन्तःकरण अथवा मन को
‘वस्तु प्राप्य प्रकाशकारी माना है जब कि न्याय वैशेषिक तथा बौद्ध आदि
दर्शन मन को ‘वस्तु प्राप्य प्रकाशकारी’ नहीं मानते हैं। सांख्य आदि की
इस प्रक्रिया का आशय यह है कि उनके मत में इन्द्रिय प्रणालिका द्वारा
चित्त अथवा मन का बाह्य घट पट आदि वस्तुओं के साथ सम्बन्ध होता है।
और उस सम्बन्ध के होने से चित्त अर्थाकार में परिणत हो जाता है। चित्त
की इस अर्थाकार परिणति को वह ‘चित्तवृत्ति’ या ‘बुद्धिवृत्ति’ कहते हैं।
उनके मत में अन्तःकरण एक तैजस द्रव्य के समान है। जिस प्रकार नाली
के द्वारा जल खेत की क्यारियों में पहुँचकर चौकोर षट्कोण आदि जिस
आकार की क्यारी उसे मिलती है उसी आकार में परिणत हो जाता
है, उसी प्रकार इन्द्रिय प्रणालिका द्वारा अन्तःकरण भी अर्थाकार में
परिणत हो जाता है । अन्तःकरण की इस अर्थाकार परिणति
का नाम ‘चित्तवृत्ति’ है। और इस ‘वृत्ति’ में पुरुष या चैतन्य आत्मा का
प्रतिबिम्ब होने से अथवा चैतन्य आत्मा में ‘बुद्धिवृत्ति’ का प्रतिबिम्ब होने से
पुरुष या आत्मा को उस अर्थ का बोध होता है। इस बोध को सांख्य में
‘पौरुषेय बोध’ कहा है। उसके मत में ‘बुद्धिवृत्ति’ ‘प्रमाण’ है और उससे होने
वाला ‘पौरुषेय बोध’ फल या ‘प्रमा’ कहलाता है। जब कभी ‘बुद्धिवृत्ति’ के
लिये ‘प्रमा’ शब्द का प्रयोग होता है उस समय ‘इन्द्रिय’ को ‘प्रमाण’ कहा
जायगा। परन्तु अधिकांश में ‘बुद्धिवृत्ति’ को प्रमाण और ‘पौरुषेय बोध’ को
‘प्रमा’ कहा जाता है। ‘योगदर्शन’ के ‘व्यासभाष्य’ में इस प्रक्रिया का वर्णन
करते हुये लिखा है—
ईन्द्रियप्रणालिकया चित्तस्य बाह्यवस्तूपरागात् तद्विषया सामान्यविशेषा-
१ दर्शन मीमांसा ४। २ योगदर्शन व्या० भा० १,७ ।
५ त० भा०
६६ तर्कभाषा [ प्रत्यक्षे पाश्चात्यमतम्
त्मनोऽर्थस्य विशेषावधारणप्रधाना वृत्तिः प्रत्यक्षं प्रमाणम् । फलमविशिष्टः पौरुषे-
यश्चित्तवृत्तिबोधः' ।
वाचस्पति मिश्र तथा विज्ञानभिक्षु का मतभेद—
बुद्धिवृत्ति का पुरुष अथवा आत्मा के साथ सम्बन्ध किस प्रकार होता है
इस विषय में सांख्य के आचार्यों में दो प्रकार के मत हैं। 'वाचस्पति मिश्र' के
मत से 'बुद्धिवृत्ति' में पुरुष का प्रतिबिम्ब होता है और सांख्य सूत्रों के 'सांख्य-
प्रवचन भाष्य' के लेखक श्री विज्ञान भिक्षु ने पुरुष में चित्तवृत्ति का प्रतिबिम्ब
माना है। वाचस्पति मिश्र ने सांख्यतत्त्वकौमुदी [पाँचवीं कारिका की व्याख्या]
में प्रत्यक्ष का निरूपण करते हुए लिखा है।
'सोऽयं बुद्धितत्त्ववर्तिना ज्ञानसुखादिना तत्प्रतिबिम्बितस्तच्छायापत्त्याज्ञा-
नसुखादिमानिव भवति' ।
'तत्प्रतिबिम्बितः' पद से वाचस्पति मिश्र ने अन्तःकरण अथवा बुद्धिवृत्ति में
पुरुष के प्रतिबिम्ब का निर्देश
प्रत्यक्षे बौद्धमतम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६७
पर विशेष बल दिया है। शेलिंग ने जब प्रत्यक्ष, अनुभव अथवा प्रतिभान
[ इण्ट्यूशन ] के प्राधान्य का प्रतिपादन किया तब हीगेल आदि विद्वान्
उससे विरक्त हो गए ।
हाँ वर्गसां अवश्य प्रत्यक्ष को महत्त्व देने वाले प्रसिद्ध दार्शनिक हैं। उन्होंने
बुद्धिवाद की कड़ी आलोचना भी की है। वर्गसां के अनुसार ज्ञान दो प्रकार का
