तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
संयोगगुणः ] प्रमेयनिरूपणम् २०१
८-संयोगः संयुक्तव्यवहारहेतुर्गुणः । स च द्व्याश्रयोऽव्याप्यवृत्तिश्च ।
स च त्रिविधः । अन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजः, संयोगजश्चेति ।
तत्रान्यतरकर्मजो यथा क्रियावता श्येनेन सह निष्क्रियस्य स्थाणोः
संयोगः । अस्य हि श्येनक्रिया असमवायिकारणम् । उभयकर्मजो यथा
सक्रिययोर्मल्लयोः संयोगः । संयोगजो यथा कारणाकारणसंयोगात्
कार्याकार्यसंयोगः । यथा हस्ततरुसंयोगेन कायतरुसंयोगः ।
१एतावांस्तु विशेषः । एकत्वादिवदेकपृथक्त्वादिष्वपरसामान्याभावः संख्यया
तु विशिष्यते । तद्विशिष्टव्यवहारदर्शनादिति ।
८ संयोग-निरूपण—
[ यह इससे संयुक्त है इस प्रकार के ] संयुक्त व्यवहार का हेतु-भूत गुण
'संयोग' है । वह द्विष्ट [ दो पदार्थों में रहने वाला ] और अव्याप्यवृत्ति [ रूपादि
के समान सारे पदार्थ में व्याप्त न होकर उसके केवल एक देश में रहनेवाला ]
होता है । और वह [ प्रकारान्तर से ] तीन प्रकार का होता है १ अन्यतरकर्मज,
२ उभयकर्मज, और ३ संयोगज-संयोग । उनमें अन्यतर-कर्मज [ अर्थात् संयुक्त
होने वाले दोनों पदार्थों में से किसी एक के कर्म से उत्पन्न हुए संयोग का
उदाहरण ] जैसे क्रियावान् [ अर्थात् उड़कर आए हुए श्येन ] बाज के साथ
निष्क्रिय स्थाणु [ वृक्ष के ठूंठ ] का संयोग । इस [ स्थाणु तथा श्येन के संयोग
का समवायिकारण तो वह दोनों ही हैं परन्तु इस ] का असमवायिकारण श्येन
की क्रिया है । उभयकर्मज [ संयोग का उदाहरण ] जैसे सक्रिय दो पहलवानों का
संयोग [ दोनों पहलवान इधर उधर से आकर भिड़ जाते हैं इसलिए उनका संयोग
दोनों के कर्म से होने के कारण 'उभयकर्मज' संयोग है ] संयोगज संयोग का
उदाहरण ] जैसे [ शरीर के ] कारण [ अवयव रूप हाथ ] और [ उस शरीर
के ] अकारण [ रूप वृक्ष ] के संयोग से [ हाथ के ] कार्य [ भूत शरीर ] और
अकार्य [ भूत वृक्ष ] का संयोग । जैसे हाथ और वृक्ष का संयोग होने से शरीर
का वृक्ष के साथ संयोग [ होता है वह संयोगज संयोग का उदाहरण है ] ।
इस प्रकार संयोग के तीन भेद किए । यह तीनों प्रकार का संयोग जन्य
है । अर्थात् नित्य संयोग नहीं होता है । परिमाण आदि तो नित्य में रहने वाले
नित्य भी होते हैं परन्तु संयोग नित्य पदार्थों का भी अनित्य ही होता है । जैसे
नित्य परमाणु का नित्य आकाश आदि के साथ संयोग है । परन्तु वह नित्य
१ वैशेषिक प्रशस्तपाद भाष्य ।
२०२ तर्कभाषा [ विभागगुणः
६-विभागोऽपि विभक्तप्रत्ययहेतुः । संयोगपूर्वको द्व्याश्रयः । स च
त्रिविधोऽन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजो विभागजश्चेति । तत्र प्रथमो यथा
श्येनक्रियया शैलश्येनयोर्विभागः । द्वितीयो यथा मल्लयोर्विभागः ।
तृतीयो यथा हस्ततरुविभागात् कायतरुविभागः !
द्वित्वे च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे ।
यस्य न स्खलिता बुद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥
नहीं अपितु 'अन्यतरकर्मज' है। परमाणु में गति होती है। वह एक स्थान से
दूसरे स्थान पर जा कर उस देश के आकाश से मिलता है इसलिए इनका
संयोग 'अन्यतरकर्मज' संयोग होता है। नित्य संयोग नहीं । अब प्रश्न रह
जाता है आकाश और काल आदि नित्य तथा विभु पदार्थों के संयोग का । सो
उसके विषय में वैशेषिक दर्शन का सिद्धान्त यह है कि नित्य और विभु पदार्थों
का परस्पर संयोग होता ही नहीं है। क्योंकि संयोग सम्बन्ध 'युत सिद्ध-पृथक्'
पृथक् पदार्थों का ही होता है। 'युत-सिद्धि' का अर्थ यह है कि उन दोनों
पदार्थों में से दोनों अथवा कोई एक पृथक् गतिमान् हो । नित्य और विभु
पदार्थों में से किसी में भी पृथग्गतिमत्त्व नहीं रहता है, इसलिए उनका संयोग
होता ही नहीं है। इस विषय में वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में
लिखा है—
नोऽन्त्यजः संयोगः । १••••••परमाणुभिराकाशादीनां प्रदेशवृत्तिरन्यतरकर्मजः
संयोगः विभूनां तु परस्परतः संयोगो नास्ति युतसिद्धयभावात् । सा पुनर्द्वयोर-
न्यतरस्य वा पृथग्गतिमत्त्वम्, पृथगाश्रयाश्रयित्वञ्चेति ।
संयोग के विनाश के दो कारण होते हैं या तो जिन का संयोग है उनमें ही
विभाग गुण उत्पन्न हो जाय तो पूर्व संयोग का नाश हो जाता है। अथवा
आश्रय के नाश से भी संयोग का नाश हो जाता है।
९ विभाग-निरूपण—
विभक्त प्रतीति का हेतु [ भूत गुण ] 'विभाग' है। वह संयोगपूर्वक और
दो में आश्रित रहने वाला है। और वह [ भी ] तीन प्रकार का है। १ अन्यतर-
कर्मज, २ उभयकर्मज, और ३ विभागजविभाग। उनमें प्रथम [ अर्थात् अन्यतर-
कर्मज विभाग का उदाहरण ] जैसे श्येन की [ उड़ जाने की ] क्रिया से श्येन
और पर्वत का विभाग । दूसरा [ उभयकर्मज विभाग का उदाहरण ] जैसे दो
पहलवानों का विभाग, तीसरा [ विभागज विभाग ] जैसे हाथ और वृक्ष के विभाग
से शरीर और वृक्ष का विभाग ।
१ सर्वदर्शनसंग्रह वै० द० । २ प्रशस्तपाद भाष्य संयोग प्र० ।
परत्वापरत्वगुणौ ] प्रमेयनिरूपणम् २०३
१०-११-परत्वापरपरत्वे परापरव्यवहारासाधारणकारणे। ते तु द्विविधे
दिक्कृते कालकृते च । तत्र दिक्कृतयोरुत्पत्तिः कथ्यते । एकस्यां
दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोरिदमस्मात् सन्निकृष्टमिति बुद्ध्याऽनुगृहीतेन
'संयोगज-संयोग' और 'विभागज-विभाग' की व्याख्या करते समय 'कार-
णाकारणसंयोगात् कार्याकार्यसंयोगः' । और 'कारणाकारणविभागात् कार्याकार्य-
विभागः' । इस प्रकार की व्याख्या की गई है । इस पर शङ्का यह हो सकती
है कि यदि हस्त-तरु-संयोग से भिन्न काय-तरु-संयोग को माना जाय अथवा
हस्ततरु-विभाग से भिन्न कायतरु-विभाग को माना जाय तो हाथ और शरीर
जो अवयव और अवयवी होने से 'अयुत-सिद्ध' हैं उनमें 'युत-सिद्धि' प्राप्त होने
लगेगी । उन दोनों के 'अयुत-सिद्ध' होने से हाथ का तरु के साथ जो विभाग है
उसी को शरीर के साथ विभाग मानना चाहिए । इसी प्रकार हाथ का वृक्ष के
साथ जो संयोग है उसको ही शरीर और वृक्ष का संयोग मानना चाहिए ।
अन्यथा हस्त और शरीर का 'अयुतसिद्धत्व' नहीं बनेगा । इसलिए 'संयोगज-
संयोग' अथवा 'विभागज-विभाग' मानना उचित नहीं है ।
इसका उत्तर यह दिया गया है कि 'युत-सिद्धि' का लक्षण पहले किया जा
चुका है । 'सा पुनर्द्वयोरन्यतरस्य वा पृथग्गतिमत्त्वं युतेषु आश्रयेष्वाश्रयित्वं वा' ।
अर्थात् दोनों में किसी एक की पृथग्गतिमत्ता अथवा भिन्न-भिन्न आश्रयों में रहने
को ही 'युत-सिद्धि' कहते हैं । इनमें से पहिला लक्षण नित्य पदार्थों में और
दूसरा लक्षण अनित्य पदार्थों में पाया जाता है । इस प्रकार की 'युत-सिद्धि'
हस्त और देहादि में नहीं घट सकती है । इसलिए यह दोष नहीं है ।
ऊपर पृथक्त्व और विभाग दो गुण माने गए हैं । इनमें से विभाग
क्षणिक और अस्थिर है । पृथक्त्व स्थिर । जिस पदार्थ का दूसरे
से विभाग होता है उस विभक्त पदार्थ का पूर्वसंयोग-नाश और उत्तर देश-
संयोग हो जाने के बाद विभाग नष्ट हो जाता है । विभाग की सीमा उत्तरदेश- .
