तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
निर्गुणोत्पत्तिः ] प्रमाणनिरूपणम् ३५
अद्रव्यं च स्याद् गुणाश्रयत्वाभावात् । गुणाश्रयो द्रव्यमिति हि
द्रव्यलक्षणम् ।
सत्यम् । प्रथमे क्षणे घटो यदि चक्षुषा न गृह्यते का नो हानिः । न
हि सगुणोत्पत्तिपक्षेऽपि निमेषावसरे घटो गृह्यते । तेन व्यवस्थितमेतन्नि-
र्गुण एव प्रथमं घट उत्पद्यते । द्वितीयादिक्षणेषु चक्षुषा गृह्यते ।
न च प्रथमे क्षणे गुणाश्रयत्वाभावादद्रव्यत्वापत्तिः । समवायिकारणं
अचाक्षुष हो जायगा [अर्थात् उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा ] वायु के
समान रूप रहित द्रव्य होने से । जो द्रव्य महत् परिमाण और उद्भूत रूप से
युक्त होता है वही चाक्षुष [ प्रत्यक्ष का विषय होता ] है । [ इस प्रकार निर्गुणो-
त्पत्ति पक्ष में प्रथम क्षण में घट का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा यह प्रथम
दोष है । दूसरा दोष आगे कहते हैं ]
[ प्रथम क्षण के निर्गुण घट में ] गुणाश्रयत्व का अभाव होने से [ वह ]
द्रव्य भी नहीं हो सकेगा । [ क्यों कि ] गुण का आश्रय द्रव्य [ होता ] है, यह
द्रव्य का लक्षण है । [प्रथम क्षण के घट के निर्गुण होने से उसमें गुणाश्रयत्व रूप
द्रव्य का लक्षण नहीं घट सकता है अतएव प्रथम क्षण का घट द्रव्य भी नहीं
कहा जा सकता है । ये दोष निर्गुणोत्पत्ति पक्ष में आते हैं । आगे उनका
समाधान करते हैं । ]
[ उत्तर आपका कहना ] ठीक है । [ प्रथम क्षण में घटादि का चाक्षुष
प्रत्यक्ष नहीं होगा । परन्तु ] यदि प्रथम क्षण में चक्षु से घट का ग्रहण नहीं होता
तो इसमें हमारी क्या हानि है । [ आप के ] सगुणोत्पत्ति पक्ष में भी [यदि
प्रथम क्षण में देखने वाले के पलक मारने का ] निमेषावसर [होने पर ] में घट
का ग्रहण नहीं होगा । [ इसलिए यदि प्रथम क्षण में घट का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं
होता तो इसमें कोई हानि नहीं है । अर्थात् प्रथम क्षण में ही घट का प्रत्यक्ष
होना आवश्यक नहीं है । द्वितीय क्षण में रूपादि गुण उत्पन्न हो जाने पर ही
उसका प्रत्यक्ष होगा ] इसलिए यह निश्चित हुआ कि प्रारम्भ में [ प्रथम क्षण ]
में निर्गुण घट ही उत्पन्न होता है और द्वितीयादि क्षणों में [ रूप आदि गुणों के
उत्पन्न हो जाने पर ] चक्षु से गृहीत होता है ।
और न प्रथम क्षण में गुणाश्रय न होने से [घटादि का] अद्रव्यत्व हो सकता
है। [ क्योंकि 'गुणाश्रयो द्रव्यम्' यह द्रव्य का लक्षण नहीं है अपितु हमारे मत में
'समवायि कारणं द्रव्यम्' यह द्रव्य का लक्षण है अतः ] समवायिकारणं द्रव्य
[ होता ] है इस द्रव्य के लक्षण का सम्बन्ध [ प्रथम क्षण के घट में भी ] होने
३६ तर्कभाषा [असमवायिकारणम्
द्रव्यमिति द्रव्यलक्षणयोगात् । योग्यतया गुणाश्रयत्वाच्च । योग्यता च
गुणानामत्यन्ताभावाभावः ।
असमवायिकारणं तदुच्यते यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसा-
मर्थ्यं तदसमवायिकारणम् । यथा तन्तुसंयोगः पटस्यासमवायिकारणम् ।
तन्तुसंयोगस्य गुणस्य, पटसमवायिकारणेषु तन्तुषु गुणिषु, समवेतत्वेन
समवायिकारणे प्रत्यासन्नत्वात्, अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वेन पटं
प्रति कारणत्वाच्च ।
से [ प्रथम क्षण का घट भी द्रव्य लक्षण से युक्त होने से द्रव्य ही है। उसे
अद्रव्य नहीं कहा जा सकता ]
[ यदि आप 'समवायिकारणं द्रव्यम्' इस द्रव्य लक्षण को न मान कर
'गुणाश्रयो द्रव्यम्' इसको ही द्रव्य लक्षण मानना चाहते हैं तो ] योग्यता से
गुणाश्रय होने से भी [ प्रथम क्षण के घट को अद्रव्य नहीं कह सकते हैं । अर्थात्
प्रथम क्षण का घट यद्यपि उस प्रथम क्षण में गुणों का आश्रय नहीं है परन्तु
उसमें गुणाश्रय होने की योग्यता तो उस क्षण में भी विद्यमान है। अगले क्षण
में वह गुणाश्रय हो जायगा इस योग्यता के कारण उसको गुणाश्रय मान कर
भी लक्षण का समन्वय किया जा सकता है । ] यह योग्यता [ का अभिप्राय ]
गुणों के अत्यन्ताभाव का अभाव है ।
अर्थात् घट में गुणों का अत्यन्ताभाव त्रैकालिक अभाव नहीं है। इसलिए
घट में गुणों के अत्यन्ताभाव अर्थात् त्रैकालिक अभाव न होने से वर्तमान एक
क्षण में गुण का अभाव होने पर भी अगले क्षण में गुणोत्पत्ति के योग्य होने
से उसको गुणाश्रय मान कर 'गुणाश्रयो द्रव्यम्' इस द्रव्य लक्षण का भी
समन्वय हो सकता है। इसलिए प्रथम क्षण में निर्गुण घट उत्पन्न होता है और
द्वितीय आदि क्षण में उसमें रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है। अतः गुण
और गुणी का समान कालीन जन्म न होने से घटादि गुणी, स्वगत रूपादि
गुणों के प्रति समवायि कारण हो सकते हैं। यह सिद्ध हुआ ।
आगे असमवायि कारण का लक्षण करते हैं :-
असमवायिकारण उसको कहते हैं । जो समवायिकारण में रहता [प्रत्यासन्न]
हो और [कार्योत्पादन में] जिसकी सामर्थ्य निश्चित हो [अर्थात् जिसमें 'अनन्य-
थासिद्धनियतपूर्वभावित्वम्' यह कारण का लक्षण घटता हो] उसको असमवायि-
कारण कहते हैं। जैसे तन्तु संयोग पट का असमवायि कारण है। तन्तु संयोग गुण
[ है उस ] के पट के समवायिकारण तन्तुओं [ रूप ] गुणियों में समवाय सम्बन्ध
असमवायिकारणम् ] प्रमाणनिरूपणम् ३७
एवं तन्तुरूपं पटरूपस्य असमवायिकारणम् ।
से विद्यमान होने से [ पट के ] समवायिकारण में प्रत्यासन्न होने और [ पट के
प्रति ] अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्व [ रूप कारण लक्षण से युक्त ] होने से पट
के प्रति कारण होने से । [तन्तुसंयोग पट का असमवायिकारण होता है । क्योंकि
'समवायि कारणे प्रत्यासन्नमवधृतसामर्थ्य च' यह असमवायिकारण का लक्षण
उसमें घट जाता है ]
इसी प्रकार तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण है ।
जैसे गुण और गुणी के असमानकालीन जन्म अथवा निर्गुणोत्पत्ति के
सिद्धान्त के प्रतिपादन करने के विशेष प्रयोजन से समवायिकारण का दूसरा
उदाहरण दिया था । इसी प्रकार असमवायिकारण का यह दूसरा उदाहरण
भी समवायिकारण में प्रत्यासत्ति साक्षात् तथा परम्परया दो प्रकार से मानी
जा सकती है इस सिद्धान्त के स्पष्टीकरण के विशेष प्रयोजन से दिया गया है ।
यहां तन्तुरूप को पटरूप का असमवायिकारण कहा है । इसमें शङ्का यह
होती है कि समवायिकारण में प्रत्यासन्न और अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावी
धर्म को असमवायिकारण कहते हैं, यह असमवायिकारण का लक्षण अभी
किया है । पटरूप के असमवायिकारण को हमें देखना है । पटरूप गुण है अत-
एव उसका समवायिकारण गुणीरूप पट है । इसलिए पटगत कोई धर्म पटरूप
का असमवायिकारण हो सकता है । तन्तुरूप तो तन्तु का गुण होने से तन्तु
में रहता है पट में नहीं । तब तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण कैसे होगा ?