होता है—एक बौद्धिक और दूसरा अपरोक्ष अनुभवमूलक अथवा प्रत्यक्ष ।
वर्गसां अपरोक्ष ज्ञान को आन्तरिक ज्ञान मानते हैं जिसमें हम वस्तु के भीतर तक
प्रविष्ट होकर उसका ज्ञान प्राप्त करते हैं । उनकी दृष्टि में बौद्धिक ज्ञान केवल
वस्तु का बाहरी ज्ञानमात्र है जिसमें हम केवल वस्तु के चारों ओर घूमते रहते हैं
उसके आन्तरिक रहस्य को नहीं जान पाते हैं। वर्गसां का कहना है कि बुद्धि कभी
पदार्थों के आन्तरिक रहस्य को नहीं जान सकती है वह तो अनुभव या प्रत्यक्ष
से ही प्राप्त होता है । परन्तु वर्गसां के इस 'प्रतिभानवाद' के विरुद्ध बर्ट्रांड रसेल
आदि आधुनिक विद्वान् फिर बुद्धिवाद का समर्थन कर रहे हैं ।
योरोपीय दर्शन में प्रत्यक्ष या अनुभव की उपेक्षा कर बुद्धिवाद को प्राधान्य
दिया गया है। जैसा कि सर्वपल्ली श्री राधाकृष्णन् १ ने लिखा है कि योरोपीय
दर्शन का झुकाव सदैव बुद्धिवाद की ओर रहा है। भारतीय दर्शन में प्रत्यक्ष की
प्रधानता और पाश्चात्त्य दर्शन में प्रत्यक्ष की उपेक्षा का जो यह भेद है उसका
मुख्य कारण यह है कि भारत में दर्शन और जीवन-उद्देश्य आत्मसाक्षात्कार है
जो अनुभव रूप है। और पाश्चात्य दर्शन का उद्देश्य विश्व की व्याख्या द्वारा
केवल बुद्धि को सन्तुष्ट करना मात्र है ।
प्रत्यक्ष के विषय में बौद्धमत—
ऊपर प्रत्यक्ष के सविकल्पक और निर्विकल्पक दो भेद किए गए हैं। उनके
विषय में तीन प्रकार के मत हैं, यह हम दिखला चुके हैं। जिसमें से बौद्ध लोग
केवल निर्विकल्पक को ही प्रमाण मानते हैं सविकल्पक को नहीं और नैयायिक
सविकल्पक तथा निर्विकल्पक दोनों को प्रमाण मानते हैं । बौद्ध लोग जो केवल
निर्विकल्पक को ही प्रमाण मानते हैं सविकल्प को नहीं इसका कारण यह है
कि उनके मत में निर्विकल्पक तो 'स्वलक्षण' विषयक अर्थात् 'वस्तु मात्र' विषयक
होने से वस्तुमात्र से जन्य है, अतः 'अर्थज' है । इसलिए 'अर्थज' होने से उसको
प्रमाण माना जा सकता है। परन्तु सविकल्पक ज्ञान तो नामजात्यादि योजना
सहित होता है। उसमें जाति का भी भान होता है । इसलिए 'जाति' को भी
१. An Idealist View of life P. P. 129-33.
| ६८ | तर्कभाषा | [ प्रत्यक्षे बौद्धमतम् |
|---|
उसका कारण मानना होगा। परन्तु बौद्धमत में 'जाति' कोई भावभूत पदार्थ नहीं
है। इसलिए उससे उत्पन्न होने वाला सविकल्पक ज्ञान 'अर्थज' नहीं है। इसलिए
'अर्थज' न होने से उसको प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता है ।
बौद्ध 'जाति' को भावभूत पदार्थ नहीं मानते हैं इसका कारण यह है कि
नैयायिकों की अभिमत 'जाति' नित्य पदार्थ है। 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम्'
यह जाति का लक्षण नैयायिक मानते हैं । अर्थात् उनकी 'जाति' अथवा 'सामान्य'
नित्य पदार्थ है। परन्तु बौद्धदर्शन का प्रथम सिद्धान्त 'क्षणभङ्गवाद' है। बौद्धों
के मत में सब कुछ क्षणिक है। संसार में कोई भी नित्य पदार्थ नहीं है। अतएव
नैयायिक जिस नित्य 'जाति' को मानना चाहता है क्षणभङ्गवादी बौद्ध के लिए
उसका मानना सम्भव ही नहीं है। फलतः बौद्ध जाति को पदार्थ नहीं मानते ।
इसीलिए 'सामान्य' विषयक सविकल्पक को भी 'अर्थज' न होने से वह प्रमाण
नहीं मानते हैं !