संयोग के साथ समाप्त हो जाती है और उसके बाद पृथक्त्व की सीमा प्रारम्भ
होती है । अर्थात् जहाँ पहुँच कर विभाग समाप्त हो जाता है वहाँ से पृथक्त्व
प्रारम्भ होता है ।
१०-११ परत्व और अपरत्व का निरूपण—
'पर' और 'अपर' व्यवहार के असाधारण कारण [ क्रमशः ] 'परत्व' और
'अपरत्व' [ नामक गुण ] हैं । वे [ दोनों ] दो प्रकार के होते हैं दिक्कृत और
कालकृत [ परत्व तथा अपरत्व ] । दिक्कृत [ परत्व और अपरत्व ] की उत्पत्ति
कहते हैं । एक दिशा में रखे हुए दो पिण्डों में यह इसकी अपेक्षा समीप है इस
दिक्पिण्डसंयोगेनापरत्वं सन्निकृष्टे जन्यते । विप्रकृष्टबुद्ध्या तु परत्वं
विप्रकृष्टे जन्यते । सन्निकर्षस्तु पिण्डस्य द्रष्टुः शरीरापेक्षया संयुक्तसंयोगा-
ल्पीयस्त्वम् । तद्भूयस्त्वं विप्रकर्ष इति ।
कालकृतयोस्तु परत्वापरत्वयोरुत्पत्तिः कथ्यते । अनियतदिगव-
स्थितयोर्युवस्थविरपिण्डयोः 'अयमस्मादल्पतरकालसम्बद्धः' इत्यपेक्षाबु-
द्ध्यानुगृहीतेन कालपिण्डसंयोगेनासमवायिकारणेन यूनि, अपरत्वम् ।
'अयमस्माद् बहुतरकालेन सम्बद्धः' इति धिया स्थविरे परत्वम् ।
१२ गुरुत्वमाद्यपतनासमवायिकारणम् । पृथिवीजलवृत्ति । यथोक्तं-
ज्ञान से सहकृत दिक् और पिण्ड के संयोग से सन्निकृष्ट [पिण्ड] में 'अपरत्व'
उत्पन्न होता है । सन्निकर्ष [का अर्थ] तो देखने वाले के शरीर की अपेक्षा
से पिण्ड से संयुक्त [दिक्] के संयोग का न्यूनत्व है । और उस [संयुक्त संयोग]
का भूयस्त्व [आधिक्य का नाम] विप्रकर्ष है ।
कालकृत 'परत्व' और 'अपरत्व' की उत्पत्ति [का प्रकार] कहते हैं ।
अनियत दिशा में स्थित [दिक्-कृत में 'एकस्यां दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोः' कहा
था उसके विपरीत यहां कालकृत में अनियत दिशा में स्थित कहा है] युवक
तथा वृद्ध [पुरुष] में यह [युवक] इस [वृद्ध] की अपेक्षा अल्पतर काल-
सम्बद्ध है इस 'अपेक्षा-बुद्धि' से अनुगृहीत काल और पिण्ड के संयोग रूप असम-
वायिकारण से युवक में 'अपरत्व' उत्पन्न होता है, और यह [वृद्ध] इस [युवक]
की अपेक्षा अधिकतर कालसम्बद्ध है इस 'अपेक्षा-बुद्धि' [से अनुगृहीत काल
पिण्ड संयोग] से वृद्ध पुरुष में 'परत्व' उत्पन्न होता है ।
परत्वापरत्व के विनाश के ६ कारण हैं । १ कहीं अपेक्षा बुद्धि के नाश
से । २ कहीं संयोग के नाश से ३ कहीं द्रव्य के नाश से, ४ कहीं द्रव्य-
बुद्धि के युगपद् विनाश से ५ कहीं द्रव्य और संयोग के नाश से, ६ कहीं संयोग
और अपेक्षाबुद्धि के नाश से, ७ और कहीं समवायिकारण, असमवायिकारण,
तथा निमित्त कारण तीनों के नाश से परत्वापरत्व का नाश हो सकता है । प्रशस्त
पादभाष्य में इन सबका सोदाहरणों से विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है ।
१३ गुरुत्व-निरूपण—
आद्य पतन का असमवायिकारण 'गुरुत्व' है [आद्य पद देने का अभिप्राय
यह है कि आगे द्वितीयादि क्षण में जो पतन होता है उसका कारण वेग संस्कार
होता है जिसका उल्लेख आगे किया जायगा । प्रथम बार जो पतन होता है केवल
उसका असमवायि कारण 'गुरुत्व' है] पृथिवी और जल में रहता है । जैसा कि
द्रवत्व-स्नेह-शब्दाः ] प्रमेयनिरूपणम् २०५
संयोग-वेग-प्रयत्नाभावे सति गुरुत्वात् पतनमिति ।
१३-द्रवत्वमाद्यस्यन्दनासमवायिकारणम् । भूतेजोजलवृत्ति । भूतेज-
सोर्घृतादिसुवर्णयोरग्निसंयोगेन द्रवत्वं नैमित्तिकम्। जले नैसर्गिकं द्रवत्वम्।
१४-स्नेहश्चिकणता । जलमात्रवृत्तिः, कारणगुणपूर्वको, गुरुत्वादिवद्
यावद्द्रव्यभावी ।
१५-शब्दः श्रोत्रग्राह्यो गुणः । आकाशस्य विशेषगुणः ।
ननु कथमस्य श्रोत्रेण ग्रहणं यतो भेर्यादिदेशे शब्दो जायते श्रोत्रन्तु
पुरुषदेशेऽस्ति ।
[ वैशेषिक सूत्रकार ने ] कहा है संयोग, वेग और प्रयत्न [ ये तीनों पतन के
प्रतिबन्धक हैं ] इनके अभाव में 'गुरुत्व' के कारण पतन होता है ।
१३ [ गुरुत्व के समान ही ] आद्य स्यन्दन [ बहना-प्रवाहित होना ] का
असमवायि कारण 'द्रवत्व' [ नामक गुण ] है । पृथिवी, तेज और जल में रहने
वाला है। [ इन में से ] पार्थिव घृतादि, और तैजस सुवर्णं में अग्निसंयोग से
[ उत्पन्न होने वाला ] 'नैमित्तिक द्रवत्व' रहता है और जल में नैसर्गिक द्रवत्व
है । [ जल के नैसर्गिक द्रवत्व का भी, भोक्ता आत्मविशेष, के अदृष्टादि सहकारी
कारणों के अभाव से प्रतिरोध हो सकता है । ]
१४ 'स्नेह' [ गुण ] चिकनापन [ का नाम ] है । केवल जल में रहता है ।
कारणगुणपूर्वक [ अर्थात् पहिले कारणरूप द्वयणुकादि में और फिर उसके
कार्यभूत त्र्यणुकादि में उत्पन्न होता है ] और गुरुत्वादि के समान यावद्द्रव्य-
भावी [ अर्थात् जब तक वह जल रहता है तब तक उसमें स्नेह गुण रहता ] है।
१५ श्रोत्रग्राह्य गुण 'शब्द' [कहलाता] है । वह आकाश का विशेष गुण है।
[ प्रश्न ] इसका श्रोत्र से कैसे ग्रहण होता है क्योंकि शब्द तो भेरी आदि
देश में उत्पन्न होता है और श्रोत्र पुरुष देश में है । [ अर्थात् दोनों के भिन्न देशमें
होने से श्रोत्र से शब्द का ग्रहण नहीं हो सकता है ]
दूर देश में उत्पन्न होने वाला शब्द हमको किस प्रकार सुनाई देता है
इसका उपपादन के लिये आधुनिक विज्ञान के समान प्राचीन दार्शनिकों ने
भी शब्दधारा मानी है । न्याय शब्द की गति या उत्पत्ति के दो प्रकार माने
हैं । एक को 'वीचीतरङ्गन्याय' और दूसरे को 'कदम्बमुकुलन्याय' कहते हैं ।
इन दोनों का अन्तर यह है कि 'वीचीतरङ्गन्याय' में चारो दिशाओं में फैलने
वाली शब्द की एक लहरसी होती है । और 'कदम्बमुकुलन्याय' में चारो
२०६ तर्कभाषा [ 'शब्दगुणः
दिशाओं में उत्पन्न होने वाले शब्द अलग-अलग से होते हैं । जैसा कि नीचे
दिए चित्र में स्पष्ट हो रहा है—
कदम्बमुकुल न्याय से शब्दधारा की गति
ऊपर एक चित्र दिया हुआ है। यह चित्र भौतिक विज्ञान के ग्रन्थ से
लिया गया है । आधुनिक वैज्ञानिक जिस रूप में शब्द की गति मानते हैं
उसका प्रदर्शन इस चित्र में किया गया है । 'वीचीतरङ्गन्याय' तथा 'कदम्ब-
मुकुल न्याय' दोनों का स्पष्टीकरण इस चित्र से भली प्रकार हो जाता है । इस
चित्र में घण्टे के पास में बिन्दुओं का चक्र दिखाई देता है कुछ दूर चलने के
बाद वह एक तरङ्ग के रूप में दिखाई देता है। इस प्रकार शब्द की गति के
दो रूप यहाँ दिखाई दे रहे हैं। इनमें से पहले स्वरूप को प्राचीन आचार्यों ने
'कदम्बमुकुलन्याय' और दूसरे को 'वीचीतरङ्गन्याय' नाम से प्रकट किया है ।
'कदम्ब-मुकुल' का अर्थ कदम्ब का फूल या कली है । कदम्ब के फूल की बना-
वट ठीक इसी प्रकार की होती है जैसी कि घंटे के पास की शब्द धारा में
