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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 330 में से

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पृष्ठ 273

विभागजो वा † अन्त्यमध्यमशब्दास्तु शब्दासमवायिकारणका अनुकूल-
वातनिमित्तकारणकाः । यथोक्तं—१"संयोगाद् विभागाच्छब्दाच्च शब्द-
निष्पत्तिः' इति । आद्यादीनां सर्वशब्दानामाकाशमेकमेव समवायिकारणम् ।
कर्मबुद्धिवत् त्रिक्षणावस्थायित्वम्। तत्राद्यमध्यमशब्दाः कार्यशब्दनाश्याः ।
अन्त्यस्तूपान्त्येन उपान्त्यस्त्वन्त्येन सुन्दोपसुन्दन्यायेन विनश्येते । इदं
त्वयुक्तम् । उपान्त्येन, त्रिक्षणावस्थायिनोऽन्त्यस्य, द्वितीयक्षणमात्रानुगामिना
तृतीयक्षणे चासताऽन्त्यनाशजननासम्भवात् । तस्मादुपान्त्यनाशादेवा-
न्त्यनाश इति ।
होता है । अन्त्य और बीच के शब्द तो शब्द असमवायि कारण वाले और
अनुकूल वातादि निमित्तकारण वाले होते हैं। जैसा कि [ वैशेषिक दर्शन के
सूत्रकार ने ] कहा है, संयोग, विभाग और शब्द से शब्द की उत्पत्ति होती है।
आद्य आदि सभी शब्दों का केवल आकाश ही समवायिकारण होता है। कर्म
और बुद्धि के समान [ शब्द भी क्षणिक है। और न्याय-वैशेषिक के मत में
क्षणिक का अर्थ ] त्रिक्षणावस्थायित्व है । [ क्षणिक पदार्थ प्रथम क्षण में उत्पन्न
होता है दूसरा क्षण उसकी स्थिति का क्षण है और तीसरा क्षण उसके विनाश
का क्षण है । इस प्रकार तीन क्षण तक रहने पर भी वह 'क्षणिक' कहलाता है ।
बौद्ध लोग सभी पदार्थों को 'क्षणिक' मानते हैं परन्तु उनके यहाँ जो उत्पत्तिक्षण
है वही स्थिति और विनाश का भी क्षण है इसलिए उनके यहां त्रिक्षणावस्था-
यित्व 'क्षणिक' शब्द का अर्थ नहीं होता है ] । उन [ तीनों शब्दों ] में से आदि
और मध्यम शब्द [ अपने से उत्पन्न होने वाले अगले ] कार्यशब्द से नाश्य हैं ।
[ जब अगला शब्द उत्पन्न होता है तो वह अपने कारणभूत शब्द को नष्ट कर
देता है ] परन्तु अन्त्य शब्द का नाश उपान्त्य और उपान्त्य का नाश अन्त्य से
'सुन्दोपसुन्द-न्याय' से होता है [ यह एक मत है उसका खण्डन करते हैं ]
यह ठीक नहीं है । [ क्योंकि उपान्त्य का जो स्थिति क्षण है वही अन्त्य का
उत्पत्तिक्षण है । 'वध्यघातकभाव' अथवा 'सहानवस्थान' में से कोई भी विरोध
माना जाय अन्त्य शब्द के नाश के क्षण में उपान्त्य विद्यमान नहीं है अतएव
वह अन्त्य के नाश का कारण नहीं हो सकता है ] तीन क्षण रहने वाले अन्त्य का
केवल द्वितीय क्षण में साथ रहने वाले [ अर्थात् ] तृतीय [ अन्त्य के विनाश ]
क्षण में अविद्यमान उपान्त्य से नाश सम्भव नहीं हो सकता है। इसलिए
[ उपान्त्य से नहीं अपितु ] उपान्त्य के नाश से अन्त्य का नाश होता है ।
१ वैशेषिक दर्शन २, २, ३१ ।