अब यह प्रश्न हो सकता है कि जब बौद्ध 'जाति' या 'सामान्य' को नहीं
मानते हैं तब 'जाति' का काम वह कैसे निकालते हैं । न्यायसिद्धान्त में 'जाति'
का कार्य 'अनुगत प्रतीति' कराना है । 'अनुवृत्ति प्रत्ययहेतुः सामान्यम्'१
अनुवृत्ति प्रत्यय अर्थात् अनुगत प्रतीति अर्थात् एकाकार प्रतीति का जो कारण
है उसको 'सामान्य' कहते हैं। दश घट व्यक्ति उपस्थित है। उन सब में 'अयं
घटः' 'अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार प्रतीति होती है । इस एकाकार
प्रतीति का कारण उनमें रहने वाला 'घटत्व सामान्य' है । सब घटों में घटत्व
नाम का एक साधारण धर्म रहता है। इसी के कारण सब घटों में 'अयं घटः'
'अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार प्रतीति होती है । इसी अनुगतप्रतीति के
हेतुको 'सामान्य' या 'जाति' कहते हैं ।
इस प्रकार 'जाति' या 'सामान्य' का कार्य 'अनुवृत्ति प्रत्यय' अर्थात् एकाकार,
प्रतीति को उत्पन्न करना है ! जब बौद्ध लोग 'सामान्य' को भाव पदार्थ नहीं मानते हैं
तब उनके मत में इस एकाकार प्रतीति की उत्पत्ति कैसे होती है। इस प्रश्न के समाधान
के लिए बौद्ध दार्शनिक 'अपोह' की कल्पना करते हैं। उनके 'अपोह' शब्द का अर्थ
'अतद्व्यावृत्ति' अर्थात् 'तद्भिन्न, भिन्नत्व' है । तत् शब्द से घट आदि का
ग्रहण करना चाहिए। अतद् माने अघट अर्थात् घट भिन्न सम्पूर्ण जगत्, उससे
भिन्न फिर घट ही होगा। इसलिए प्रत्येक घट, अतद्व्यावृत्त या तद्भिन्न से
भिन्न है। इसी कारण घट कहलाता है। इस प्रकार प्रत्येक घट में 'अतद्व्यावृत्ति
या' तद्भिन्नभिन्नत्व' जिसे 'अपोह' भी कहते हैं होने के कारण ही एकाकार प्रतीति
१. तर्कभाषा सा ० पृ० ।
प्रत्यक्ष बौद्धमतम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६६
ननु निर्विकल्पकं परमार्थतः स्वलक्षणविषयं भवतु प्रत्यक्षम् । सवि-
कल्पकं तु शब्दलिङ्गवदनुगताकारावगाहित्वात् सामान्यविषयं कथं
प्रत्यक्षमर्थजस्यैव प्रत्यक्षत्वात् । अर्थस्य च परमार्थतः सत एव तज्जनक-
त्वात् । स्वलक्षणन्तु परमार्थतः सत्, न तु सामान्यम् । तस्य प्रमाणनिरस्त-
विधिभावस्य अन्यव्यावृत्त्यात्मनस्तुच्छत्वात् ।
होती है । अतएव सामान्य का कार्य 'अपोह' या 'अतद्व्यावृत्ति' से निकल
सकता है । यह बौद्ध मत है ।
बौद्धों के इस 'अपोह' और न्याय, वैशेषिक के 'सामान्य' या 'जाति' पदार्थ
में अन्तर यह है कि बौद्धों का 'अपोह' 'अतद्व्यावृत्ति' रूप, अभावरूप है
और न्याय का 'सामान्य' भाव रूप । बौद्धों का कहना कि उस अभाव रूप
'अपोह' से ही जब 'अनुवृत्ति प्रत्ययहेतु' रूप 'सामान्य' का कार्य हो सकता
है तो 'सामान्य' को एक अलग पदार्थ मानने की आवश्यकता नहीं है ।
इस प्रकार बौद्ध मत में जाति का मानना न केवल अनावश्यक ही है
अपितु युक्तिसङ्गत भी नहीं है । घट के उत्पन्न होने से पहिले घट के निर्माण
स्थल पर घटत्व 'जाति' नहीं थी । कहीं से आती हुई भी नहीं दीखती ।
फिर घट के बन जाने पर वह घट में कहां से आ जाती है। घट के नष्ट होने
पर वह नष्ट भी नहीं होती और दिखाई भी नहीं देती फिर वह उस समय
कहां चली जाती है। इत्यादि अनेक दोष 'जाति' के मानने में आ जाते हैं
इसलिए भी 'जाति' या 'सामान्य' कोई भावभूत पदार्थ सिद्ध नहीं हो सकता
है । इसलिए उसका मानना उचित नहीं है । और 'अनुवृत्ति प्रत्यय' अर्थात्
एकाकार प्रतीति का कारण भावभूत सामान्य या जाति पदार्थ नहीं अपितु
'अतद्व्यावृत्ति' रूप 'अपोह' या अन्योन्याभाव रूप 'तद्भिन्न भिन्नत्व' ही
है । इसलिए सामान्य के अर्थ न होने से सामान्य विषयक सविकल्पक ज्ञान
भी 'अर्थज' नहीं है, अतः उसको प्रत्यक्ष नहीं कह सकते हैं । यह बौद्धों का
पूर्वपक्ष है जिसको ग्रन्थकार आगे प्रस्तुत करते हैं—
[ प्रश्न ] निर्विकल्पक वस्तुतः स्वलक्षण अर्थात् वस्तु मात्र विषयक
[ और उससे उत्पन्न ] होने से भले ही प्रत्यक्ष हो [ जाय ] परन्तु सविकल्पक तो
शब्द और अनुमान के समान अनुगत आकार [ सामान्य ] का ग्राहक होने से
सामान्य विषयक होने से कैसे प्रत्यक्ष [ कहलाने योग्य ] होगा 'अर्थज' के ही
प्रत्यक्ष होने और वास्तव में विद्यमान अर्थ के ही उस [ प्रत्यक्ष ] के जनक होने
से [ सामान्य विषयक सविकल्पक ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता है । ] स्वलक्षण
७० तर्कभाषा [ प्रत्यक्षे बौद्धमतम्
मैवम्। सामान्यस्यापि वस्तुभूतत्वात् ।
तदेवं व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ।
[ अर्थात् वस्तुमात्र ] तो परमार्थतः सत् है किन्तु सामान्य [ परमार्थ सत् ] नहीं ।
उसकी विधि रूपता [ भाव रूपता ] का प्रमाणों से खण्डन हो जाने से और
अतद्व्यावृत्ति रूप [ अभाव रूप ] तुच्छ होने से । [ सामान्य विषयक सविकल्पक