दिखाई पड़ रही है । कदम्ब के फूल के सिर पर केन्द्र में एक कील सी खड़ी
होती है। फिर उसके चारो ओर उसी प्रकार की कीलें सी खड़ी होती हैं ।
देखने में ठीक ऐसी ही होती है जैसी घण्टे के पास की शब्द-धारा दिखाई दे
रही है । इसीलिए इस प्रकार की शब्दधारा को सूचित करने के लिए 'कदम्ब-
मुकुलन्याय' इस शब्द का विशेषरूप से प्रयोग किया गया है। चित्र में
चारो ओर अलग अलग बिन्दु दिखाई दे रहे हैं । इसलिए चारो ओर उत्पन्न
होने वाले शब्दों को अलग अलग भी कहा जा सकता है ।
थोड़ी दूर चलने के बाद चित्र में अलग-अलग बिन्दुओं के स्थान पर
एक वीची या लहर का चक्र सा दिखाई देने लगता है । अर्थात्
शब्दगुणः ] प्रमेयनिरूपणम् २०७
सत्यम् । भेरीदेशे जातः शब्दो वीचीतरङ्गन्यायेन कदम्बमुकुल-
न्यायेन वा सन्निहितं शब्दान्तरमारभते । स च शब्दः शब्दान्तर-
मितिक्रमेण श्रोत्रदेशे जातोऽन्त्यः शब्दः श्रोत्रेण गृह्यते न त्वाद्यो नापि
मध्यमः । एवं वंशे पाट्यमाने दलद्वयविभागदेशे जातः शब्दः शब्दान्तरा-
रम्भक्रमेण श्रोत्रदेशेऽन्त्यं शब्दं जनयति । सोऽन्त्यः शब्दः श्रोत्रेण गृह्यते
नाद्यो न मध्यमः। 'भेरीशब्दो मया श्रुत' इति मतिस्तु भ्रान्तैव । भेरीशब्दो-
त्पत्तौ भेर्याकाशसंयोगोऽसमवायिकारणं, भेरीदण्डसंयोगो निमित्तकारणम् ।
एवं वंशोत्पाटनाच्चटचटाशब्दोत्पत्तौ वंशदलाकाशविभागोऽसमवायि-
कारणं, दलद्वयविभागो निमित्तकारणम् । इत्थमाद्यः शब्दः संयोगजो
चारों दिशाओ में उत्पन्न होने वाले शब्दों की एक लहर सी प्रतीत होने लगती
है । जैसे यदि पानी में कोई पत्थर डाल दिया जाय तो उससे चारो ओर एक
लहर का चक्र सा बन जाता है ठीक उसी प्रकार की रचना इस चित्र के दिए
हुए चक्र की है । इसीलिए इस प्रकार की शब्द की गति के लिए प्राचीन
आचार्यों ने 'वीचीतरङ्गन्याय' शब्द का प्रयोग किया है। प्राचीन आचार्यों का
शब्दधारा का निरूपण आधुनिक विज्ञान से एक दम मिल गया आश्चर्य है ।
इसी का वर्णन ग्रन्थकार आगे करते हैं—
[ उत्तर ] आपका कथन ठीक है । परन्तु भेरी में उत्पन्न हुआ शब्द
'वीचीतरङ्ग न्याय' से अथवा 'कदम्बमुकुल न्याय' से समीपवर्ती दूसरे शब्द को
उत्पन्न करता है, और वह शब्द दूसरे शब्द को उत्पन्न करता है इस प्रकार क्रम
से श्रोत्र देश में उत्पन्न हुआ अन्तिम शब्द श्रोत्र इन्द्रिय से गृहीत होता है । आदि
या मध्यम शब्द नहीं । इसी प्रकार बांस के फाड़ते समय दोनों दलों के विभाग
देश में उत्पन्न शब्द दूसरे शब्द को उत्पन्न करने के क्रम से श्रोत्र देश में [ सुने
जाने वाले ] अन्तिम शब्द को उत्पन्न करता है । वह अन्त्य शब्द श्रोत्र इन्द्रिय
से गृहीत होता है । न आदि का और न बीच का । ] 'मैंने भेरी का शब्द सुना'
यह प्रतीति तो भ्रान्ति ही है [ क्योंकि भेरी से उत्पन्न शब्द गृहीत नहीं होता है
अपितु उस शब्दधारा में श्रोत्र देश में उत्पन्न होने वाला शब्द गृहीत होता है ]
भेरी शब्द की उत्पत्ति में भेरी और आकाश का संयोग असमवायि कारण है और
भेरी-दण्ड का संयोग निमित्त कारण है ।
इसी प्रकार बांस के फाड़ने से चट चट शब्द की उत्पत्ति में बांस के दल
और आकाश का विभाग असमवायिकारण और दोनों दलों का विभाग निमित्त
कारण है । इस प्रकार आदि शब्द संयोग अथवा विभाग से उत्पन्न होने वाला
विभागजो वा † अन्त्यमध्यमशब्दास्तु शब्दासमवायिकारणका अनुकूल-
वातनिमित्तकारणकाः । यथोक्तं—१"संयोगाद् विभागाच्छब्दाच्च शब्द-
निष्पत्तिः' इति । आद्यादीनां सर्वशब्दानामाकाशमेकमेव समवायिकारणम् ।
कर्मबुद्धिवत् त्रिक्षणावस्थायित्वम्। तत्राद्यमध्यमशब्दाः कार्यशब्दनाश्याः ।
अन्त्यस्तूपान्त्येन उपान्त्यस्त्वन्त्येन सुन्दोपसुन्दन्यायेन विनश्येते । इदं
त्वयुक्तम् । उपान्त्येन, त्रिक्षणावस्थायिनोऽन्त्यस्य, द्वितीयक्षणमात्रानुगामिना
तृतीयक्षणे चासताऽन्त्यनाशजननासम्भवात् । तस्मादुपान्त्यनाशादेवा-
न्त्यनाश इति ।
होता है । अन्त्य और बीच के शब्द तो शब्द असमवायि कारण वाले और
अनुकूल वातादि निमित्तकारण वाले होते हैं। जैसा कि [ वैशेषिक दर्शन के
सूत्रकार ने ] कहा है, संयोग, विभाग और शब्द से शब्द की उत्पत्ति होती है।
आद्य आदि सभी शब्दों का केवल आकाश ही समवायिकारण होता है। कर्म
और बुद्धि के समान [ शब्द भी क्षणिक है। और न्याय-वैशेषिक के मत में
क्षणिक का अर्थ ] त्रिक्षणावस्थायित्व है । [ क्षणिक पदार्थ प्रथम क्षण में उत्पन्न
होता है दूसरा क्षण उसकी स्थिति का क्षण है और तीसरा क्षण उसके विनाश
का क्षण है । इस प्रकार तीन क्षण तक रहने पर भी वह 'क्षणिक' कहलाता है ।
बौद्ध लोग सभी पदार्थों को 'क्षणिक' मानते हैं परन्तु उनके यहाँ जो उत्पत्तिक्षण
है वही स्थिति और विनाश का भी क्षण है इसलिए उनके यहां त्रिक्षणावस्था-
यित्व 'क्षणिक' शब्द का अर्थ नहीं होता है ] । उन [ तीनों शब्दों ] में से आदि
और मध्यम शब्द [ अपने से उत्पन्न होने वाले अगले ] कार्यशब्द से नाश्य हैं ।
[ जब अगला शब्द उत्पन्न होता है तो वह अपने कारणभूत शब्द को नष्ट कर
देता है ] परन्तु अन्त्य शब्द का नाश उपान्त्य और उपान्त्य का नाश अन्त्य से
'सुन्दोपसुन्द-न्याय' से होता है [ यह एक मत है उसका खण्डन करते हैं ]
यह ठीक नहीं है । [ क्योंकि उपान्त्य का जो स्थिति क्षण है वही अन्त्य का
उत्पत्तिक्षण है । 'वध्यघातकभाव' अथवा 'सहानवस्थान' में से कोई भी विरोध
माना जाय अन्त्य शब्द के नाश के क्षण में उपान्त्य विद्यमान नहीं है अतएव
वह अन्त्य के नाश का कारण नहीं हो सकता है ] तीन क्षण रहने वाले अन्त्य का
केवल द्वितीय क्षण में साथ रहने वाले [ अर्थात् ] तृतीय [ अन्त्य के विनाश ]
क्षण में अविद्यमान उपान्त्य से नाश सम्भव नहीं हो सकता है। इसलिए
[ उपान्त्य से नहीं अपितु ] उपान्त्य के नाश से अन्त्य का नाश होता है ।
१ वैशेषिक दर्शन २, २, ३१ ।
शब्दस्यानित्यत्वम् ] प्रमेयनिरूपणम् २०६
विनाशित्वञ्च शब्दस्यानुमानात् । तथाहि, अनित्यः शब्दः
सामान्यवत्त्वे सत्यस्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यत्वाद् घटवदिति । शब्दस्या-
नित्यत्वं साध्यम् । अनित्यत्वञ्च विनाशावच्छिन्नस्वरूपत्वं, न तु विना-
शावच्छिन्नसत्तायोगित्वं, प्रागभावे सत्ताहीनेऽनित्यत्वाभावप्रसङ्गात् ।
सामान्यवत्त्वे सत्यस्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यत्वं हेतुः । इन्द्रियग्राह्यत्वा-
दित्युरुच्यमाने आत्मनि व्यभिचारः स्यादत उक्तं बाह्येति । एवमपि
तेनैव योगिबाह्येन्द्रियेण ग्राह्ये परमाण्वादौ व्यभिचारः स्यादतो योगि-
निरासार्थमुक्तमस्मदादीति ।
किं पुनर्योंगिसद्भावे प्रमाणम् ?