इस शङ्का का उत्तर यह है कि समवायिकारण में जो प्रत्यासत्ति यहां कही
है वह साक्षात् और परम्परया दो प्रकार से हो सकती है । कोई धर्म कार्य के
साथ एक ही अर्थ में रहने से समवायिकारण में प्रत्यासन्न कहा जाता है । जैसे
तन्तुसंयोग पट का असमवायिकारण पहिले दिखाया था । वह पट के समवायि-
कारण तन्तुओं में कार्यभूत पट के साथ साक्षात् एकार्थ समवेत है । अर्थात् पट
समवाय सम्बन्ध से तन्तुओं में रहता है उन्हीं तन्तुओं में तन्तुसंयोगरूप गुण
भी रहता है । इसलिए तन्तुसंयोग साक्षात् कार्यरूप पट के साथ तन्तुरूप एक
अर्थ में समवेत है । उस प्रकार की प्रत्यासत्ति को साक्षात् प्रत्यासत्ति कहते हैं ।
इसी को दूसरे शब्दों में 'कार्यैकार्थप्रत्यासत्ति' अर्थात् कार्य पट के साथ कारण
तन्तुसंयोग की एक अर्थ तन्तु में प्रत्यासत्ति भी कहते हैं ।
दूसरे प्रकार की प्रत्यासत्ति को 'कारणैकार्थप्रत्यासत्ति' अथवा परम्परया
प्रत्यासत्ति भी कहते हैं । जो धर्म कार्य के साथ नहीं अपितु कारण के साथ
३८ तर्कभाषा [ असमवायिकारणम्
ननु पटरूपस्य पटः समवायिकारणं, तेन तद्गतस्यैव कस्यचिद्धर्मस्य-
पटरूपं प्रत्यसमवायिकारणत्वमुचितम् । तस्यैव समवायिकारणप्रत्यासन्न
त्वात् । न तु तन्तुरूपस्य । तस्य समवायिकारणप्रत्यासत्त्यभावात् ।
मैवम् । समवायिकारणसमवायिकारणप्रत्यासन्नस्यापि परम्परया
समवायिकारणप्रत्यासन्नत्वात् ।
एक अर्थ में प्रत्यासन्न हो उसको 'कारणैकार्थप्रत्यासन्न' कहेंगे। जैसे 'तन्तुरूप'
कार्यभूत 'पट-रूप' के साथ नहीं अपितु पट-रूप के कारण पट के साथ एक
अर्थ तन्तु में प्रत्यासन्न है । अर्थात् पटरूप का कारण पट है वह अपने समवा-
यिकारण तन्तु में समवाय सम्बन्ध से रहता है । उसी 'तन्तु' गुणी में 'तन्तु-
रूप' गुण समवाय सम्बन्ध से रहता है इसलिये 'तन्तुरूप' और 'पट' दोनों
तन्तुओं में प्रत्यासन्न हुए। इस प्रकार 'तन्तुरूप' यद्यपि 'पट-रूप' के साथ
एकार्थ समवेत नहीं है परन्तु 'पटरूप' के कारण पट के साथ 'तन्तुस्वरूप'
एकार्थ में समवेत है, इसलिए उसे भी परम्परया या 'कारणैकार्थप्रत्यासत्त्या'
समवायिकारण में प्रत्यासन्न माना जा सकता है। अर्थात् समवायिकारण के
समवायिकारण में प्रत्यासन्न धर्म को भी परम्परया समवायिकारण में प्रत्यासन्न
मान कर 'तन्तुरूप' को 'पटरूप' का असमवायिकारण कहा जा सकता है ।
इसी बात को आगे कहते हैं ।
[ प्रश्न ] पटरूप का समवायिकारण [ तो ] पट है इसलिए उस [ पट ] में
रहने वाले किसी धर्म का ही 'पटरूप' के प्रति असमवायिकारणत्व [ मानना ]
उचित है । [ क्योंकि ] उस [ पटगत धर्म ] का ही समवायिकारण प्रत्यासन्नत्व
[ हो सकता ] है । तन्तुरूप का [ पटरूप के प्रति समवायिकारण प्रत्यासन्नत्व ]
नहीं [ हो सकता है ] उस [ तन्तुरूप ] के [ पटरूप के ] समवायिकारण [ पट ] में
प्रत्यासन्न न होने से [ 'तन्तुरूप' का पटरूप के प्रति असमवायिकारणत्व मानना
उचित नहीं है ]
[ यह पूर्व पक्ष हुआ । आगे उसका उत्तर देते हैं ] :-
यह नहीं [ कहना चाहिए ] उस [ पटरूपादि ] के समवायिकारण [ पट ]
के समवायिकारण [ तन्तु ] में प्रत्यासन्न [ तन्तुरूपादि ] का भी परम्परया [ कार-
णैकार्थ प्रत्यासत्ति से ] समवायिकारण [ में ] प्रत्यासन्नत्व [ अभीष्ट ] होने से
[ तन्तुरूप भी पटरूप के समवायिकारण में प्रत्यासन्न माना जा सकता है। अतः
तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण हो सकता है ] ।
इस प्रकार समवायिकारण और असमवायिकारण के लक्षण कर चुकने के
बाद अब तीसरे निमित्तकारण का लक्षण करते हैं ।
निमित्तकारणम् ] प्रमाणनिरूपणम् ३६
निमित्तकारणं तदुच्यते। यन्न समवायिकारणं, नाप्यसमवायिकारणम्।
अथ च कारणं तन्निमित्तकारणम्। यथा वेमादिकं पटस्य निमित्तकारणम्,
तदेतद् भावानामेव त्रिविधं कारणम्। अभावस्य तु निमित्तमात्रं,
तस्य क्वचिदप्यसमवायात्। समवायस्य भावद्वयधर्मत्वात्।
तदेतस्य त्रिविधस्य कारणस्य मध्ये यदेव कथमपि सातिशयं तदेव
करणम्। तेन व्यवस्थितमेतल्लक्षणं प्रमाकरणं प्रमाणमिति।
यत्तु, अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणमिति लक्षणम्, तन्न, एकस्मिन्नेव घटे
घटोऽयं घटोऽयमिति धारावाहिकज्ञानानां गृहीतग्राहिणामप्रामाण्य-
प्रसङ्गात्।
निमित्तकारण उसको कहते हैं। जो न समवायिकारण है और न असम-
वायिकारण है। फिर भी जो कारण है [ अर्थात् जिसमें कारण का लक्षण
'अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वम्' घट जाता है ] उसको निमित्तकारण कहते हैं।
जैसे वेमा आदि पट के निमित्तकारण हैं।
यह तीन प्रकार के [ समवायि, असमवायि और निमित्त ] कारण, भाव
[ अर्थात् सत् ] पदार्थों के ही होते हैं। [ अर्थात् अभाव के नहीं ] अभाव का
तो केवल [ एक ] निमित्त कारण ही होता है। उस [ अभाव ] का कहीं भी
[ किसी भी पदार्थ के साथ ] समवाय सम्बन्ध न होने से [ कोई पदार्थ उसका
समवायिकारण नहीं हो सकता है। और जब समवायिकारण ही नहीं तब असम-
वायिकारण भी नहीं हो सकता है। इसलिए अभाव का केवल निमित्तकारण ही
होता है ]। समवाय के दो भाव पदार्थों का ही धर्म होने से। [अभाव का किसी
से समवाय सम्बन्ध नहीं हो सकता है। और उसके अभाव में समवायि अथवा
असमवायिकारण नहीं बन सकने से अभाव का केवल एक निमित्तकारण ही
होता है। त्रिविध कारण केवल भाव पदार्थों के होते हैं। अभाव के नहीं ]।
इसलिए इस त्रिविध कारण में से जो [ कारण ] किसी प्रकार से भी [अन्यों
की अपेक्षा ] अधिक उत्कृष्ट [ कारण ] है, वही करण [ कहलाता ] है।
इसलिए [ अब प्रमा और करण दोनों पदों की पूर्ण व्याख्या हो जाने से ]