ज्ञान को अर्थज न होने से प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता है । ]
यह बौद्ध का पूर्वपक्ष हुआ, इसका उत्तर बहुत संक्षेप में अगली एक पंक्ति
में यह दिया है कि सामान्य भी भावभूत पदार्थ है । इसका अभिप्राय यह है कि
घटादि में जो अनुगत प्रतीति होती है इसका उपपादन करना आवश्यक है ।
इसके उपपादन करने के लिये बौद्ध जो 'अतद्व्यावृत्ति' रूप 'अपोह' का
अवलम्बन करते हैं वह बड़ा वक्रमार्ग है । साधारणतः दश घट व्यक्तियों को
देखने पर देखने वाले के मन में उनकी समानता ही प्रतीति होती है ।
'अतद्व्यावृत्ति' या अघटभिन्नत्व प्रतीत नहीं होता । अतएव इस एकाकार
प्रतीति का कारण भावभूत सामान्य को ही मानना चाहिए, 'अपोह' को नहीं ।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इस विषय को इस प्रकार लिखा है—
वस्तुमात्रावगाहि यत् प्रत्यक्षं निर्विकल्पकम् ।
तत्तु बौद्धमते सिद्धं सविकल्पं न सम्मतम् ॥
सामान्यं तुच्छरूपत्वादर्थो नैव यतो भवेत् ।
तद्विषयमतो ज्ञेयं सविकल्पं न चार्थजम् ॥
न चैकाकारबुद्ध्यापि सामान्यं संप्रसिद्ध्यति ।
यतोऽनुवृत्तिबुद्धिः सा त्वपोहादेव जायते ॥
भावभूतो न चापोहोऽतद्व्यावृत्तिरूपतः ।
तच्च तद्भिन्नभिन्नत्वमभावरूपतो मतम् ॥
अत्र तद्भिन्नभिन्नत्वेऽनुवृत्तिबुद्धिहेतुता ।
या मता सातिवक्रत्वाद् वस्तुतो नोपयुज्यते ॥
भावभूतमतो ज्ञेयं सामान्यं तत्र कारणम्
अर्थवत्वादतो नूनं प्रत्यक्षं सविकल्पकम् ॥
[ उत्तर ] सामान्य के भी वस्तुभूत होने से यह ठीक नहीं है ।
इस प्रकार प्रत्यक्ष की व्याख्या हो गई ।
१ दर्शनमीमांसा ४ ।
अनुमानम् ] अनुमाननिरूपणम् ७१
अनुमानम्
लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम् । येन हि अनुमीयते तदनुमानम् । लिङ्गपरा-
मर्शेन चानुमीयतेऽतो लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम् । तच्च धूमादिज्ञानमनुमितिं
अनुमानम् ।
प्रत्यक्ष के बाद दूसरा स्थान 'अनुमान' प्रमाण का है । अनुमान
शब्द का अर्थ 'मितेन लिङ्गेन अर्थस्य अनु पश्चान्मानमनुमानम्'¹ इस
प्रकार वात्स्यायन भाष्य में किया गया है । अर्थात् प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात
लिङ्ग द्वारा अर्थ के अनु अर्थात् पीछे से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को
अनुमान कहते हैं । यह तो अनुमान शब्द की निरुक्ति या व्युत्पत्ति हुई और
उससे वस्तुतः अनुमान प्रमाण के फल 'अनुमिति' का ज्ञान होता है ।
परन्तु अनुमान प्रमाण का लक्षण 'लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम्' अर्थात् 'लिङ्ग' के
'परामर्श' को 'अनुमान' कहते हैं यह किया गया है । इस लक्षण में 'लिङ्ग'
और 'मरामर्श' दो शब्द हैं । इनके स्पष्टीकरण के बिना लक्षण स्पष्ट नहीं हो
सकता है । अतएव 'लिङ्ग' और 'परामर्श' इन दोनों का अर्थ स्पष्ट करना
चाहिए । लिङ्ग' का लक्षण है 'व्याप्तिबलेन अर्थगमकं लिङ्गम्' । अर्थात् व्याप्ति
बल से जो अर्थ का बोधक है उसको लिङ्ग कहते हैं । इस लक्षण में फिर एक
'व्याप्ति' शब्द नया आ गया है। अतः उसकालक्षण करना आवश्यक हो गया ।
व्याप्ति का अर्थ है 'साहचर्य नियम' । 'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः' जहां जहां धुंआ
होता है वहां वहां अग्नि होती है इस साहचर्य नियम को व्याप्ति कहते हैं । इस
व्याप्ति के बल से जो अर्थ का बोधक हो उसको 'लिङ्ग' कहते हैं । जैसे धूम
वह्नि का लिङ्ग है । पर्वतादि पर धूम को देख कर जहां जहां धुंआ होता है
वहां वहां वह्नि होती है इस साहचर्य नियम या व्याप्ति के आधार पर अप्रत्यक्ष
वह्नि का ज्ञान होता है। इसलिए धूम वह्नि का लिङ्ग कहलाता है। लिङ्ग शब्द की
निरुक्ति या व्युत्पत्ति 'लीनम् अप्रत्यक्षं अर्थं गमयति इति लिङ्गम्' यह की गई है।
इस प्रकार 'लिङ्ग' का लक्षण हो जाने के बाद दूसरा शब्द 'परामर्श' रह
जाता है । परामर्श के अर्थ दो प्रकार से किए जाते हैं। 'लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं
परामर्शः' या 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः' । अर्थात् लिङ्ग के तृतीय
ज्ञान को 'परामर्श' कहते हैं अथवा 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञान' को 'परामर्श'
कहते हैं । इसका उपपादन आगे करेंगे ।
लिङ्गपरामर्श को अनुमान कहते हैं । जिस से अनुमिति [ अनु पश्चान्मितिः,
प्रमितिः ] हो उसको अनुमान कहते हैं । और लिङ्ग के परामर्श से अनुमिति होती
१ न्यायदर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, ३ ।
७२ तर्कभाषा [ उपाधिलक्षणम्
प्रति करणत्वात् । अग्न्यादिज्ञानमनुमितिः । तत्करणं धूमादिज्ञानम् ।
किं पुनर्लिङ्गं कश्च तस्य परामर्शः ?