[ मीमांसक शब्द को नित्य मानते हैं । उनके खण्डन के लिए शब्द का
विनाशित्व सिद्ध करते हैं ] शब्द का विनाशित्व अनुमान से [ सिद्ध होता ] है ।
जैसे कि शब्द अनित्य है [ यह प्रतिज्ञा है ] सामान्यवान् होते हुए अस्मदादि की
बाह्येन्द्रियों से ग्राह्य होने से, घट के समान । [ जैसे घट, घटत्व सामान्य रहने के
कारण 'सामान्यवान्' है और अस्मदादि की बाह्येन्द्रिय से ग्राह्य है तथा अनित्य
है । इसी प्रकार शब्द भी सामान्यवान् तथा अस्मदादि की बाह्य इन्द्रिय श्रोत्र से
गृहीत होने के कारण अनित्य होना चाहिए] शब्द का अनित्यत्व साध्य है । और
अनित्यत्व [ का लक्षण ] विनाशावच्छिन्न स्वरूपत्व है । न कि विनाशावच्छिन्न-
सत्तायोगित्व । [ क्योंकि अनित्य प्रागभाव में सत्ता जाति नहीं रहती परन्तु वह
अनित्य होता है । इसलिए यदि 'विनाशावच्छिन्न सत्तायोगित्व' को ही विनाशित्व
का लक्षण कहेंगे तो ] सत्तारहित 'प्रागभाव' में अनित्यत्व का अभाव प्राप्त होने
से । [ और 'विनाशावच्छिन्न स्वरूपत्व' को विनाशित्व-अनित्यत्व-मानने से
प्रागभाव में भी अनित्यत्व बन जाता है । ] सामान्यवान् होकर अस्मदादि की
बाह्येन्द्रिय से ग्राह्यत्व [ होने से ] यह हेतु [ शब्द के अनित्यत्व की सिद्धि में
दिया गया ] है । [ इसका पदकृत्य दिखाते हैं ] केवल 'इन्द्रियग्राह्यत्वात्' कहने
से आत्मा [ के मन रूप अन्तरिन्द्रिय से ग्राह्य होने से उसमें अनित्यत्व होना
चाहिए परन्तु आत्मा नित्य है अतः उस ] में व्यभिचार होने लगेगा, इसलिए
बाह्य [ पद ] कहा है ।
इस प्रकार [ बाह्येन्द्रियग्राह्यत्वात् को विनाशित्व का साधक हेतु मानने पर ]
भी उसी योगी की बाह्य इन्द्रिय [ चक्षुः ] से ग्राह्य परमाणु आदि में [ बाह्ये-
न्द्रियग्राह्यत्व होने पर भी विनाशित्व न होने से ] व्यभिचार होगा । इसलिए
योगी [ की बाह्येन्द्रिय ] के निराकरण के लिए अस्मदादि [ की बाह्य इन्द्रिय से
ग्राह्य ] यह कहा है ।
[ प्रश्न ] योगी की सत्ता में क्या प्रमाण है ?
१४ त० भा०
२१० तर्कभाषा [ परमाणुसिद्धिः
उच्यते । परमाणवः कस्यचित् प्रत्यक्षाः प्रमेयत्वाद् घटवदिति ।
तथापि सामान्यादिना व्यभिचारोऽत उक्तं सामान्यवत्त्वे सतीति ।
सामान्यादित्रयस्य निःसामान्यत्वात् ।
१६-अर्थप्रकाशो बुद्धिः । नित्याऽनित्या च । ऐशी बुद्धिर्नित्या, अन्य-
दीया त्वनित्या ।
[ उत्तर ] कहते हैं । परमाणु किसी से प्रत्यक्ष होने चाहिए । प्रमेय होने से
घट के समान । [ यह अनुमान ही योगी की सत्ता में प्रमाण है ] । इस प्रकार
[ अस्मदादि बाह्येन्द्रियग्राह्यत्व को विनाशित्व का साधक हेतु मानने पर ] भी
सामान्य आदि [ के अस्मदादि बाह्येन्द्रिय ग्राह्य होने पर भी नित्य होने ] में
व्यभिचार होगा । इसलिए 'सामान्यवत्त्वे सति' यह [ विशेषण ] कहा है ।
सामान्य, आदि तीन [ सामान्य, विशेष, तथा समवाय ] के सामान्य [ जाति ]
से रहित होने से । [ सामान्य में 'सामान्यवत्त्व' अंश न होने से अस्मदादि
बाह्येन्द्रियग्राह्यत्व होते हुए अनित्यत्व या विनाशित्व प्राप्त नहीं होगा अतः
व्यभिचार नहीं होगा ] ।
१६ अर्थ का प्रकाश [ ज्ञान ] 'बुद्धि' है । [ वह दो प्रकार की होती है ]
नित्य और अनित्य । ईश्वर की बुद्धि [ ज्ञान ] नित्य और अन्य [ मनुष्यादि ]
की अनित्य है ।
जैसा कि पहले कहा जा चुका है वैशेषिक दर्शन की प्रक्रिया में न्याय
दर्शन के प्रमाणादि पदार्थों का अन्तर्भाव इस 'बुद्धि' पदार्थ के अन्तर्गत किया
जाता है । वैशेषिक दर्शन के 'प्रशस्तपाद भाष्य' में बुद्धि के प्रथम दो प्रकार
के भेद किए गए हैं एक विद्या और दूसरा अविद्या । उसमें भी अविद्या के चार
भेद किए हैं। १ संशय २ विपर्यय, ३ अनध्यवसाय और ४ स्वप्न । इनमें
'संशय' और 'अनध्यवसाय' दोनों को अलग माना है। जिनमें 'स्थाणुर्वा पुरुषो
वा' इस प्रकार के उभयकोटिक ज्ञान को संशय और 'व्यासङ्गादनर्थित्वाद्व्वा
किमित्यालोचनमात्रम् अनध्यवसायः' । यह 'अनध्यवसाय' का लक्षण किया है ।
बुद्धि के भेद करते हुए 'प्रशस्तपाद भाष्य' में लिखा है—
तस्याः अनेकविधत्वेऽपि समासतो द्वे विधे । विद्या चाविद्या चेति । तत्रा-
विद्या चतुर्विधा, संशय-विपर्यय-अनध्यवसाय-स्वप्नलक्षणा ।
स्वप्न के कारण तथा भेदों का वर्णन करते हुए लिखा है—
तत्तु त्रिविधम् — १ संस्कारपाटवात्, २ धातुदोषात्, ३ अदृष्टाच्च ।
अर्थात् स्वप्न, कारण के भेद से तीन प्रकार के होते हैं । एक संस्कारों की
