तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुखादिगुणाः ] प्रमेयनिरूपणम् २११
१७-प्रीतिः सुखम् । तच्च सर्वात्मनामनुकूलवेदनीयम् ।
१८-पीडा दुःखम् । तच्च सर्वात्मनां प्रतिकूलवेदनीयम् ।
१६-राग इच्छा ।
२०-क्रोधो द्वेषः ।
२१-उत्साहः प्रयत्नः ।
बुद्धयादयः षड् मानसप्रत्यक्षाः ।
२२-२३-धर्माधर्मौ सुखदुःखयोरसाधारणकारणे । तौ चाप्रत्यक्षाव-
प्रबलता के कारण, दूसरे धातु-दोष के कारण और तीसरे अदृष्टवश ।
साधारणतः मनुष्य जिस बात का ध्यान अधिक करता है अथवा जिसको
देखने से मन पर, प्रबल संस्कार पड़ता है उसी वस्तु को स्वप्न में देखता है ।
इस प्रकार के स्वप्न 'संस्कार-पाटव' के कारण होते हैं । 'धातु' शब्द से
आयुर्वेद शास्त्र में 'वात', 'पित्त', 'कफ' लिया जाता है । वातप्रकृति अथवा
वातदूषित व्यक्ति को प्रायः आकाश में उड़ने के स्वप्न दिखाई देते हैं ।
पित्त-प्रकृति या पित्त-दूषित व्यक्ति अग्नि के स्वप्न, और कफ-दूषित व्यक्ति
जल के स्वप्न देखता है । यह सब 'धातुदोषात्' वाले स्वप्नों के उदाहरण हैं ।
और अदृष्टवशात् कभी कभी मनुष्य ऐसे पदार्थों को भी स्वप्न में देखता है
जिनको उसने अपने जीवन में कभी नहीं देखा है । इसी बात को महाकवि
श्रीहर्ष ने अपने 'नैषधीयचरितम्' नामक महाकाव्य में इस प्रकार कहा है—
अदृष्टमप्यर्थमदृष्टवैभवात्, करोति सुप्तिर्जनदर्शनातिथिम् ।
१७ प्रीति [ आनन्द ] को 'सुख' कहते हैं । वह सब आत्माओं को अनुकूल
अनुभव होने वाला होता है ।
१८ पीड़ा को 'दुःख' कहते हैं । वह सब आत्माओं को प्रतिकूल अनुभव
होता है ।
१९ राग का नाम 'इच्छा' है ।
२० क्रोध का नाम 'द्वेष' है ।
२१ उत्साह को 'प्रयत्न' कहते हैं ।
बुद्धि आदि ६ [ १ बुद्धि, २ सुख, ३ दुःख, ४ इच्छा, ५ द्वेष, ६ प्रयत्न ]
मानस प्रत्यक्ष [ के विषय ] हैं ।
२२-२३ 'धर्म' और 'अधर्म' [आत्मा के] सुख और दुःखके असाधारण कारण
हैं । वह दोनों प्रत्यक्ष न होनेपर भी आगम तथा अनुमान से जाने जा सकते हैं ।
१ नैषध १ ।