उच्यते । व्याप्तिबलेनार्थगमकं लिङ्गम् । यथा धूमोऽग्नेर्लिङ्गम् । तथाहि
यत्र धूमस्तत्राग्निरिति साहचर्यनियमो व्याप्तिः। तस्यां गृहीतायामेव व्याप्तौ
धूमोऽग्निं गमयति । अतो व्याप्तिबलेनाग्न्यनुमापकत्वाद् धूमोऽग्नेर्लिङ्गम् ।
तस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः । तथाहि प्रथमं तावन्महानसादौ भूयो
भूयो धूमं पश्यन् वह्निं पश्यति । तेन भूयो दर्शनेन धूमाग्न्योः स्वाभाविकं
सम्बन्धमवधारयति, यत्र धूमस्तत्राग्निरिति ।
है इसलिए लिङ्गपरामर्श को अनुमान कहते हैं । और वह [लिङ्गपरामर्श]
धूमादि ज्ञान [रूप] है अनुमिति प्रति करण होने से । अग्नि आदि का ज्ञान अनु-
मिति है । उसका करण धूमादि ज्ञान है । [अतः धूमादि ज्ञान अग्नि आदि ज्ञान
का करण होने से अनुमान है ]
[प्रश्न] फिर लिङ्ग' किस को कहते हैं और उसका 'परामर्श' क्या है ?
[उत्तर] कहते हैं । व्याप्ति के बल से [जो] अर्थ का बोधक [हो वह]
'लिङ्ग' [कहलाता] है। जैसे धूम अग्नि का लिङ्ग है। क्योंकि, जहां धूम होता
है वहां अग्नि होती है इस साहचर्य नियम को व्याप्ति कहते हैं । उस व्याप्ति के
ग्रहण होने पर ही धूम अग्नि का ज्ञापक होता है इसलिए व्याप्ति के बल से अग्नि
का अनुमापक होने से धूम अग्नि का लिङ्ग होता है ?
उस [धूमरूप लिङ्ग] का तृतीय ज्ञान 'परामर्श' कहलाता है। जैसे पहिले
रसोई घर आदि में बार बार धूम को देख कर वह्नि को देखता है। [अर्थात्
धूम और वह्नि का भूयः अनेक बार सहचार दर्शन होता है ] उस 'भूयः सहचार
दर्शन' से धूम और अग्नि के स्वाभाविक सम्बन्ध [व्याप्ति] को निश्चय करता है
कि जहां जहां धूम होता है वहां अग्नि होती है [इस प्रकार की धूम और वह्नि
की व्याप्ति का निश्चय करता है।]
जितने बार के दर्शन से इस स्वाभाविक सम्बन्ध या 'व्याप्ति' का निश्चय होता
है । वह सब मिल कर धूम का 'प्रथम दर्शन' कहा जायगा । 'व्याप्ति' ग्रहण के
बाद जो पर्वतादि में धूम का दर्शन होता है उसको द्वितीय दर्शन समझना चाहिए।
उस द्वितीय दर्शन से पूर्वगृहीत धूम और अग्नि की व्याप्ति का स्मरण हो आता
है । इस 'व्याप्ति स्मृति' के बाद 'वह्निव्याप्य धूमवांश्चायं पर्वतः' इस प्रकार का
ज्ञान होता है इसी को 'तृतीय ज्ञान' कहते हैं। यही अनुमिति के प्रति करण
होने से 'अनुमान' कहा जाता है। इसी 'तृतीय ज्ञान' के बाद 'तस्मात् पर्वतो
वह्निमान्' इसलिए पर्वत वह्नि युक्त है यह अनुमिति हो जाती है । इसलिए
उपाधिलक्षणम् ] अनुमाननिरूपणम् ७३
'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं पर्वतः' यह तृतीय ज्ञान ही वह्नि ज्ञान के प्रति 'करण'
है और इसी को 'अनुमान' कहते हैं ।
इस तृतीय ज्ञान के दो अंश हैं एक अंश 'व्याप्ति' को सूचित करता है
और दूसरा 'पक्ष धर्मता' को । 'वह्निव्याप्य' इतने अंश से व्याप्ति सूचित होती
है और 'धूमवांश्च पर्वतः' इस अंश से धूम का पर्वत रूप पक्ष में अस्तित्व
प्रतीत होता है । इसको 'पक्षधर्मता' ज्ञान कहते हैं । इस प्रकार अनुमान के
मुख्य दो अंश होते हैं, एक 'व्याप्ति' और दूसरा 'पक्षधर्मता' । 'वह्निव्याप्यधू-
मवांश्च पर्वतः' इस तृतीय ज्ञान में यह दोनों अंश प्रतीत होते हैं । इसलिए
इस 'तृतीय ज्ञान' को 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञान' भी कह सकते हैं । इसलिए
'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः' 'और लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः'