सुखादिगुणाः ] प्रमेयनिरूपणम् २११
१७-प्रीतिः सुखम् । तच्च सर्वात्मनामनुकूलवेदनीयम् ।
१८-पीडा दुःखम् । तच्च सर्वात्मनां प्रतिकूलवेदनीयम् ।
१६-राग इच्छा ।
२०-क्रोधो द्वेषः ।
२१-उत्साहः प्रयत्नः ।
बुद्धयादयः षड् मानसप्रत्यक्षाः ।
२२-२३-धर्माधर्मौ सुखदुःखयोरसाधारणकारणे । तौ चाप्रत्यक्षाव-
प्रबलता के कारण, दूसरे धातु-दोष के कारण और तीसरे अदृष्टवश ।
साधारणतः मनुष्य जिस बात का ध्यान अधिक करता है अथवा जिसको
देखने से मन पर, प्रबल संस्कार पड़ता है उसी वस्तु को स्वप्न में देखता है ।
इस प्रकार के स्वप्न 'संस्कार-पाटव' के कारण होते हैं । 'धातु' शब्द से
आयुर्वेद शास्त्र में 'वात', 'पित्त', 'कफ' लिया जाता है । वातप्रकृति अथवा
वातदूषित व्यक्ति को प्रायः आकाश में उड़ने के स्वप्न दिखाई देते हैं ।
पित्त-प्रकृति या पित्त-दूषित व्यक्ति अग्नि के स्वप्न, और कफ-दूषित व्यक्ति
जल के स्वप्न देखता है । यह सब 'धातुदोषात्' वाले स्वप्नों के उदाहरण हैं ।
और अदृष्टवशात् कभी कभी मनुष्य ऐसे पदार्थों को भी स्वप्न में देखता है
जिनको उसने अपने जीवन में कभी नहीं देखा है । इसी बात को महाकवि
श्रीहर्ष ने अपने 'नैषधीयचरितम्' नामक महाकाव्य में इस प्रकार कहा है—
अदृष्टमप्यर्थमदृष्टवैभवात्, करोति सुप्तिर्जनदर्शनातिथिम् ।
१७ प्रीति [ आनन्द ] को 'सुख' कहते हैं । वह सब आत्माओं को अनुकूल
अनुभव होने वाला होता है ।
१८ पीड़ा को 'दुःख' कहते हैं । वह सब आत्माओं को प्रतिकूल अनुभव
होता है ।
१९ राग का नाम 'इच्छा' है ।
२० क्रोध का नाम 'द्वेष' है ।
२१ उत्साह को 'प्रयत्न' कहते हैं ।
बुद्धि आदि ६ [ १ बुद्धि, २ सुख, ३ दुःख, ४ इच्छा, ५ द्वेष, ६ प्रयत्न ]
मानस प्रत्यक्ष [ के विषय ] हैं ।
२२-२३ 'धर्म' और 'अधर्म' [आत्मा के] सुख और दुःखके असाधारण कारण
हैं । वह दोनों प्रत्यक्ष न होनेपर भी आगम तथा अनुमान से जाने जा सकते हैं ।
१ नैषध १ ।
२१२ तर्कभाषा [संस्कारगुणः
प्यागमगम्यावनुमानगम्यौ च। तथाहि देवदत्तस्य शरीरादिकं देवदत्त-
विशेषगुणजन्यं कार्यत्वे सति देवदत्तस्य भोगहेतुत्वात्। देवदत्तप्रयत्नजन्य-
वस्तुवत् । यश्च शरीरादिजनक आत्मविशेषगुणः स एव धर्मोऽधर्मश्च ।
प्रयत्नादीनां शरीराद्यजनकत्वादिति ।
२४-संस्कारव्यवहाराऽसाधारणं कारणं संस्कारः ।
संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्च । तत्र वेगः पृथिव्या-
दिचतुष्टयमनोवृत्तिः । स च क्रियाहेतुः । भावनाख्यस्तु संस्कार आत्म-
मात्रवृत्तिरनुभवजन्यः स्मृतिहेतुः । स चोद्बुद्ध एव स्मृतिं जनयति ।
उद्बोधश्च सहकारिलाभः । सहकारिणश्च संस्कारस्य सदृशदर्शनादयः ।
तथा चोक्तम्—
'सादृश्यादृष्टचिन्ताद्याः स्मृतिबीजस्य बोधकाः ।'
इति । स्थितिस्थापकस्तु स्पर्शवद्द्रव्यविशेषवृत्तिः । अन्यथाभूतस्य
स्वाश्रयस्य धनुरादेः पुनस्तादवस्थ्यापादकः। एते च बुद्धयादयोऽधर्मान्ता
भावना च आत्मविशेषगुणाः ।
जैसे कि [अनुमान-प्रयोग निम्न प्रकार का हो सकता है] देवदत्त के शरीर आदिक
देवदत्त के विशेष गुण [धर्माधर्म] से जन्य हैं [यह प्रतिज्ञा है] कार्य होकर
देवदत्त के भोग के हेतु होने से, देवदत्त के प्रयत्नजन्य [घट-पटादि] वस्तु के
समान । और जो शरीर आदि का जनक आत्मा का विशेषगुण है वही 'धर्म'
और 'अधर्म' है । [उनसे भिन्न] प्रयत्नादि [गुणों] के शरीर के जनक न होने से ।
२४ संस्कार, इस प्रकार के व्यवहार का असाधारण कारण 'संस्कार'
[नामक गुण] है ।
संस्कार तीन प्रकार का होता है । १ वेग, २ भावना, और ३ स्थिति-
स्थापक । उनमें से 'वेग' पृथिवी आदि चार और मन में रहने वाला है और
वह क्रिया का हेतु होता है । 'भावना' नामक संस्कार केवल आत्मा में रहने
वाला अनुभव से जन्य और स्मृति का हेतु होता है । वह उद्बुद्ध होकर ही
स्मृति को उत्पन्न करता है । [संस्कार का] उद्बोध [उसको] सहकारी का प्राप्त
होना है। और संस्कार के सहकारी सदृशदर्शन आदि हैं। जैसा कि कहा है—
सादृश्य, अदृष्ट और चिन्ता आदि स्मृति के बीज [भूत संस्कार] के उद्बोधक हैं।
स्थितिस्थापक [संस्कार] तो स्पर्शयुक्त द्रव्य विशेषों में रहने वाला,
और [खींचने से झुक जाने के कारण] अन्यथा भूत अपने आश्रय [भूत]
धनुष आदि को फिर पूर्व अवस्था में लाने वाला होता है।
यह बुद्धि से लेकर अधर्म पर्यन्त [बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, धर्म,
कर्माणि ] प्रमेयनिरूपणम् २१३
गुणा उक्ताः !