प्रमा का करण प्रमाण [ होता ] है यह [ प्रमाण का ] लक्षण निश्चित हो गया।
और जो [ यह भट्टमतानुयायी मीमांसकों तथा दिङ्नाग आदि बौद्ध आचार्यों
ने] अनधिगत अर्थात् अज्ञात अर्थ के ज्ञापक को प्रमाण कहते हैं यह लक्षण किया
है वह ठीक नहीं है। एक ही घट में [ निरन्तर कई क्षण तक ] यह घड़ा है,
यह घड़ा है इस प्रकार ज्ञात घट का ज्ञान कराने वाली धारावाहिक [ द्वितीय
४० तर्कभाषा [ धारावाहिकम्
न चान्यान्यक्षणविशिष्टविषयीकरणादनधिगतार्थगन्तृता। प्रत्यक्षेण
सूक्ष्मकालभेदानाकलनात्। कालभेदग्रहे हि क्रियादिसंयोगान्तानां
चतुर्णां यौगपद्याभिमानो न स्यात्। क्रिया, क्रियातो विभागो, विभागात्
पूर्वसंयोगनाशः, ततश्चोत्तरदेशसंयोगोत्पत्तिरिति।
आदि ] बुद्धियों के [ गृहीतग्राही होने से ] अप्रामाण्य प्राप्त होने से [अनधिगतार्थ-
गन्तृप्रमाणं यह प्रमाण का लक्षण ठीक नहीं है ]।
[ यदि मीमांसक आदि यह कहें कि प्रथम द्वितीय आदि ] अलग अलग क्षण
विशिष्ट घट का ग्रहण होने से [ द्वितीयादि ज्ञानों में भी ] अनधिगतार्थगन्तृता हो
सकती है। [इसलिए धारावाहिक बुद्धिस्थल में अप्रामाण्य नहीं होगा ] यह भी,
प्रत्यक्ष से सूक्ष्म [ क्षण रूप ] कालभेद के ग्रहण न होने से, ठीक नहीं है।
[ प्रत्यक्ष से क्षणरूप सूक्ष्म ] कालभेद का ग्रहण होने पर तो [ किसी वस्तु के
गिरने या एक स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर जाने में होने वाली ] क्रिया से
लेकर संयोग पर्यन्त चारों [ व्यापारों ] में यौगपद्य [ एक साथ होने ] की प्रतीति
न हो। [जब एक वस्तु एक स्थान को छोड़ कर दूसरी जगह जाती है तब उसके
दूसरी जगह पहुंचने तक चार व्यापार होते हैं ] १. क्रिया, २. क्रिया से विभाग,
३. विभाग से पूर्वसंयोग नाश, और ४ उत्तरदेश संयोग की उत्पत्ति । [परन्तु यह
चारो व्यापार अलग अलग अनुभव में नहीं आते क्योंकि वह अत्यन्त शीघ्रता से
हो जाते हैं। इसलिए सूक्ष्म कालभेद का प्रत्यक्ष से ग्रहण सम्भव न होने से धारा-
वाहिक बुद्धिस्थल में क्षण विशिष्ट घट का ग्रहण नहीं माना जा सकता है। अतः
द्वितीयादि ज्ञानों के गृहीतग्राही होने से 'अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्' यह लक्षण
उसमें अव्याप्त होगा। अतः यह ठीक नहीं है ]
धारावाहिक ज्ञान के विषय में न्याय का मत—
धारावाहिक बुद्धि के प्रामाण्य के विषय में न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध,
जैन आदि अनेक दर्शनों में विचार किया गया है। अधिकांश लोग धारावाहिक
बुद्धिस्थल में द्वितीयादि क्षणों में होने वाले 'अयं घटः' इत्यादि ज्ञान के प्रामाण्य
का ही प्रतिपादन करते हैं परन्तु उनके प्रतिपादन की शैली भिन्न भिन्न है।
इसके प्रामाण्य सिद्ध करने की चिन्ता विशेष रूप से उनको करनी पड़ती है
जो 'अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्' इस प्रकार प्रमाण का लक्षण करते हैं। न्याय
वैशेषिक आदि में प्रमाण के लक्षण में अनधिगतत्व का कोई उल्लेख नहीं किया
गया है इसलिए उनके यहाँ अधिगत विषयक ज्ञान भी प्रमाण ही है। इसीलिए
वाचस्पतिमिश्र, श्रीधराचार्य, जयन्तभट्ट, उदयनाचार्य आदि न्याय और वैशेषिक
धारावाहिकम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४१
के आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में धारावाहिक ज्ञानों को अधिगतार्थविषयक कह
कर भी प्रमाण माना है। 'न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका' में वाचस्पतिमिश्र ने
लिखा है :-
अनधिगतार्थगन्तृत्वं च धारावाहिकविज्ञानानामधिगतार्थगोचराणां लोक-
सिद्धप्रमाणभावानां प्रामाण्यं विहन्तीति नाद्रियामहे। न च कालभेदेनानधिगत
गोचरत्वं धारावाहिकानामिति युक्तम्। परमसूक्ष्माणां कालकलादिभेदानां पिशित-
लोचनैरस्मादृशैरनाकलनात् ।
न चाद्येनेव विज्ञानेनोपदर्शितत्वादर्थस्य, प्रवर्तित्वात्पुरुषस्य, प्रापितत्वाच्चोत्त-
रेषामप्रामाण्यमेव ज्ञानानामिति वाच्यम्। न हि विज्ञानस्यार्थप्रापणं प्रवर्त्तनादन्यद्,
न च प्रवर्तनमर्थप्रदर्शनादन्यत् । तस्मादर्थप्रदर्शनमात्रव्यापारमेव ज्ञानप्रवर्तकं
प्रापकं च। प्रदर्शनं च पूर्ववदुत्तरेषामपि विज्ञानानामभिन्नमिति कथं पूर्वमेव
प्रमाणं नोत्तराण्यपि ।
इस प्रकार न्याय और वैशेषिक के आचार्यों ने धारावाहिक बुद्धिस्थल में
उत्तर विज्ञानों का प्रामाण्य ही माना है और उसमें सूक्ष्मकालभेद का ग्रहण
नहीं माना है। जैसा कि यहां तर्कभाषाकार ने दिखाया है। तर्कभाषा का
प्रकृत लेख न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका से उद्धृत पंक्तियों के प्रारम्भिक एक अनु-
च्छेद के लेख से मिलता हुआ ही है।
धारावाहिकज्ञान के विषय में मीमांसकों का मत—
मीमांसकों ने भी इस विषय पर विचार किया है। मीमांसकों के प्रभाकर
तथा कुमारिलभट्ट दोनों का अनुगमन करने वाली परम्पराओं में धारावाहिक
ज्ञानों का प्रामाण्य स्वीकार किया है परन्तु उनके उपपादन का प्रकार भिन्न
भिन्न हैं। प्रभाकर मतानुयायी शालिकनाथ आदि नैयायिकों के समान सूक्ष्म
काल भेद का समावेश किए बिना ही अनुभूति मात्र होने से उनको प्रमाण
मानते हैं। परन्तु कुमारिलभट्ट के अनुयायी पार्थसारथि मिश्र आदि सूक्ष्म काल-
भेद का ग्रहण मान कर उस प्रामाण्य को स्थापित करते हैं। प्रभाकर मतानु-
यायी शालिकनाथ ने अपनी 'प्रकरणपञ्चिका' में इस विषय का प्रतिपादन करते
हुए लिखा है—
'धारावाहिकेषु तर्हि उत्तरविज्ञानानि स्मृतिप्रमोषादविशिष्टानि कथं प्रमाणानि ?