यह दोनों ही 'परामर्श' के लक्षण कहे जाते हैं । 'लिङ्गपरामर्शो अनुमानम्'
'लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः' । लिङ्ग का 'तृतीय ज्ञान' अथवा 'व्याप्तिविशिष्ट-
पक्षधर्मताज्ञान' रूप 'परामर्श' ही 'अनुमान' कहलाता है । इसमें से धूम और
वह्नि के जितने बार के 'सहचारदर्शन' से 'व्याप्ति' का निश्चय होता है, वह सब
मिलकर प्रथम ज्ञान कहलाता है, इस प्रकार प्रथम ज्ञान तो यहाँ दिखा दिया
है और द्वितीय, तृतीय ज्ञान का वर्णन आगे चल कर करेंगे ।
'व्याप्ति' का ग्रहण 'भूयः सहचार दर्शन' से होता है और 'व्याप्ति' 'स्वाभाविक
सम्बन्ध' होता है ये दो बातें प्रतिपादित की हैं । इस पर यह शङ्का करते हैं कि
सर्वत्र 'भूयः सहचार दर्शन' से 'स्वाभाविक सम्बन्ध' का निश्चय नहीं होता है ।
जैसे 'जहाँ-जहाँ धूम है वहाँ-वहाँ वह्नि है' यह तो स्वाभाविक सम्बन्ध है, और
व्याप्ति ठीक है। परन्तु इसको यदि उलटा करके यों कहा जाय कि 'यत्र यत्र वह्नि-
स्तत्र तत्र धूमः' 'जहाँ-जहाँ वह्नि है वहाँ-वहाँ धूम है' तो इनका भूयः सहचार
दर्शन होने पर भी यह 'स्वाभाविक सम्बन्ध' या 'व्याप्ति' नहीं होगा। क्योंकि यदि
लोहे के एक गोले को गर्म कर दिया जाय तो उसमें अग्नि तो होती है परन्तु धूम
नहीं होता । इसलिए 'यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः' यह स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं
अपितु 'औपाधिक' सम्बन्ध कहलाता है। इसमें 'आर्द्र इन्धन संयोग' 'उपाधि' है।
'उपाधि' का लक्षण है 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वमुपाधिः' ।
जो धर्म साध्य का व्यापक हो और साधन का अव्यापक हो उसको 'उपाधि'
कहते हैं । जैसे यदि कोई यह अनुमान बनावे कि 'अयोगोलकं धूमवत् वह्नेः'
लोहे का गोला वह्नियुक्त होने से धूमवान् है तो इस अनुमान में धूम 'साध्य' है,
वह्नि 'साधन' है, और 'आर्द्वेन्धनसंयोग' को यहाँ उपाधि कहा है । यह
७४ तर्कभाषा [ उपाधिलक्षणम्
'आर्द्रेन्धन संयोग' रूप धर्म, साध्य जो धूम है, उसका व्यापक है । अर्थात्
जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ-वहाँ आर्द्रेन्धन संयोग अवश्य होता है । यह
'साध्यव्यापकत्व' हुआ । इसके विपरीत 'आर्द्रेन्धन संयोग' साधनभूत धर्म वह्नि
का व्यापक नहीं है । अर्थात् जहाँ-जहाँ वह्नि हो वहाँ-वहाँ 'आर्द्रेन्धन संयोग' का
होना आवश्यक नहीं है । जैसे इसी अयोगोलक ( लोहे के गोले ) में अग्नि तो
है परन्तु 'आर्द्रेन्धन संयोग' नहीं है । यह 'साधनाव्यापकत्व' हुआ । इस प्रकार
'आर्द्रेन्धन संयोग' में 'साध्यव्यापकत्व' और 'साधनाव्यापकत्व' दोनों अंश घट
जाने से उसमें 'उपाधि' का पूरा लक्षण घट जाता है । इसलिए यह हेतु
'सोपाधिक' है । अर्थात् 'यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः' यह सम्बन्ध स्वाभाविक
नहीं औपाधिक है ।
'औपाधिक सम्बन्ध' का दूसरा उदाहरण यह है कि कोई 'मैत्री' नामक स्त्री
व्यक्ति है । उसके पाँच पुत्र हैं, जिनमें से चार को हमने देखा है और वह सब
श्याम वर्ण के हैं। पाँचवें पुत्र को हमने नहीं देखा है किन्तु वह गौर वर्ण का
है। परन्तु जिसने मैत्री के चार पुत्रों में श्यामत्व देखा है वह उस 'भूयः सहचार दर्शन'
के आधार पर 'मैत्रीतनयत्व' और 'श्यामत्व' का 'स्वाभाविक सम्बन्ध' अथवा
व्याप्ति मान कर उस न देखे हुए पाँचवें पुत्र में भी श्यामत्व का अनुमान 'सः