कर्माणि
कर्माणि उच्यन्ते । चलनात्मकं कर्म, गुण इव द्रव्यमात्रवृत्ति । अवि-
भुद्रव्यपरिमाणेन मूर्तत्वापरनाम्ना सहैकार्थसमवेतं विभागद्वारा पूर्व-
संयोगनाशे सत्युत्तरदेशसंयोगहेतुश्च । तच्च उत्क्षेपण-अपक्षेपण-आकुञ्चन-
प्रसारण-गमनभेदात् पञ्चविधम् । भ्रमणादयस्तु गमनग्रहणेनैव गृह्यन्ते ।
सामान्यम्
अनुवृत्तिप्रत्ययहेतुः सामान्यम् । द्रव्यादित्रयवृत्ति, नित्यमेकमने-
कानुगतञ्च । तच्च द्विविधं, परमपरञ्च । परं सत्ता बहुविषयत्वात् ।
सा चानुवृत्तिप्रत्ययमात्रहेतुत्वात् सामान्यमात्रम् । अपरं द्रव्यत्वादि ।
अधर्म, यह सात ] तथा भावना [ नामक संस्कार ] आत्मा के 'विशेष गुण' हैं ।
गुणों का वर्णन समाप्त हो गया ।
कर्म
[ अब ] कर्मों का वर्णन करते हैं । गति रूप 'कर्म' [ होता ] है । गुण के
समान केवल द्रव्य में रहता है । और 'अविभु' द्रव्य के परिमाण जिसे 'मूर्तत्व'
नाम से भी कहते हैं, के साथ एक [ ही ] अर्थ में समवाय सम्बन्ध से रहता है ।
और विभाग द्वारा पूर्व संयोग के नाश द्वारा उत्तर देश में संयोग का हेतु होता
है । वह १ उत्क्षेपण [ ऊर्ध्व गति ], २ अपक्षेपण [ अधोगमन ], ३ आकुञ्चन
[ हाथ आदि का सिकोड़ना ], ४ प्रसारण [ फैलाना ], और [ साधारण ] गमन
भेद से पांच प्रकार का [ होता ] है । भ्रमण आदि [ रेचन, स्पन्दन आदि ] का
ग्रहण गमन के ग्रहण में ही हो जाता है ।
सामान्य
'सामान्य' अनुवृत्ति प्रत्यय [अर्थात् अनुगत प्रतीति, एकाकार प्रतीति दस घट
व्यक्तियों में होने वाली अयं घटः, अयं घटः इत्याकारक समान प्रतीति] का कारण
सामान्य [ जाति ] है । वह द्रव्यादि तीन [ १ द्रव्य, २ गुण, ३ कर्म ] में रहने
वाला नित्य, एक, और अनेक वृत्ति होता है । नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम्
सामान्यम्-यह भी सामान्य का दूसरा लक्षण है ] । वह [ सामान्य ] दो प्रकार
का होता है 'पर' और 'अपर' । [ उनमें से ] अधिक विषय वाला [ व्यापक ]
होने से 'सत्ता' [ द्रव्य, गुण तथा कर्म तीनों में रहने वाली सत्ता जाति ] 'पर'
[ सामान्य ] है । और वह अनुगत प्रतीति का ही हेतु होने से 'सामान्य' ही है
[ विशेष कभी नहीं होता है । उससे अधिक देश में रहने वाला और कोई
२१४ तर्कभाषा [ सामान्यम्
अल्पविषयत्वात्। तच्च व्यावृत्तेरपि हेतुत्वात् सामान्यं सद् विशेषः।
सामान्य नहीं है। ] द्रव्यत्वादि [ अन्य सामान्य उसकी अपेक्षा अल्प देश-वृत्ति
होने से ] 'अपर' [ सामान्य ] हैं। और वह व्यावृत्ति [ भेदबुद्धि ] का भी हेतु
होने से सामान्य होते हुए [ भी ] विशेष [ होते ] हैं।
इसको स्पष्ट रूप से यों समझना चाहिए कि दस घट व्यक्तियों में 'घटः,
घटः' इस प्रकार की अनुगत प्रतीति या एकाकार प्रतीति होती है। उससे
घट में रहने वाला 'घटत्व' सामान्य सिद्ध होता है। परन्तु वह घट एक पार्थिव
पदार्थ है इसलिए उसमें 'पृथिवीत्व' सामान्य भी रहता है। 'घटत्व' सामान्य
केवल घटों में रहता है परन्तु 'पृथिवीत्व' सामान्य घट के अतिरिक्त पट, मठ,
आदि अन्य पार्थिव पदार्थों में भी रहता है। इसलिए 'पृथिवीत्व' सामान्य
'घटत्व' की अपेक्षा अधिक देशवृत्ति होने से 'पर' सामान्य माना जायगा।
पृथिवी की गणना नौ द्रव्यों में की गई है अतः पृथिवी भी एक द्रव्य है। और
अन्य द्रव्यों की भांति पृथिवी में भी 'द्रव्यत्व' सामान्य रहता है। पृथिवी में
'पृथिवीत्व' सामान्य है और 'द्रव्यत्व' सामान्य भी रहता है। इनमें से 'पृथि-
वीत्व' सामान्य तो केवल पृथिवी में रहता है परन्तु 'द्रव्यत्व' सामान्य पृथिवी
के अतिरिक्त जल, वायु, अग्नि, आदि अन्य आठ द्रव्यों में भी रहता है इसलिए
वह 'पृथिवीत्व' सामान्य की अपेक्षा अधिक देशवृत्ति होने से, 'पर सामान्य'
है। और 'पृथिवीत्व' सामान्य 'द्रव्यत्व' सामान्य की अपेक्षा 'अपर
सामान्य' है।
पृथिवी आदि द्रव्यों में द्रव्यत्व सामान्य के अतिरिक्त 'सत्ता' सामान्य भी
रहता है। क्योंकि पृथिवी आदि सभी द्रव्य 'सत्' है। अतः उनमें 'सत्ता'
सामान्य भी माना जाता है। इस प्रकार द्रव्यों में 'द्रव्यत्व' सामान्य, तथा
'सत्ता' सामान्य दो सामान्य रहते हैं। इनमें से 'द्रव्यत्व' सामान्य तो केवल
नौ द्रव्यों में रहता है परन्तु 'सत्ता' सामान्य नौ द्रव्यों के अतिरिक्त गुण और
कर्म में भी रहता है इसलिए 'सत्ता' सामान्य 'द्रव्यत्व' सामान्य की अपेक्षा 'पर
सामान्य' है और 'द्रव्यत्व' सामान्य, 'सत्ता' सामान्य की अपेक्षा 'अपर
सामान्य' है।
इस प्रकार घटमें १ 'घटत्व सामान्य' २ 'पृथिवीत्व सामान्य' ३ 'द्रव्यत्वसामान्य'
और ४ 'सत्ता सामान्य' यह चार सामान्य रहते हैं। इनमें से 'घटत्व सामान्य' सबसे
'अपर सामान्य' और सत्ता सामान्य सबसे 'पर सामान्य' है। बीच के 'पृथिवीत्व'
और 'द्रव्यत्व' सामान्य में आपेक्षिक 'परत्व' या 'अपरत्व' रहता है। 'पृथिवीत्व'
जातिबाधकाः ] प्रमेयनिरूपणम् २१५
सामान्य 'घटत्व' सामान्य की अपेक्षा 'पर' सामान्य है परन्तु 'द्रव्यत्व' की
अपेक्षा 'अपर' सामान्य है। इसी प्रकार 'द्रव्यत्व' सामान्य 'पृथिवीत्व'
सामान्य की अपेक्षा 'पर' सामान्य है और 'सत्ता' सामान्य की अपेक्षा अल्पदेश-
वृत्ति होने से 'अपर' सामान्य है। परन्तु 'सत्ता' सामान्य किसी की अपेक्षा
'अपर' नहीं है। इसलिए सत्ताको 'पर सामान्य' कहा है। सामान्य का कार्य
अनुवृत्ति-प्रत्यय अर्थात् एकाकार-प्रतीति को उत्पन्न करना है। सत्ता सदैव एकाकार
प्रतीति का कारण ही होती है। इसलिए वह सदा 'सामान्य' ही कहलाती है।
'घटत्व' आदि 'अपर सामान्य' अनुवृत्ति-प्रत्यय के भी कारण होते हैं और
भेद-बुद्धि को भी उत्पन्न करते हैं। जैसे 'घटत्व सामान्य' जहां दस घट व्यक्तियों
में 'अयं घटः, अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार बुद्धि को पैदा करता है इस
लिए सामान्य कहलाता है। वहां घट को पट से भिन्न करने वाला भी 'घटत्व'
और 'पटत्व' ही है। घट पट से भिन्न इसलिए है कि घट में 'घटत्व' रहता है
पट में नहीं। इस प्रकार घटत्व एकाकार-प्रतीति का भी कारण होता है और
भेद-बुद्धि का भी कारण होता है। इसलिए जब वह 'अनुवृत्ति-प्रत्यय' अर्थात्
एकाकार बुद्धि को उत्पन्न करता है तब वह सामान्य कहलाता है। और जब
वह भेद-बुद्धि को उत्पन्न करता है तब 'विशेष' कहलाता है। 'सत्ता सामान्य'
को छोड़कर शेष सब सामान्य दोनों काम करते हैं इसलिए वह 'सामान्यं सद्
विशेषाख्यामपि लभते' 'सामान्य' होते हुए 'विशेष' भी कहलाते हैं। परन्तु
'सत्ता सामान्य' को केवल 'अनुवृत्ति-प्रत्यय' का ही हेतु होता है इसलिए 'सा
त्वनुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव'। वह तो केवल अनुवृत्ति-प्रत्यय का हेतु