तत्राह, अन्योन्यनिरपेक्षा धारावाहिकबुद्धयः। व्याप्रीयमाणे हि पूर्वविज्ञानकारण-
१ न्यायवार्तिक तात्पर्य टी० पृ० २१, कन्दली पृ० ६१, न्यायमञ्जरी पृ०
२२, न्यायकुसुमाञ्जलि ४, १ ।
४२ तर्कभाषा [धारावाहिकम्
कलाप उत्तरेषामप्युत्पत्तिरिति न प्रतीतित उत्पत्तितो वा धारावाहिकविज्ञानानि
परस्परस्यातिशेरत इति युक्ता सर्वेषामपि प्रमाणता ।'१
अर्थात् धारावाहिक बुद्धिस्थल में सब ज्ञान परस्पर निरपेक्ष होते हैं । पूर्व
विज्ञान की कारणसामग्री के व्यापार से ही उत्तर विज्ञानों की भी उत्पत्ति हो
जाती है । इसलिये इन सब विज्ञानों में न उत्पत्तिकृत और न प्रतीतिकृत कोई
विशेषता है अतएव सबका ही प्रामाण्य है ।
इसके विपरीत कुमारिल भट्ट के अनुयायी 'शास्त्रदीपिका'-कार पार्थसारथि
मिश्र आदि सूक्ष्म कालभेद का ग्रहण मान कर ही उत्तर विज्ञानों के प्रामाण्य
को स्थापित करते हैं । उसका कारण यह है कि उन्होंने अपने प्रमाणलक्षण में
'अपूर्व' पद का निवेश कर 'अनधिगतार्थगन्तृता' को ही प्रमाण का लक्षण माना
है । इसलिए धारावाहिक बुद्धि के प्रामाण्य के लिए उन्हें सूक्ष्म कालभेद का भी
ग्रहण मानना पड़ा है । पार्थसारथि मिश्र ने अपनी 'शास्त्रदीपिका' में इस
विषय का प्रतिपादन करते हुए लिखा है :—
'नन्वेवं धारावाहिकेषूत्तरेषां पूर्वगृहीतार्थविषयत्वादप्रामाण्यं स्यात् तस्माद
नुभूतिः प्रमाणमिति प्रमाणलक्षणम् ।...तस्मात् यथार्थमगृहीतग्राहि ज्ञानं प्रम-
णमिति वक्तव्यम् । धारावाहिकेष्वप्युत्तरेषां कालान्तरसम्बन्धस्यागृहीतस्या
ग्रहणाद् युक्तं प्रामाण्यम् । सन्नपि कालभेदोऽतिसूक्ष्मत्वान्न परामृश्यत इति चेत्,
अहो सूक्ष्मदर्शी देवानां प्रियः । यो हि समानविषयया विज्ञानधारया
चिरमवस्थायोपरतः सोऽप्यनन्तरक्षणसम्बन्धितयार्थं स्मरति, तथाहि किमत्र घटो-
ऽवस्थित इति पृष्टः कथयति, अस्मिन् क्षणे मयोपलब्ध इति । तथा प्रातरारभ्यै-
तावत्कालं मयोपलब्ध इति । कालभेदे त्वगृहीते कथमेवं वदेत् । तस्मादस्ति
कालभेदस्य परामर्शः तदाधिक्याच्च सिद्धमुत्तरेषां प्रामाण्यम्² ।
अर्थात् क्या यहां घड़ा था या है इस प्रकार का प्रश्न करने पर, अभी इसी
क्षण मैंने देखा था । अथवा सबेरे से अब तक तो मैंने देखा था । इस प्रकार
का उत्तर दिया जाता है । यह उत्तर बिना कालभेद के ग्रहण के कैसे बनेगा ।
इसलिये कालभेद का ग्रहण होता है यह मानना ही चाहिए । और उसके मान
लेने पर उत्तर विज्ञानों में उस काल भेद के आधिक्य से अगृहीतग्राहित्व बन
जावेगा । इसलिए उनका प्रामाण्य सिद्ध ही है । इस प्रकार कुमारिलभट्ट के
अनुयायी पार्थसारथि मिश्र सूक्ष्म कालभेद के ग्रहण का उपपादन कर धारा-
वाहिक बुद्धि के प्रामाण्य को सिद्ध करते हैं ।
१ प्रकरणपञ्जिका पृष्ठ ४२, । बृहती पृष्ठ १०३ ।
२ शास्त्रदीपिका पृष्ठ १२४, १२६ ।
धारावाहिकम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४३
धारावाहिक ज्ञान के विषय में बौद्धों का मत—
बौद्धपरम्परा में आचार्य दिङ्नाग ने 'अनधिगतार्थगन्तृता' को प्रमाण
लक्षण में समावेश करने का प्रयत्न किया है। प्रमाणसमुच्चय की टीका में,
पृष्ठ ११ पर :—
'अज्ञातार्थज्ञापकं प्रमाणम् इति प्रमाणसामान्यलक्षणम्' ।
इस प्रकार प्रमाण का लक्षण किया गया है। अर्थात् अगृहीतग्राही ज्ञान
ही प्रमाण है। गृहीतग्राही ज्ञान के विषय में धर्मोत्तराचार्य ने लिखा है :—
'अतएव अनधिगतविषयं प्रमाणम् । येनैव हि ज्ञानेन प्रथममधिगतोऽर्थः
तेनैव प्रवर्तितः पुरुषः प्रापितश्चार्थः । तत्रैवार्थे किमन्येन ज्ञानेन अधिकं कार्यम् ।
ततोऽधिगतविषयमप्रमाणम् ।'
अर्थात् धर्मोत्तराचार्य के मत में अधिगत विषयक ज्ञान का अप्रामाण्य ही
अभीष्ट है । परन्तु इसके विपरीत हेतुबिन्दु की टीका में 'अर्चट' ने धारावाहिक
ज्ञानों में से योगियों के धारावाही ज्ञान में भट्ट मीमांसकों के अनुसार सूक्ष्म
कालभेद का ग्रहण मान कर उसको प्रमाण माना है और लौकिक पुरुषों के
धारावाहिक ज्ञान में न्याय के अनुसार सूक्ष्म कालभेद का ग्रहण संभव न होने
से उसको अप्रमाण कहा है। यहाँ न्याय का साम्य केवल इतने अंश में है कि
सूक्ष्म कालभेद का लौकिक प्रत्यक्ष से ग्रहण नहीं हो सकता है। शेष धारा-
वाहिक ज्ञान का अप्रमाण होना इस अंश में न्याय के साथ समानता नहीं है।
क्योंकि न्याय तो धारावाहिक ज्ञान को प्रमाण ही मानता है। न्याय के प्रमाण
लक्षण में अज्ञातार्थज्ञापकत्व अभीष्ट नहीं है। बौद्धों ने 'अज्ञातार्थज्ञापकं
प्रमाणम्' यह प्रमाण का सामान्य लक्षण माना है अतएव उनके मत में
धारावाहिक बुद्धि का प्रामाण्य सूक्ष्म कालभेद का ग्रहण होने पर ही सम्भव
है। और वह काल भेद योगिप्रत्यक्ष में तो गृहीत हो सकता है साधारण
लौकिक प्रत्यक्ष में नहीं। इसलिए योगि-प्रत्यक्ष में धारावाहिक ज्ञानों का
प्रामाण्य है और लौकिक धारावाहिक ज्ञानों का अप्रामाण्य है।
धारावाहिक ज्ञान के विषय में जैनों का मत—
जैनदर्शन की परम्परा में दिगम्बर परम्परा के अनुसार धारावाहिक ज्ञान
उसी दशा में प्रमाण माने जा सकते हैं जब क्षणभेदादि के ज्ञानयुक्त विशिष्ट
प्रमा के जनक हों अन्यथा अप्रमाण ही हैं। इस प्रकार इस मत में भी बौद्ध
आचार्य 'अर्चट' के समान धारावाहिक ज्ञान का प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों,
१ प्रमाणसमुच्चय पृ० ११ । २ न्यायबिन्दु टीका पृष्ठ ३ ।
४४ तर्कभाषा [धारावाहिकम्
ननु प्रमायाः कारणानि बहूनि सन्ति प्रमातृप्रमेयादीनि । तान्यपि
किं करणानि उत नेति ?
प्रकार-भेद से, अभिप्रेत हैं। योगिप्रत्यक्षादि में कालभेद का ग्रहण संभव होने
से उनका धारावाहिक ज्ञान भी प्रमाण है। और लौकिक प्रत्यक्ष में कालभेद
का ग्रहण सम्भव न होने से लौकिक धारावाहिकज्ञान प्रमाण नहीं है।
इसके विपरीत श्वेताम्बर सम्प्रदाय की परंपरा में प्रत्यक्ष के लक्षण में
अपूर्व या अनधिगत आदि पदों का समावेश नहीं किया गया है इसलिए वह
धारावाहिक ज्ञान को, और उसी की तरह स्मृति को भी प्रमाण मानने के
पक्ष में हैं। क्योंकि उनके मत से गृहीतग्राहित्व प्रामाण्य का विघातक नहीं है।
हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में इस विषय को इस प्रकार सङ्कलित किया है-
धारावाहिकज्ञानानां गृहीतग्राहिणामपि ।
यथार्थत्वे मतं तेषां प्रामाण्यं गौतमे नये ॥
सूक्ष्मकालकलायोगादर्थभेदं प्रकल्प्य च ।
तस्यागृहीतग्राहित्वात् प्रामाण्यं भट्टसम्मतम् ॥
क्षणभेदेऽर्थभेदस्य कल्पनास्मिन् मते तु या ।
बौद्धानां क्षणवादस्य छायां किञ्चावलम्बते ॥
सूक्ष्मकालकलाभानं विना प्राभाकरैस्तथा ।
अनुभूतिमात्रादेव प्रामाण्यं तस्य सम्मतम् ॥
प्रमाणं योगिनामेवाप्रमाणमन्यदेव च ।
हेतुबिन्दोस्तु टीकायामर्चटो बौद्ध अब्रवीत् ॥
धर्मोत्तरश्च टीकायां न्यायबिन्दोस्तथैव च ।
अप्रामाण्यं परो बौद्धो लिलेखाधिगते तथा ॥
क्षणभेदादिवैशिष्ट्याद् योगजे च दिगम्बराः ।
प्रामाण्यमन्यथात्वस्याप्रामाण्यं सम्प्रचक्षते ॥
श्वेताम्बरास्तु सर्वेऽपि तत्र प्रामाण्यवादिनः ।
तेनानधिगतं नैव लक्षणे तैर्निवेशितम् ॥
बौद्धाः स्मृतेर्विकल्पस्य स्मृतेर्मीमांसकास्तथा ।
व्यावृत्तये प्रमाणस्यागृहीतग्राहितां जगुः१ ॥
[ प्रश्न ] प्रमाता प्रमेय आदि प्रमा के कारण तो बहुत से हैं। वे सब भी
[ प्रमा के ] 'करण' होते हैं अथवा नहीं ?