श्यामः मैत्रीतनयत्वात् परिदृश्यमानमैत्रीतनयस्तोमवत्' इस प्रकार कर सकता
है। यहाँ 'मैत्रीतनयत्वात्' हेतु 'श्यामत्व' की सिद्धि के लिए दिया गया है ।
परन्तु यह हेतु 'सोपाधिक' है । इस में 'शाक-पाक जन्यत्व' रूप 'उपाधि'
विद्यमान है । अर्थात् 'श्यामत्व' का प्रयोजक 'मैत्रीतनयत्व' नहीं अपितु 'शाक-
पाक-जन्यत्व' है । इस प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं । उपाधि का लक्षण
'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वम्' है । वह 'शाक-पाक-जन्यत्व' में पूर्ण
रूप से घट जाता है । यहाँ साध्य श्यामत्व और साधन मैत्रीतनयत्व है ।
'शाकपाकजन्यत्वं' साध्य रूप श्यामत्व का व्यापक है । यत्र यत्र श्यामत्वं तत्र
तत्र शाकपाकजन्यत्वं' यह साध्यव्यापकत्व हुआ ।
'शाक-पाक-जन्यत्व' का अभिप्राय यह है कि बालक के गौर और श्याम
वर्ण पर गर्भ काल में किए गए माता के आहार का प्रभाव पड़ता है । यदि माता
दुग्ध, दधि आदि पदार्थों का अधिक सेवन करती है तो बालक गौर वर्ण का होता
है । इसके विपरीत यदि गर्भ काल में माता हरे शाक आदि का अधिक सेवन
करती है तो बालक का वर्ण श्याम होता है । अर्थात् श्यामत्व का प्रयोजक या
कारण 'मैत्रीतनयत्व' नहीं अपितु 'शाकपाकजन्यत्व' है । जहाँ-जहाँ 'शाक-पाक-
जन्यत्व' होता है वहाँ-वहाँ श्यामत्व अवश्य होता है यह साध्य-व्यापकत्व हुआ ।
उपाधि निरूपणम् ] अनुमाननिरूपणम् ७५
यद्यपि यत्र यत्र मैत्रीतनयत्वं तत्र तत्र श्यामत्वमपीति भूयो दर्शनं
समानमवगम्यते, तथापि मैत्रीतनयत्वश्यामत्वयोर्न स्वाभाविकः सम्बन्धः
किन्तूपाधिक एव । शाकाद्यन्नपरिणामस्योपाधेर्विद्यमानत्वात् ।
तथा हि श्यामत्वे मैत्रीतनयत्वं न प्रयोजकं किन्तु शाकाद्यन्नपरिणति-
भेद एव प्रयोजकः । प्रयोजकश्चोपाधिरित्युच्यते ।
न च धूमाग्न्योः सम्बन्धे कश्चिदुपाधिरस्ति । अस्ति चेत्, यो-
परन्तु जहां जहां मैत्रीतनयत्व होता है वहां वहां 'शाक-पाक-जन्यत्व' अवश्य
हो यह आवश्यक नहीं है । माता गर्भ-काल में शाकादि के स्थान पर दुग्ध
आदि का सेवन करे यह भी हो सकता है । ऐसी दशा में 'यत्र यत्र मैत्रीतनयत्वं
तत्र तत्र शाक-पाक-जन्यत्वं' यह आवश्यक न होने से साधनाव्यापकत्व हुआ ।
इस प्रकार 'शाक-पाक-जन्यत्व' रूप 'उपाधि' के वर्तमान होने से 'मैत्री तन-
यत्व' और श्यामत्व का स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है अपितु औपाधिक सम्बन्ध है।
इससे यह सिद्ध हुआ कि यद्यपि 'भूयः सहचार दर्शन' से स्वाभाविक
सम्बन्ध अथवा व्याप्ति का निश्चय होता है परन्तु जहां एक भी स्थल में उनके
सहचार का अभाव अथवा व्यभिचार का ग्रहण हो जाता है वहां वह 'भूयः
सहचार दर्शन' भी व्यर्थ हो जाता है और वह उनके स्वाभाविक सम्बन्ध का बोध
नहीं करा सकता है । इसलिए केवल 'भूयः सहचार दर्शन' ही व्याप्ति ग्राहक
नहीं है अपितु उसके साथ व्यभिचार का अदर्शन होना भी आवश्यक है ।
अर्थात् 'व्यभिचारादर्शनसहकृत भूयः सहचार दर्शन' व्याप्ति का ग्राहक होता
है । भूयः सहचार दर्शन होते हुए मैत्रीतनयत्व और श्यामत्व का उपाधि स्थल
में व्यभिचार दर्शन हो जाने से व्याप्ति सिद्ध नहीं हो सकती । अतः उनका
स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है । यही आगे कहते हैं ।
यद्यपि जहां जहां मैत्रीतनयत्व है वहां वहां श्यामत्व भी है इस प्रकार [मैत्री-
तनयत्व और श्यामत्व का भूयःसहचार मैत्री के चार पुत्रों में, धूम और वह्नि के