होने से 'सामान्य' ही है, 'विशेष' नहीं।
'सत्ता सामान्य' को अत्यन्त 'पर' सामान्य कहा है क्योंकि वह अन्य सब
की अपेक्षा अधिकदेश-वृत्ति है। वह द्रव्य, गुण और कर्म इन तीन पदार्थों में
रहती है। यहां शङ्का हो सकती है कि जैसे द्रव्य, गुण और कर्म सत् हैं वैसे
ही 'सामान्य', 'विशेष', 'समवाय' यह तीनों और पदार्थ भी सत् अर्थात् भाव
भूत हैं, इसलिए 'सत्ता-सामान्य' इन तीनों में भी मानना चाहिए। अर्थात्
छहों भाव पदार्थों में 'सत्ता-सामान्य' मानना चाहिए उसे केवल द्रव्यत्रयवृत्ति
ही क्यों कहा है। इसका उत्तर यह है कि द्रव्य, गुण, कर्म यह तीन तो 'सत्ता
सामान्य' के सम्बन्ध होनेके कारण सत् है परन्तु शेष तीन पदार्थ 'स्वरूप सत्'
हैं 'सत्ता सामान्य' के योग से सत् नहीं हैं। उनमें 'सत्ता' जाति नहीं रहती है।
कारण कि यदि सत्ता जातिमें जाति मानें तो जाति में जाति मानने का सिद्धान्त
२१६ तर्कभाषा [ जातिबाधकाः
बन जायगा और उस दशा में 'अनवस्था' दोष होगा। जाति में जाति
मानने से जैसे 'घटत्व' जाति में 'घटत्वत्व' सामान्य माना जाने लगेगा। इसी
प्रकार दस घटत्वत्वों में रहने वाला एक और सामान्य घटत्व-त्व-त्व बन जायगा।
और यह परम्परा अनन्त काल तक चलती रहेगी। उसकी कहीं समाप्ति नहीं
होगी। इसलिए 'अनवस्था' दोष होने से जाति में जाति रहने का सिद्धान्त
नहीं माना जा सकता है। अतएव सामान्य पदार्थ, जो जाति स्वरूप है दूसरी
जाति या 'सत्ता सामान्य' को नहीं माना जा सकता है। इसलिए 'अनवस्था-
भयात्' सामान्य' में 'सत्ता' जाति नहीं रहती है यह सिद्ध हुआ ।
इसी प्रकार 'विशेष' में भी 'सामान्य' नहीं माना जा सकता है। 'विशेष'
में यदि 'सामान्य' माना जाय तो उस विशेष का स्वरूप ही नष्ट हो जायगा।
विशेष को अन्तिम भेदक धर्म के रूप में माना गया है और उसका स्वरूप
ही 'स्वतः व्यावृत्त' है। 'नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषाः'। नित्य द्रव्य परमाणु
आदि में रहने वाले अन्तिम भेदक धर्म को 'विशेष' कहते हैं। और प्रत्येक
परमाणु आदि में रहने वाला 'विशेष' बिल्कुल अलग अलग 'स्वतः व्यावृत्त'
होता है। अब यदि उन अलग अलग विशेषों में 'विशेषत्व' नाम का सामान्य
धर्म या जाति मान ली जाय तो फिर 'विशेष' का जो 'स्वतः व्यावृत्त' स्वरूप है
वही नष्ट हो जायगा। अतएव 'स्वरूपहानि-भयात्' 'विशेष' में 'सामान्य' नहीं
माना जाता है। इसलिए 'विशेष' पदार्थ में भी 'सत्ता' जाति नहीं रहती है।
इसी प्रकार 'समवाय' में भी 'सामान्य' नहीं रहता है। समवाय में 'सामान्य'
के अभाव मानने का कारण 'असम्बन्ध' है । अर्थात् यदि समवाय में 'समवा-
यत्व' जाति मानें तो जाति 'समवाय' सम्बन्धसे ही व्यक्ति में रहती है इसलिए
समवाय में भी 'समवाय' सम्बन्ध से ही जाति रहेगी। अतएव 'समवाय'
पदार्थ में उससे भिन्न 'समवायत्व' जाति की स्थिति का निर्वाह करने वाला
एक और 'समवाय' मानना होगा। जो कि सम्भव नहीं है। इसलिए समवाय
में समवायत्व जाति का नियामक कोई सम्बन्ध न बनने से 'समवाय' में जाति
नहीं रहती है । अतएव 'समबाय' में 'सत्ता' जाति नहीं रहती है । इस प्रकार
१ 'सामान्य' में जाति मानने में 'अनवस्था', २ 'विशेष' में जाति मानने में
'रूप-हानि', और ३ 'समवाय' में जाति मानने में 'असम्बन्ध' दोषों के बाधक
होने से इन तीनों पदार्थों में 'सत्ता' अथवा अन्य कोई भी जाति नहीं रहती ।
अतः यह तीनों 'सत्ता' जाति के सम्बन्ध से 'सत्' नहीं कहलाते अपितु 'स्वरूप
सामान्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् २१७
सत्' हैं। जातिबाधक इन हेतुओं का संग्रह एक कारिका में इस प्रकार किया गया है-
व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सङ्करोऽथाऽनवस्थितिः ।
रूपहानिरसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥
बौद्ध लोग 'सामान्य' या 'जाति' पदार्थ को नहीं मानते हैं। नैयायिकों का
'सामान्य' नित्य और अनेक समवेत धर्म है। 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतं
सामान्यम्' यह भी उसका लक्षण किया गया है। इसके अनुसार सामान्य
नित्य ही होता है। परन्तु बौद्ध लोग तो क्षणभङ्गवादी हैं। उनके यहां 'सर्वं
क्षणिकम्', सब कुछ क्षणिक है यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसलिए वह 'जाति'
जैसे नित्य पदार्थ को मान ही नहीं सकते हैं। 'जाति' का खण्डन कर देने
पर 'जाति' का कार्य 'अनुवृत्ति-प्रत्यय' अथवा एकाकार प्रतीति है वह कैसे
होगी ? इस प्रश्न का उत्तर बौद्ध लोग 'अपोह' के द्वारा देते हैं। अर्थात्
'अनुवृत्ति-प्रत्यय' का कारण वह जाति के स्थान पर 'अपोह' को मानते हैं।
'अपोह' का अर्थ है 'अतद्व्यावृत्ति' या 'तद्भिन्न-भिन्नत्व' । दस घट व्यक्तियों
में जो घटः, घटः इस प्रकार की अनुगत प्रतीति होती है उसका कारण उनमें
रहने वाला 'घटत्व सामान्य' नहीं अपितु उनका 'अघटव्यावृत्त' या घटभिन्न
सारे जगत् में भिन्न होना ही है। अतत् अर्थात् अघट, अर्थात् घट से भिन्न
सारा जगत् हुआ, उस जगत् से भिन्न घट हुआ। यह 'तद्भिन्न-भिन्नत्व' या
'अतद्व्यावृत्ति' ही घटों में अनुगत प्रतीति का कारण है। इसी को बौद्ध
दार्शनिक 'अपोह' कहते हैं।
यहां यह प्रश्न हो सकता है कि नैयायिक एकाकार प्रतीति का कारण
'घटत्व सामान्य' को मानते हैं और बौद्ध सामान्य को न मान कर उसके स्थान
पर 'अपोह' को एकाकार प्रतीति का आधार मानते हैं। इन दोनों में नाम
के अन्तर के अतिरिक्त और तात्त्विक अन्तर क्या है ? इसका उत्तर यह है
कि नैयायिकों का 'सामान्य' अन्य पदार्थों से भिन्न एक भावभूत नित्य पदार्थ
है। और बौद्धों का 'अपोह' 'अन्योन्याभाव' रूप है। न्याय, वैशेषिक जिसको
'अन्योन्याभाव' कहते हैं उसी को बौद्ध दार्शनिक 'अपोह' या 'अतद्व्यावृत्ति'
अथवा 'तद्भिन्नभिन्नत्व' आदि शब्दों से कहते हैं। उनका अभिप्राय यह है
कि नैयायिक 'अन्योऽन्याभाव' को मानते ही हैं उसी 'अन्योन्याभाव' रूप
'अपोह' से जब एकाकार प्रतीति का उपपादन हो सकता है तब 'सामान्य' नाम
के एक अन्य अयौक्तिक पदार्थ को क्यों माना जाय। अतः उसका मानना व्यर्थ है।
१ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली
२१८ तर्कभाषा [ सामान्यम्
अत्र कश्चिदाह 'व्यक्तिव्यतिरिक्तं सामान्यं नास्ति' इति । तत्र वयं
ब्रूमः किमालम्बना तर्हि भिन्नेषु विलक्षणेषु पिण्डेष्वेकाकारा बुद्धिर्विना
सर्वानुगतमेकम् । यच्च तदालम्बनं तदेव सामान्यमिति ।
ननु तस्याऽतद्व्यावृत्तिकृतैवैकाकारा बुद्धिरस्तु । तथाहि, सर्वेष्वेव
हि गोपिण्डेषु, अगोभ्योऽश्वादिभ्यो व्यावृत्तिरस्ति । तेनागोव्यावृत्ति-