१ दर्शनमीमांसा अ० ३ ।
प्रमाकरणम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४५
उच्यते। सत्यपि प्रमातरि प्रमेये च, प्रमानुत्पत्तेरिन्द्रियसंयोगादौ
सति, अविलम्बेन प्रमोत्पत्तेरत इन्द्रियसंयोगादिरेव करणम्। प्रमायाः
साधकत्वाविशेषेऽप्यनेनैवोत्कर्षेणास्य प्रमात्रादिभ्योऽतिशयितत्वाद्-
तिशयितं साधकं साधकतमं तदेव करणमित्युक्तम्। अत इन्द्रियसंयोगा-
दिरेव प्रमाकरणत्वात् प्रमाणं न प्रमात्रादि।
तानि च प्रमाणानि चत्वारि। तथा च न्यायसूत्रम् :—
‘प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि¹।
इति।
[ उत्तर ] कहते हैं। प्रमाता और प्रमेय के होने पर भी [ इन्द्रिय सन्निकर्ष
के बिना ] प्रमा की उत्पत्ति न होने से, और इन्द्रिय संयोगादि के होने पर
अविलम्ब प्रमा की उत्पत्ति होती है इसलिए इन्द्रिय संयोगादि ही [ प्रमा का ]
करण है। [प्रमाता प्रमेय और प्रमाण तीनों में] प्रमा के साधकत्व में [समानता
होने पर भी या ] भेद न होने पर भी इसी उत्कर्ष के कारण [ कि इन्द्रिय संयोग
के होने पर अविलम्ब प्रमा उत्पन्न हो जाती है ] इस [ इन्द्रिय संयोगादि ] का
प्रमाता आदि की अपेक्षा अतिशय होने से और अतिशय युक्त साधन के ही
साधकतम होने से वही करण कहा जाता है। इसलिए प्रमा का करण होने से
इन्द्रिय संयोगादि ही प्रमाण कहा जाता है। प्रमाता आदि नहीं।
और वह प्रमाण चार [ प्रकार का ] है जैसा कि न्यायसूत्र [ में कहा ] है
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द [ चारों ] प्रमाण हैं।
इस प्रकार प्रमाण के सामान्य लक्षण के प्रसङ्ग में १ प्रमा का लक्षण,
२ करण का लक्षण, ३ कारण का लक्षण, ४ अन्यों के कारण लक्षण का खंडन,
५ कारण के त्रिविध भेद, ६ समवायिकारण असमवायिकारण निमित्तकारण
के लक्षण, ७ समवाय और संयोग सम्बन्ध का निरूपण, ८ निर्गुणोत्पत्ति का
निरूपण, और ९ धारावाहिक ज्ञान के प्रामाण्य का निरूपण यह सब इस
प्रसक्तानुप्रसक्त रूप से ग्रन्थकार ने इस प्रकरण में दिखाने का प्रयत्न किया है।
अब आगे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों में से एक-एक को लेकर उसका निरूपण
करेंगे। उनमें सबसे पहिले प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण प्रारम्भ करते हैं।
१ न्यायसूत्र १, १, ३।
४६ तर्कभाषा [ प्रत्यक्षम्
प्रत्यक्षम्
किं पुनः प्रत्यक्षम् ?
साक्षात्कारिप्रमाकरणं प्रत्यक्षम् । साक्षात्कारिणी च प्रमा सैवोच्यते
या इन्द्रियजा । सा च द्विधा सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदात् । तस्याः करणं
त्रिविधम् । कदाचिद् इन्द्रियं, कदाचित् इन्द्रियार्थसन्निकर्षः, कदाचिज् ज्ञानम् ।
[ प्रश्न ] फिर प्रत्यक्ष किसको कहते हैं ?
[ उत्तर ] साक्षात्कारिणी प्रमा के करण को प्रत्यक्ष कहते हैं । और साक्षा-
त्कारिणी प्रमा उसको ही कहते हैं जो इन्द्रिय जन्य [ प्रमा ] होती है । वह दो
प्रकार की है [एक] सविकल्पक और [दूसरी] निर्विकल्पक भेद से । उसके करण
तीन प्रकार के हैं । १ कभी इन्द्रिय २ कभी इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष, और
कभी ( निर्विकल्पक ) ज्ञान ।
'प्रत्यक्ष' शब्द का प्रयोग मुख्यतः, साक्षात्कारिणी प्रमा के 'करण' के लिए
होना चाहिए । परन्तु उस करण से उत्पन्न होने वाली प्रमा जो उस प्रमाण का
फल है वह भी 'प्रत्यक्ष' नाम से व्यवहार में कही जाती है । अन्य प्रमाणों में
तो फल और करण में अलग-अलग शब्द प्रयुक्त होते हैं । जैसे अनुमान प्रमाण
के फल के लिए अनुमिति, उपमान प्रमाण के फल के लिए उपमिति, शब्द
प्रमाण के फल के लिए शाब्दबोध, शब्दों का प्रयोग प्रायः होता है । इसलिए
उनमें 'प्रमाण' और 'प्रमा' का व्यवहार भिन्न-भिन्न शब्दों से होता है । परन्तु
प्रत्यक्ष स्थल में 'प्रमाण' और 'प्रमा' दोनों के लिए ही प्रत्यक्ष पद का प्रयोग
होता है । इसलिए यथास्थान उसका उचित अर्थ ग्रहण करना चाहिए ।
प्रत्यक्ष ज्ञान के दो भेद किए हैं एक 'सविकल्पक' और दूसरा 'निर्विक-
ल्पक' । 'नामजात्यादियोजनासहितं सविकल्पकम्' अर्थात् जिसमें वस्तु के स्वरूप
की प्रतीति के साथ उसके नाम जाति आदि का भी भान होता है उसको
सविकल्पक कहते हैं । जैसे घटः पटः आदि की प्रतीति के साथ उनके नाम
जात्यादि का भान होने से, साधारणतः व्यवहार में आने वाले सभी ज्ञान सवि-
कल्पक के उदाहरण हैं । परन्तु जहां केवल वस्तु का स्वरूप प्रतीत होता है
उसके नाम जाति आदि की प्रतीति नहीं होती उसको निर्विकल्पक ज्ञान कहते
हैं । साधारणतः हमारे सभी व्यवहार में आने वाले ज्ञान सविकल्पक ही होते
हैं । इसलिए हम निर्विकल्पक ज्ञान की कल्पना नहीं कर पाते हैं । इसलिए
निर्विकल्पक ज्ञान का उदाहरण विशेष रूप से बालक तथा गूंगे आदि पुरुषों
के ज्ञान को बताया गया है ॥
प्रत्यक्षम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४७
'बालमूकादिविज्ञानसदृशं निर्विकल्पकम्' ।
जैसे बालक एक घड़ी को देखता है तो उसको भी घड़ी के स्वरूप का
ज्ञान उसी प्रकार का होता है जिस प्रकार बड़े व्यक्ति को। जहाँ एक वस्तु के
स्वरूपज्ञान का सम्बन्ध है बड़े और अत्यन्त अबोध बालक के ज्ञान में कोई
अंतर नहीं है। अर्थात् अर्थ के ग्रहण काल में दोनों का ज्ञान एकसा ही होता
है। परन्तु बड़ा व्यक्ति उसके नाम जाति आदि को भी जानता है अतएव
व्यवहार काल में वह उसके नाम जाति का उपयोग करता है। उस अवस्था में
उसका वह ज्ञान सविकल्पक हो जाता है। बालक उसके नाम जाति आदि से
अनभिज्ञ है इसलिए वह नाम आदि से उसका व्यवहार नहीं कर सकता है।
इस प्रकार बालक और प्रौढ़ पुरुष के ज्ञान में अर्थज्ञानकाल में कोई अंतर नहीं
है अपितु व्यवहारकाल में उन दोनों में अन्तर हो जाता है। इस प्रकार बालक
और मूकादि पुरुषों का ज्ञान निर्विकल्पक और अन्य प्रौढ़ पुरुषों का ज्ञान
सविकल्पक ज्ञान है। अर्थ के ग्रहण काल में प्रौढ़ पुरुषों को भी बालक
के ज्ञान के समान नाम जात्यादि रहित निर्विकल्पक ज्ञान ही होता है।
परन्तु 'एकसम्बन्धिज्ञानमपरसम्बन्धिस्मारकम्' अर्थात् सम्बन्धियों में किसी एक
का ज्ञान तुरन्त ही दूसरे सम्बन्धी का स्मरण करा देता है इस नियम के
अनुसार प्रौढ़ पुरुष को अर्थ का स्वरूप ज्ञान होते ही अत्यन्त शीघ्रता से
उसके नाम जात्यादि का स्मरण हो जाता है। इसलिए उसका ज्ञान तुरन्त
सविकल्पक रूप में परिवर्तित हो जाता है।
इस ज्ञान के कारण तीन प्रकार के बताये हैं। एक इन्द्रिय, दूसरा
इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष और तीसरा ज्ञान अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान। इन तीनों के
आगे चौथे सविकल्पक ज्ञान और पांचवें हानोपादानोपेक्षाबुद्धि इन दो फलों को
और जोड़ लेने से पाँच कड़ी की एक शृङ्खला बन जाती है और उस से त्रिविध
करण का स्पष्टीकरण बहुत अच्छे और सरल ढंग से हो जाता है। इन पाँचों
में १ करण, २ अवान्तर व्यापार और ३ फल इन तीन का समावेश होता है।
इन पाँच की श्रृंखला में से यदि प्रथम को करण माना जाय तो दूसरे को
अवान्तर व्यापार और तीसरे को फल मानना चाहिए। इसी प्रकार यदि
दूसरे को करण माना जाय तो तीसरे को अवान्तर व्यापार और चौथे को
फल कहना चाहिए इसी प्रकार यदि तीसरे को करण मानेंगे तो चौथे को
अवान्तर व्यापार और पाँचवें को उसका फल कहना होगा। इस प्रक्रिया को
ध्यान में रख लेने से त्रिविध करणों को सरलता से समझा जा सकेगा। और
उनकी व्याख्या भी स्पष्ट हो जावेगी।
जब संख्या एक अर्थात् इंद्रिय को करण-मानेंगे तब तीसरा अर्थात् निर्वि-
४८ तर्कभाषा [ प्रत्यक्षम्
कदा पुनरिन्द्रियं करणम् ? यदा निर्विकल्परूपा प्रमा फलम् । तथा
हि, आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन । इन्द्रियाणां
वस्तुप्राप्यप्रकाशकारित्वनियमात् । ततोऽर्थसन्निकृष्टेनेन्द्रियेण निर्विकल्पकं
नामजात्यादियोजनाहीनं वस्तुमात्रावगाहि किञ्चिदिदमिति ज्ञानं जन्यते ।
तस्य ज्ञानस्येन्द्रियं करणं, छिदाया इवं परशुः । इन्द्रियार्थसन्निकर्षोऽवा-
न्तरव्यापारः छिदाकरणस्य परशोरिव दारुसंयोगः । निर्विकल्पकं ज्ञानं
फलं, परशोरिव छिदा ।
कल्पक ज्ञान उसका फल और बीच का दूसरा अर्थात् इन्द्रियार्थसन्निकर्ष
अवान्तर व्यापार होगा । अर्थात् इन्द्रिय को कब करण कहा जायगा जब
निर्विकल्पक ज्ञान को फल और इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को अवान्तर व्यापार माना
जाय । इसी प्रकार जब दूसरी संख्या के इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को करण माना
जायगा तब तीसरी संख्या के निर्विकल्पक ज्ञान को अवान्तर व्यापार और चौथी
संख्या के सविकल्पक ज्ञान को फल कहा जायगा । इसी प्रकार जब तीसरी
संख्या के निर्विकल्पक ज्ञान को करण कहा जायगा तब चौथी संख्या का सवि-
कल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार और पाँचवीं संख्या की हानोपादानोपेक्षाबुद्धि
फल होगी । इसी पद्धति से आगे तीन प्रकार के करणों की व्याख्या कहते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर इन्द्रिय कब करण होती है ?
[ उत्तर ] जब [ तृतीय संख्या वाला ] निर्विकल्पक [ ज्ञान ] रूप प्रमा फल
होती है । जैसे कि [पहिले १] आत्मा का मन के साथ संयोग होता है [फिर २]
मन का इन्द्रिय के साथ [ ३ ] इन्द्रिय अर्थ के साथ [ संयुक्त होती है ] इन्द्रियों
के वस्तु को प्राप्त करके [ अर्थात् वस्तु से सम्बद्ध होकर ] ही अर्थ को प्रकाशित
[ अर्थात् पदार्थ का ज्ञान करा सकती है ऐसा ] करने का नियम होने से ।
तब [ अर्थात् इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष होने के बाद ] अर्थ से संयुक्त
इन्द्रिय के द्वारा नाम जाति आदि की योजना से रहित वस्तु [ के स्वरूप ] मात्र
का ग्रहण करने वाला यह कुछ [नाम जात्यादि रहित सी वस्तु] है इस प्रकार का
निर्विकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है। उस [नाम जात्यादि योजना रहित निर्विकल्पक]
ज्ञान का करण इन्द्रिय होती है । जैसे छेदन [ अर्थात् लकड़ी आदि के काटने
की ] क्रिया का [ करण ] फरसा [ होता है ] २ इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष
अवान्तर व्यापार होता है जैसे काटने के साधनभूत फरसे का [ लकड़ी के
काटने में ] लकड़ी [ दारु ] के साथ संयोग [ अवान्तर व्यापार होता है ]
[ और ३ संख्या का ] निर्विकल्पक ज्ञान फल [ होता है ] जैसे फरसे [ रूप
करण का फरसा और लकड़ी के संयोग रूप अवान्तर व्यापार द्वारा ] का [ फल ]
कटना [ होता है ] ।
त्रिविधं करणम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ४६
कदा पुनरिन्द्रियार्थसन्निकर्षः करणम् ?
यदा निर्विकल्पकानन्तरं सविकल्पकं नामजात्यादियोजनात्मकं
डित्थोऽयं, ब्राह्मणोऽयं, श्यामोऽयमिति विशेषणविशेष्यावगाहि ज्ञानमुत्प-
द्यते, तदेन्द्रियार्थसन्निकर्षः करणम् । निर्विकल्पकं ज्ञानमवान्तरव्यापारः,
सविकल्पकं ज्ञानम् फलम् ।
कदा पुनर्ज्ञानं करणम् ?
यदा, उक्तसविकल्पकानन्तरं हानोपादानोपेक्षाबुद्धयो जायन्ते तदा
निर्विकल्पकं ज्ञानं करणम् । सविकल्पकं ज्ञानमवान्तरव्यापारः, हानादि-
बुद्धयः फलम् ।
यहां इन्द्रिय को 'करण', निर्विकल्पक ज्ञान को 'फल' और उनके बीच में
होने वाले इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को 'अवान्तर व्यापार' बताया है । अवान्तर
व्यापार का लक्षण है 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकोऽवान्तरव्यापारः' । जो स्वयं
तत् अर्थात् उस करण से जन्य हो और उस करण से जन्य = उत्पन्न होने वाले
अन्य फल का जनक हो उसको 'अवान्तर व्यापार' कहते हैं । जैसे कुल्हाड़ी से
लकड़ी के काटने में कुल्हाड़ी और लकड़ी का संयोग 'अवान्तर व्यापार' है ।
यह संयोग रूप 'अवान्तर व्यापार' तज्जन्य अर्थात् परशुजन्य है और साथ ही
परशुजन्य जो छेदन रूप फल है उसका जनक भी है । इसलिए 'तज्जन्यत्वे
सति' अर्थात् परशुजन्यत्वे सति 'तज्जन्यजनकः' अर्थात् परशुजन्यच्छिदाजनको
दारुपरशुसंयोगोऽवान्तरव्यापारः । दारु और परशु अर्थात् कुल्हाड़ी और लकड़ी
का संयोग 'अवान्तर व्यापार' है। इसी प्रकार इन्द्रियरूप करण से निर्विकल्पक
ज्ञानरूप फल की उत्पत्ति में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष रूप 'अवान्तर व्यापार' है।
क्योंकि वह इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष स्वयं इन्द्रियजन्य है और इन्द्रियजन्य
निर्विकल्पक ज्ञान का जनक है। अतः उसको 'अवान्तर व्यापार' कहते हैं।
२. और इन्द्रिय तथा अर्थ का सन्निकर्ष कब करण होता है ?
जब निर्विकल्पक के बाद नाम-जात्यादि योजना सहित यह डित्थ है [ नाम
युक्त प्रतीति ], यह ब्राह्मण है [ जातियुक्त प्रतीति ], यह श्याम है [ श्याम रूप,
गुणविशिष्ट प्रतीति ] इस प्रकार का विशेषणविशेष्य [ भाव ] विषयक ज्ञान
उत्पन्न होता है तब इन्द्रियार्थसन्निकर्ष करण, निर्विकल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार
और सविकल्पक ज्ञान फल [ होता ] है ।
३ और ज्ञान [ निर्विकल्पक ज्ञान ] कब करण होता है ?