भूयः सहचार दर्शन के समान] भूयो दर्शन समान रूप से प्रतीत होता है । फिर
भी मैत्रीतनयत्व और श्यामत्व का स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है अपितु औपाधिक
[ सम्बन्ध ] ही है । शाकादि अन्न परिणाम रूप उपाधि के विद्यमान होने से ।
क्योंकि श्यामत्व का प्रयोजक मैत्रीतनयत्व नहीं है किन्तु शाकादि अन्न परिणाम
ही [ श्यामत्व में ] प्रयोजक है । प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं ।
[ प्रकृत में ] धूम और अग्नि के सम्बन्ध में कोई उपाधि नहीं है । [ इसलिए
उनका सम्बन्ध स्वाभाविक सम्बन्ध अथवा व्याप्ति है । यदि यह कहो कि धूम और
अग्नि के सम्बन्ध में भी कोई उपाधि है तो प्रश्न यह होगा कि ] यदि [ धूम और
७६ तर्कभाषा [ उपाधिनिरूपणम्
ग्योऽयोग्यो वा । अयोग्यस्य शङ्कितुमशक्यत्वात्, योग्यस्य चानुपल-
भ्यमानत्वात् । यत्रोपाधिरस्ति तत्रोपलभ्यते । यथाग्नेर्धूमसम्बन्धे
आर्द्वेन्धनसंयोगः । हिंसात्वस्य चाधर्मसाधनत्वेन सह सम्बन्धे निषिद्ध-
त्वमुपाधिः । मैत्रीतनयत्वस्य च श्यामत्वेन सह सम्बन्धे शाकाद्यन्न-
परिणतिभेदः ।
न चेह धूमस्याग्निसहचर्ये कश्चिदुपाधिरस्ति । यद्यभविष्यत्ततोऽद्रक्ष्यत्,
ततो दर्शनाभावान्नास्ति । इति तर्कसहकारिणानुपलम्भसनाथेन । प्रत्य-
क्षेणैवोपाध्यभावोऽवधार्यते । तथा च उपाध्यभावग्रहणजनितसंस्कारसह-
कृतेन साहचर्यग्राहिणा प्रत्यक्षेणैव धूमाग्न्योर्व्याप्तिरवधार्यते। तेन धूमाग्न्योः
स्वाभाविक एव सम्बन्धो न त्वौपाधिकः । स्वाभाविकश्च सम्बन्धो व्याप्तिः ।
अग्नि के सम्बन्ध में कोई उपाधि ] है तो [ वह उपाधि प्रत्यक्ष होने के ] योग्य है
अथवा अयोग्य । [ यदि प्रत्यक्ष होने के अयोग्य उपाधि है, यह कहना चाहें तो
ठीक नहीं है क्योंकि ] अयोग्य [ है तो उस ] की शङ्का करना भी उचित नहीं
[ जिस उपाधि का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है वह है ही इस में क्या प्रमाण होगा ।
इसलिए उसकी शङ्का भी करना अनुचित है । अर्थात् अयोग्य उपाधि है यह नहीं
कह सकते । ] और [ प्रत्यक्ष के ] योग्य [ उपाधि ] की उपलब्धि नहीं होती ।
[ यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः इत्यादि स्थलों में ] जहाँ [ आर्द्वेन्धन संयोग आदि
रूप ] उपाधि है वहाँ उपलब्ध होती है जैसे १ अग्नि के धूम के साथ [ यत्र यत्र
अग्निस्तत्र तत्र धूमः ] इस सम्बन्ध में आर्द्वेन्धन संयोग [ उपाधि है तो वह उप-
लब्ध भी होती है ] और २ हिंसात्व के अधर्म साधनत्व के साथ सम्बन्ध में
निषिद्धत्व उपाधि है और ३ मैत्रीतनयत्व के श्यामत्व के साथ [ यत्र यत्र मैत्री-
तनयत्वं तत्र तत्र श्यामत्वं ] इस सम्बन्ध में शाकादि अन्न परिणाम भेद [ शाक-
पाक-जन्यत्व उपाधि है और उपलब्ध होती है ]
यहाँ धूम के अग्नि के साथ साहचर्य में कोई उपाधि नहीं है । यदि होती तो
दिखाई देती । दिखाई नहीं देती अतः नहीं है । इस प्रकार तर्क सहकृत और
अनुपलब्धियुक्त प्रत्यक्ष से ही उपाधि का अभाव निश्चय होता है । इसलिए उपाधि
के अभाव के ज्ञान से उत्पन्न संस्कार से सहकृत और भूयः सहचार दर्शन जन्य
संस्कार के सहकृत [ धूम तथा अग्नि के ] साहचर्य को ग्रहण कराने वाले प्रत्यक्ष
[प्रमाण] से ही धूम और अग्नि की व्याप्ति गृहीत होती है । इसलिए धूम और अग्नि
का स्वाभाविक सम्बन्ध ही है औपाधिक नहीं । और स्वाभाविक सम्बन्ध [को ही]
व्याप्ति [ कहते ] हैं ।