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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 330 में से

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पृष्ठ 275

२१० तर्कभाषा [ परमाणुसिद्धिः
उच्यते । परमाणवः कस्यचित् प्रत्यक्षाः प्रमेयत्वाद् घटवदिति ।
तथापि सामान्यादिना व्यभिचारोऽत उक्तं सामान्यवत्त्वे सतीति ।
सामान्यादित्रयस्य निःसामान्यत्वात् ।
१६-अर्थप्रकाशो बुद्धिः । नित्याऽनित्या च । ऐशी बुद्धिर्नित्या, अन्य-
दीया त्वनित्या ।
[ उत्तर ] कहते हैं । परमाणु किसी से प्रत्यक्ष होने चाहिए । प्रमेय होने से
घट के समान । [ यह अनुमान ही योगी की सत्ता में प्रमाण है ] । इस प्रकार
[ अस्मदादि बाह्येन्द्रियग्राह्यत्व को विनाशित्व का साधक हेतु मानने पर ] भी
सामान्य आदि [ के अस्मदादि बाह्येन्द्रिय ग्राह्य होने पर भी नित्य होने ] में
व्यभिचार होगा । इसलिए 'सामान्यवत्त्वे सति' यह [ विशेषण ] कहा है ।
सामान्य, आदि तीन [ सामान्य, विशेष, तथा समवाय ] के सामान्य [ जाति ]
से रहित होने से । [ सामान्य में 'सामान्यवत्त्व' अंश न होने से अस्मदादि
बाह्येन्द्रियग्राह्यत्व होते हुए अनित्यत्व या विनाशित्व प्राप्त नहीं होगा अतः
व्यभिचार नहीं होगा ] ।
१६ अर्थ का प्रकाश [ ज्ञान ] 'बुद्धि' है । [ वह दो प्रकार की होती है ]
नित्य और अनित्य । ईश्वर की बुद्धि [ ज्ञान ] नित्य और अन्य [ मनुष्यादि ]
की अनित्य है ।
जैसा कि पहले कहा जा चुका है वैशेषिक दर्शन की प्रक्रिया में न्याय
दर्शन के प्रमाणादि पदार्थों का अन्तर्भाव इस 'बुद्धि' पदार्थ के अन्तर्गत किया
जाता है । वैशेषिक दर्शन के 'प्रशस्तपाद भाष्य' में बुद्धि के प्रथम दो प्रकार
के भेद किए गए हैं एक विद्या और दूसरा अविद्या । उसमें भी अविद्या के चार
भेद किए हैं। १ संशय २ विपर्यय, ३ अनध्यवसाय और ४ स्वप्न । इनमें
'संशय' और 'अनध्यवसाय' दोनों को अलग माना है। जिनमें 'स्थाणुर्वा पुरुषो
वा' इस प्रकार के उभयकोटिक ज्ञान को संशय और 'व्यासङ्गादनर्थित्वाद्व्वा
किमित्यालोचनमात्रम् अनध्यवसायः' । यह 'अनध्यवसाय' का लक्षण किया है ।
बुद्धि के भेद करते हुए 'प्रशस्तपाद भाष्य' में लिखा है—
तस्याः अनेकविधत्वेऽपि समासतो द्वे विधे । विद्या चाविद्या चेति । तत्रा-
विद्या चतुर्विधा, संशय-विपर्यय-अनध्यवसाय-स्वप्नलक्षणा ।
स्वप्न के कारण तथा भेदों का वर्णन करते हुए लिखा है—
तत्तु त्रिविधम् — १ संस्कारपाटवात्, २ धातुदोषात्, ३ अदृष्टाच्च ।
अर्थात् स्वप्न, कारण के भेद से तीन प्रकार के होते हैं । एक संस्कारों की