जब उक्त सविकल्पक ज्ञान के अनन्तर [ ज्ञात वस्तु के ] परित्याग करने,
४ त० भा०
५० तर्कभाषा [ अवान्तरव्यापारः
तज्जन्यस्तज्जन्यजनकोऽवान्तरव्यापारः। यथा कुठारजन्यः कुठारदारु-
संयोगः कुठारजन्यच्छिदाजनकः। अत्र कश्चिदाह-सविकल्पकादीना-
मपीन्द्रियमेव करणम्। यावन्ति त्यान्तरालिकानि सन्निकर्षादीनि तानि
सर्वाण्यवान्तरव्यापार इति।
ग्रहण करने अथवा उपेक्षा करने की बुद्धि उत्पन्न होती है तब [ उस हान उपादान
अथवा उपेक्षा बुद्धि रूप फल के प्रति ] निर्विकल्पक ज्ञान करण [ होता है ]
सविकल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार और हानादि बुद्धि फल होती है।
इन तीनों करणों के निरूपण में 'अवान्तरव्यापार' शब्द का प्रयोग हुआ
है। अत एव 'अवान्तरव्यापार' किस को कहते हैं यह जिज्ञासा उत्पन्न होती
है। उसके निराकरण के लिए आगे 'अवान्तरव्यापार' का लक्षण करते हैं—
[ जो स्वयं ] तत् अर्थात् उस [ करण ] से जन्य हो और तज्जन्य अर्थात्
उस करण से जन्य, का जनक हो, वह अवान्तर व्यापार है। जैसे कुठारजन्य
कुठार दारु [ लकड़ी ] का संयोग कुठार से उत्पन्न होने वाली छेदन क्रिया का
जनक होता है।
यहां [ अर्थात् त्रिविध करण के प्रतिपादन होने ] पर कोई कहते हैं कि
सविकल्पक आदि सब ही [ फलों ] का करण [ केवल एक ] इन्द्रिय ही है और
बीच के जितने हैं वे सब अवान्तर व्यापार हैं। [ अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान की
उत्पत्ति में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष रूप एक अवान्तर व्यापार है। सविकल्पक की
उत्पत्ति में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष और निर्विकल्पक ज्ञान ये दो अवान्तर व्यापार हैं।
और हानोपादान उपेक्षा बुद्धि की उत्पत्ति में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष, निर्विकल्पक ज्ञान
और सविकल्पक ज्ञान ये तोनों अवान्तर व्यापार हैं। ]
निर्विकल्पक ज्ञान के विषय में बौद्ध और जैन मत—
प्रत्यक्ष ज्ञान के इस निर्विकल्पक और सविकल्पक स्वरूप के विषय में
प्रायः तीन प्रकार के सिद्धान्त दार्शनिक क्षेत्र में पाए जाते हैं। बौद्ध दार्शनिक
केवल निर्विकल्पक को ही प्रत्यक्ष मानते हैं। 'दिङ्नागाचार्य' ने अपने 'प्रमाण
समुच्चय' में लिखा है:—
'प्रत्यक्षं कल्पनापोढं नामजात्याद्यसंयु¹तम्'
'दिङ्नागाचार्य' के समान ही 'धर्मकीर्ति' आदि बौद्ध आचार्यों ने भी केवल
निर्विकल्पक को ही प्रत्यक्ष माना है। सविकल्पक को नहीं। इसके विपरीत जैन
दर्शन की परम्परा में केवल सविकल्पक को ही प्रत्यक्ष माना गया है निर्विकल्पक
को नहीं। आचार्य हेमचन्द्र ने अपने जैन दर्शन की परम्परा के अनुसार सविक-
ल्पक को ही प्रत्यक्ष मानने के कारण निर्विकल्पक को 'अनध्यवसाय' रूप कह कर
१ प्रमाण समुच्चय १,
निर्विकल्पकं ज्ञानम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५१
प्रमाण कोटि से भी बाहर रखा है। न्याय, वैशेषिक आदि वैदिक दर्शन की
परम्परा में सविकल्पक और निर्विकल्पक दोनों को प्रत्यक्ष माना है ।
'नाम-जात्यादि-योजनाहीनं वस्तुमात्रावगाहि ज्ञानं निर्विकल्पकम्' यह
निर्विकल्पक ज्ञान का लक्षण किया गया है। अर्थात् जिस में विशेष्य विशेषण
भाव आदि की प्रतीति न हो उस ज्ञान को 'निर्विकल्पक' कहते हैं। यह
'निर्विकल्पक' शब्द, न्याय, वैशेषिक आदि वैदिक परम्परा का शब्द है। इसको
'आलोचन मात्र' भी कहा गया है।
'अस्ति ह्यालोचनज्ञानं प्रथमं निर्विकल्पकम्¹'
ज्ञान की उत्पत्ति-प्रक्रिया में सर्वप्रथम इस प्रकार का वस्तुमात्रावगाहि
ज्ञान उत्पन्न होता है। इसको बौद्ध और जैन परम्परा में भी माना गया है। जैन
परम्परा जो निर्विकल्पक को प्रत्यक्ष नहीं मानती है वह भी इस प्रकार के ज्ञान
का अस्तित्व तो स्वीकार करती है किन्तु उसको 'दर्शन' नाम से कहती है।
निर्विकल्पक ज्ञान के विषय में वैयाकरण मत—
परन्तु मध्वाचार्य तथा बल्लभाचार्य की दो वेदान्त-परम्पराएँ और भर्तृहरि
तथा उनके पूर्ववर्ती वैयाकरणों की परम्परा, ज्ञान के उत्पत्तिक्रम में किसी प्रकार
के सामान्य मात्र बोध का अस्तित्व स्वीकार नहीं करती हैं। उक्त तीनों
परम्पराओं में विशेष्य विशेषण भाव रहित कोई ज्ञान स्वीकार नहीं किया गया
है। उनके मतानुसार प्रत्येक ज्ञान में किसी प्रकार के विशेष का भान अवश्य
होता है। कहीं कम हो कहीं अधिक यह दूसरी बात है। अतएव सारा ज्ञान
सविकल्पक ही होता है। और जहाँ कहीं निर्विकल्पक ज्ञान कहा जाता है वहाँ
उसका इतना ही अभिप्राय होता है कि उसमें अन्यों की अपेक्षा विशेष का
भान कम होता है। ज्ञान मात्र को सविकल्पक मानने वाली इन तीनों
परम्पराओं में भर्तृहरि की शाब्दिक परम्परा ही प्राचीन² है। मध्वाचार्य और
वल्लभाचार्य ने सम्भवतः उसी को अपना लिया है।
ज्ञान दो प्रकार का होता है एक परोक्ष और दूसरा अपरोक्ष । जिस ज्ञान
में कोई दूसरा ज्ञान करण होता है उसको परोक्ष कहते हैं। जैसे अनुमति में
व्याप्तिज्ञान, उपमिति में सादृश्यज्ञान और शाब्दबोध में पदज्ञान करण होता
है। अतएव यह तीनों 'ज्ञानकरणक ज्ञान' होने से 'परोक्ष' ज्ञान कहलाते हैं ।
प्रत्यक्ष ज्ञान में कोई दूसरा ज्ञान करण नहीं होता है। अतः वह अपरोक्ष ज्ञान
कहलाता है। अपरोक्ष ज्ञान का लक्षण 'ज्ञानकरणकान्यत्वमपरोक्षत्वम्' है ।
अर्थात् ज्ञानकरणक से भिन्न ज्ञान अपरोक्ष कहलाता है ।
१ श्लोक वार्तिक १७२ । २ इण्डियन साइकालाजी पृ० ५२-५४ ।
५२ तर्कभाषा [ निर्विकल्पकं ज्ञानम्
निर्विकल्पक ज्ञान का अस्तित्व मानने वाले सभी लोग उसको केवल प्रत्यक्ष
या अपरोक्ष मानते हैं परन्तु जैन परम्परा में जिसने निर्विकल्पक को 'दर्शन' नाम
से व्यवहृत किया है इस 'दर्शन' को परोक्ष भी माना है। क्योंकि उनके यहां परोक्ष
'मतिज्ञान' को भी सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहा है ।
प्रत्यक्ष के प्रकारान्तर से लौकिक और अलौकिक ये दो भेद प्रायः सभी को
स्वीकृत हैं। अस्मदादि लौकिक पुरुषों का प्रत्यक्ष लौकिक प्रत्यक्ष है । और वह
इन्द्रिय सन्निकर्ष आदि कारण सामग्री के होने पर ही सम्भव है। परन्तु योगियों
के प्रत्यक्ष के लिए इन्द्रिय सन्निकर्ष आदि कारण सामग्री की आवश्यकता नहीं है।
योगी जन अपनी योगज सामर्थ्य से इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष के बिना भी भूत, भविष्यत्,
सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट सभी वस्तुओं को ग्रहण कर सकते हैं। उनका यह ज्ञान
यथार्थ और साक्षात्कारात्मक निर्विकल्पक ज्ञान होता है। इस प्रकार लौकिक और
अलौकिक दोनों प्रकार के निर्विकल्पक ज्ञान और उनकी कारण सामग्री के विषय
में प्रायः सभी निर्विकल्पकवादी एक मत हैं ।