विषय एवायमेकाकारः प्रत्ययोऽनेकेषु, न तु विधिरूपगोत्वसामान्यविषयः ।
मैवम् । विधिमुखेनैवैकाकारस्फुरणात् ।
इसके विपरीत नैयायिकों का कहना है कि घटः आदि प्रतीति में 'अपोह'
को कारण मानना अनुभव विरुद्ध क्लिष्ट कल्पना है। जब हम दस घड़ों को
देखते हैं तब उन सब में एक अनुगतधर्म की हमको प्रतीति होती है। उन
सब घटों में रहने वाले समान धर्म या 'सामान्य' के आधार पर ही उनमें
एकाकार प्रतीति होती है। 'अतद्व्यावृत्ति' या 'तद्भिन्नभिन्नत्व' का बोध,
'घटः' आदि एकाकार प्रतीति के काल में नहीं होता है। अतः अनुभव विरुद्ध
होने से 'अपोह' को कारण मानना उचित नहीं है इसलिए सामान्य को मानना
ही चाहिए। इसी बात को ग्रंथकार आगे कहते हैं—
यहाँ [ सामान्य के विषय में ] कोई [ बौद्ध ] कहता है कि [ घटादि ]
व्यक्ति से अतिरिक्त [ उसमें रहने वाला 'घटत्व' आदि ] 'सामान्य' नहीं है।
इस [ पूर्वपक्ष के विषय ] में हम [ यह ] कहते हैं कि [ यदि सामान्य नहीं
है तो ] भिन्न भिन्न विलक्षण [ घट आदि ] पिण्डों में [ होने वाली ] एकाकार
प्रतीति का उन सब में रहने वाले एक [ घटत्वादि सामान्य ] के सिवाय और
क्या आधार है। जो उस [ एकाकार प्रतीति ] का आधार [ आलम्बन या विषय ]
है, वही 'सामान्य' है।
[ इस पर पूर्वपक्षी बौद्ध कहता है ] अच्छा [ वह ] एकाकार प्रतीति 'अतद्-
व्यावृत्ति' कृत ही मान ली जाय । जैसे कि सब ही गोपिण्डों में ['अगो' अर्थात्]
गोभिन्न अश्वादि से व्यावृत्ति [भिन्नता] होती है। इसलिए अ-गोव्यावृत्ति [गोभिन्न-
भिन्नत्व] विषयक ही अनेक [ गोपिण्डादि ] में होने वाला यह एकाकार ज्ञान है
भावभूत [ गोत्वादि ] सामान्यविषयक नहीं।
[ इसका उत्तर नैयायिक देता है ] यह ठीक नहीं है। एकाकार प्रतीति के
विधिमुख [ भाव रूप ] से ही होने से। [अर्थात् एकाकार प्रतीति में अतद्व्यावृत्ति
स्पष्ट अनुभव में नहीं आती है अपितु अनुगत भावभूत 'सामान्य' ही उस प्रतीति
का विषय होता है ] ।
विशेषः ] प्रमेयनिरूपणम् २१६
विशेषः
विशेषो नित्यो नित्यद्रव्यवृत्तिः । व्यावृत्तिबुद्धिमात्रहेतुः । नित्य-
द्रव्याणि त्वाकाशादीनि पञ्च । पृथिव्यादयश्चत्वारः परमाणुरूपाः ।
विशेष
नित्यद्रव्य [ परमाणु आदि ] में रहने वाला और नित्य [ अन्तिम भेदक धर्म ]
विशेष है । [ वह ] केवल व्यावृत्ति [ भेद ] बुद्धि का हेतु होता है । नित्यद्रव्य
[ से ] आकाश आदि पांच हैं । [ जिनमें से ] पृथिवी आदि चार [ १ पृथिवी,
२ जल, ३ वायु, ४ अग्नि केवल ] परमाणु रूप [ ही नित्य है । कार्य रूप पृथिवी
आदि नित्य है । इनमें रहने वाला अन्तिम भेदक धर्म 'विशेष' कहलाता ] है ।
'विशेष' पदार्थ वैशेषिक दर्शन का सबसे मुख्य पदार्थ है । इसी के आधार
पर कदाचित् इस दर्शन का 'वैशेषिक' नाम पड़ा है । घटादि पदार्थों का
सजातीय पदार्थान्तर से जो भेद होता है उसका उपपादन साधारणतः अवयव
भेद के आधार पर किया जाता है । एक घट दूसरे से क्यों भिन्न है । इसका
उत्तर यह है कि दोनों घट भिन्न अवयवों अर्थात् कपालों से बने हैं । वह
कपाल परस्पर क्यों भिन्न हैं इसका भी उत्तर वही है कि उनके अवयव अर्थात्
कपालिकाएं भिन्न हैं । फिर कपालिकाओं के भेद के विषय में भी अवयव
भेद को ही कारण कहा जा सकता है । इस प्रकार चलते चलते परमाणुओं
पर पहुँचते हैं । वहां भी यह प्रश्न होता है कि एक पार्थिव परमाणु दूसरे
पार्थिव परमाणु से क्यों भिन्न है । इसका उत्तर अवयव-भेद से नहीं दिया जा
सकता है । क्योंकि परमाणु के अवयव नहीं होते हैं । इसलिए परमाणुओं
के भेद का उपपादन करने के लिए उनमें 'विशेष' पदार्थ की कल्पना की गई
है । इस 'विशेष' के रहने के कारण एक पार्थिव परमाणु, दूसरे पार्थिव परमाणु
से भिन्न है ।
अब प्रश्न यह हो सकता है कि यह 'विशेष' क्यों भिन्न हैं ? इसका उत्तर
यह है कि 'विशेष' का स्वरूप ही 'स्वतो-व्यावृत्त' है । उसका भेदक अन्य
कोई धर्म नहीं है । यह 'विशेष' ही नित्य द्रव्यों में रहने वाला अन्तिम भेदक
धर्म है । यह 'विशेष' जिन नित्य द्रव्यों में रह सकता है वह नित्यद्रव्य पृथिवी
आदि चार के परमाणु और आकाश कुल पांच है । शेष चार द्रव्यों में से
काल और दिक् अभिन्न व एक हैं, अतः उनमें 'विशेष' के मानने की
आवश्यकता नहीं है । आत्मा और मन के भेदक धर्म उनके अपने गुण अदृष्ट,
धर्म, अधर्म, संस्कार आदि ही हो जाते हैं इसलिए उनमें भी 'विशेष' के
२२० तर्कभाषा [ समवायः
समवायः
अयुतसिद्धयोः सम्बन्धः समवायः । स चोक्त एव ।
नन्ववयवावयविनावप्ययुतसिद्धौ तेन तयोः सम्बन्धः समवाय
इत्युक्तम् । न चैतद् युक्तम् । अवयवातिरिक्तस्यावयविनोऽभावात् ।
परमाणव एव बहवस्तथाभूताः सन्निकृष्टाः घटोऽयं घटोऽयमिति गृह्यन्ते ।
अत्रोच्यते । अस्त्येकः स्थूलो घट इति प्रत्यक्षा बुद्धिः । न च सा
परमाणुष्वनेकेष्वस्थूलेष्वतीन्द्रियेषु भवितुमर्हति । भ्रान्तेयं बुद्धिरिति
चेत् । न । बाधकाभावात् ।
मानने की आवश्यकता नहीं है । अतः पृथिवी आदि पांच में ही 'विशेष'
के मानने की आवश्यकता होती है ।
समवाय
आगे समवाय का निरूपण करते हैं ।
'अयुत सिद्धों' का सम्बन्ध 'समवाय' होता है । उसका वर्णन किया जा
चुका है ।
[ प्रश्न ] अवयव और अवयवी भी 'अयुत-सिद्ध' हैं इसलिए उनका सम्बन्ध
'समवाय' है यह [ आपने पहिले समवाय के वर्णन के प्रसङ्ग में ] कहा था ।
परन्तु वह ठीक नहीं है क्योंकि अवयव के अतिरिक्त अवयवी [ घटादि ] की
कोई सत्ता नहीं है । [ यह बौद्धों का मत है । वह अवयवों के अतिरिक्त अवयवी
को नहीं मानते हैं । क्योंकि घटादि में अवयवी जैसी कोई वस्तु दिखाई नहीं
देती है । उनका कहना है कि ] बहुत से परमाणु ही उस [ घटादि ] के रूप में
एकत्रित होकर, यह घड़ा है, यह घड़ा है इस रूप में गृहीत होते हैं । [इसलिए उन
परमाणु रूप अवयवों के अतिरिक्त घट रूप कोई 'अवयवी' नहीं है ] ।
इस विषय में [ सिद्धान्तपक्ष से उत्तर ] कहते हैं । एक, स्थूल, घट है इस
प्रकार का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । किन्तु [ अवयवी के बिना माने ] अनेक,
अस्थूल [ सूक्ष्म ] और अतीन्द्रिय परमाणुओं में वह [ अनेक परमाणुओं में
एकः, अ-स्थूल अर्थात् सूक्ष्म परमाणुओं में स्थूलः, और अतीन्द्रिय अप्रत्यक्ष
परमाणुओं में प्रत्यक्ष घटः यह प्रतीति ] नहीं बन सकती है । यह [ एकः स्थूलः
प्रत्यक्षः घटः इत्यादि ] बुद्धि, भ्रम है यह भी नहीं कह सकते हैं बाधक का
अभाव होने से ।
नैयायिकों के सिद्धान्तपक्ष का अभिप्राय यह है कि 'एकः, स्थूलः, प्रत्यक्षः,
घटः' इस प्रकार की प्रतीति केवल परमाणुओं में नहीं हो सकती है । अनेक