परन्तु शाङ्कर वेदान्त में इस कारण सामग्री के विषय में एक नवीन मत
प्रस्तुत किया गया है। अन्य कोई दर्शन प्रत्यक्ष को छोड़कर अनुमानादि अन्य
किसी प्रमाण से अपरोक्ष ज्ञान अथवा निर्विकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति नहीं
मानते हैं। परन्तु शाङ्कर वेदान्त में 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य से अपरोक्ष
निर्विकल्पक की उत्पत्ति मानी है। और इसका उपपादन करने के लिए
'दशमस्त्वमसि' यह लौकिक उदाहरण दिया है। कोई व्यक्ति अपने साथियों की
गणना करता है वह एक से लेकर नौ तक हर एक व्यक्ति को गिन जाता है
परन्तु उसके दसवें साथी का उसको पता नहीं चलता है। तब उसको कोई
दूसरा व्यक्ति बताता है कि 'दशमस्त्वमसि'। इस वाक्य को सुनकर जैसे
दशम व्यक्ति रूप में उसको स्वयं अपना अपरोक्ष ज्ञान होता है। इसी प्रकार
'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों में भी शब्द प्रमाण से अपरोक्ष निर्विकल्पक ज्ञान
हो सकता है। इस प्रकार शाङ्कर वेदान्त में शब्द प्रमाण को भी अपरोक्ष
निर्विकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति का कारण माना है।
निर्विकल्पक के प्रामाण्याप्रामाण्य विषयक द्विविध न्याय मत—
निर्विकल्पक ज्ञान के प्रामाण्य के विषय में भी जैसा कि ऊपर लिख आए
हैं कई पक्ष हैं। बौद्ध दर्शन तथा वेदान्त दर्शन तो निर्विकल्पक को ही प्रत्यक्ष
मानते हैं और उनके अनुसार निर्विकल्प ही मुख्यतः प्रमाण है। न्याय और
वैशेषिक दर्शन में सविकल्पक तथा निर्विकल्पक दोनों को ही प्रमाण माना है ।
षोढा सन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५३
इन्द्रियार्थयोस्तु यः सन्निकर्षः साक्षात्कारिप्रमाहेतुः स षड्विध एव ।
तद्यथा, संयोगः, संयुक्तसमवायः, संयुक्तसमवेतसमवायः, समवायः, समवेतसमवायः
विशेष्यविशेषणभावश्चेति ।
तत्र यदा चक्षुषा घटविषयं ज्ञानं जयन्ते तदा चक्षुरिन्द्रियं, घटोऽर्थः।
परन्तु उनमें भी नव्य और प्राचीन भेद से कुछ मतभेद है । प्राचीन परम्परा के
अनुसार निर्विकल्पक को प्रमा रूप माना जाता है । जैसा कि श्रीधराचार्य ने
'कन्दली' के पृष्ठ १९८ पर स्पष्ट किया है। परन्तु नव्य न्याय में आकर निर्विकल्पक
ज्ञान के प्रमात्व विषय में दो प्रकार के मत हो गए हैं। 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली'
की कारिका १३४ में 'भ्रमभिन्नं ज्ञानमत्रोच्यते प्रमा' यहां भ्रम भिन्न ज्ञान को
प्रमा कहा है । इससे निर्विकल्पक ज्ञान भी भ्रम भिन्न होने से प्रमा श्रेणी में
आ जाता है । अर्थात् विश्वनाथ को निर्विकल्पक ज्ञान का प्रमात्व अभीष्ट है ।
परन्तु नव्य न्याय के प्रमुख व्यवस्थापक गङ्गेशोपाध्याय के अनुसार निर्वि-
कल्पक ज्ञान न प्रमा कहा जा सकता है और न अप्रमा । क्यों कि उनके यहाँ
प्रमात्व और अप्रमात्व दोनों प्रकारता [ विशेषणता ] आदि घटित ज्ञान हैं और
निर्विकल्पक ज्ञान प्रकारतादि शून्य है । इसलिए वह प्रमा और अप्रमा दोनों
से विलक्षण है । इस नव्य मत का उल्लेख करते हुए विश्वनाथ ने लिखा है:—
'अथवा तत्प्रकारं यज्ज्ञानं तद्वद्विशेष्यकम् ।
तत्प्रमा, न प्रमा नापि भ्रमः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥
प्रकारतादिशून्यं हि सम्बन्धानवगाहि तत्' ।
अर्थात् प्रमात्व और अप्रमात्व दोनों प्रकारतादि [ विशेषणता आदि ] घटित
ज्ञान में रहते हैं और निर्विकल्पक ज्ञान प्रकारतादि से शून्य होता है । इसलिए
निर्विकल्पक ज्ञान को न प्रमा कहा जा सकता है और न अप्रमा कहा जा सकता
है इसलिए वह दोनों से विलक्षण है ।
इस प्रकार निर्विकल्पक ज्ञान अनेक रूपों में दार्शनिकों की चर्चा का
विषय रहा है ।
[ प्रत्यक्ष का कारणभूत ] इन्द्रिय और अर्थ का जो सन्निकर्ष साक्षात्कारि-
प्रमा का हेतु है वह छह प्रकार का ही है । १ संयोग, २ संयुक्तसमवाय, ३ संयुक्त-
समवेतसमवाय, ४ समवाय, ५ समवेत समवाय और ६ विशेष्यविशेषणभाव ।
१ उनमें, जब चक्षु से घटविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है तब चक्षुः इन्द्रिय, और
घट अर्थ [ होता है और ] इन दोनों का सन्निकर्ष संयोग ही [ होता ] है ।
१—२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली का० १३४, १३५, १३६ ।
५४ तर्कभाषा [ षोढा सन्निकर्षः
अनयोः सन्निकर्षः संयोग एव, अयुतसिद्धयभावात् । एवं मनसाऽन्तरि-
न्द्रियेण यदात्मविषयकं ज्ञानं जन्यतेऽहमिति, तदा मन इन्द्रियम्,
आत्माऽर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयोग एव ।
कदा पुनः संयुक्तसमवायः सन्निकर्षः ?
यदा चक्षुरादिना घटगतरूपादिकं गृह्यते घटे श्यामं रूपमस्तीति,
तदा चक्षुरिन्द्रियं, घटरूपमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्तसमवाय एव ।
चक्षुःसंयुक्ते घटे रूपस्य समवायात् । एवं मनसाऽऽत्मसमवेते सुखादौ
गृह्यमाणे, अयमेव सन्निकर्षः ।
घटगतपरिमाणादिग्रहे चतुष्टयसन्निकर्षोऽप्यधिकं कारणमिष्यते ।
सत्यपि संयुक्तसमवाये तदभावे दूरे परिमाणाद्यग्रहणात्। चतुष्टयसन्निकर्षो
अयुतसिद्धि का अभाव होने से [ अर्थात् यदि चक्षुः और घट अयुतसिद्ध होते
तो उनका परस्पर समवाय सम्बन्ध होता । परन्तु यह दोनों अयुतसिद्ध नहीं हैं
इसलिए उनका सम्बन्ध संयोग ही है ]
इसी प्रकार अन्तःकरण मन से जब आत्मविषयक ज्ञान होता है तब मन,
इन्द्रिय और आत्मा अर्थ [ होता है और ] इन दोनों का मम्बन्ध संयोग ही
होता है । [ यह दो उदाहरण संयोग सन्निकर्ष के दिये । इनमें से प्रथम
बाह्येन्द्रिय के संन्निकर्ष का और दूसरा अन्तरिन्द्रिय अन्तःकरण-मन-के सन्निकर्ष
का है। आगे संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष के भी इसी प्रकार के दो उदाहरण देते हैं ]
२ [ प्रश्न ] फिर संयुक्तसमवाय का सन्निकर्ष कब होता है ?
[ उत्तर ] जब चक्षुः आदि [ इन्द्रिय ] से घटगत रूपादिक [ गुण ] का
ग्रहण होता है कि घट में श्याम रूप है तब चक्षुः इन्द्रिय [ और ] घटरूप अर्थ
[ होता है ] और इन दोनों का सन्निकर्ष 'संयुक्तसमवाय' ही होता है । चक्षु से
संयुक्त घट में रूप का समवाय होने से [ चक्षु इन्द्रिय और घटरूप अर्थ का 'संयुक्त-
समवाय' सन्निकर्ष होता है । ]
इसी प्रकार [ अन्तरिन्द्रिय ] मन से आत्मा में रहने वाले सुखादि [ गुणों के
ग्रहण होने पर यह [ संयुक्तसमवाय ] सन्निकर्ष ही होता है।
[ घटगत रूपादि गुणों के समान घटगत परिमाणादि का ग्रहण भी 'संयुक्त
समवाय' सम्बन्ध से ही होता है परन्तु ] घटगत परिमाण आदि के ग्रहण में
[ इन्द्रिय और अर्थ दोनों के अवयव, दोनों के अवयवी, पहिले का अवयव और
दूसरे का अवयवी या दूसरे का अवयव और पहिले का अवयवी इस प्रकार इन
चार के ] 'चतुष्टय सन्निकर्ष' को भी अतिरिक्त कारण मानना अभीष्ट है !