तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्माणि ] प्रमेयनिरूपणम् २१३
गुणा उक्ताः !
कर्माणि
कर्माणि उच्यन्ते । चलनात्मकं कर्म, गुण इव द्रव्यमात्रवृत्ति । अवि-
भुद्रव्यपरिमाणेन मूर्तत्वापरनाम्ना सहैकार्थसमवेतं विभागद्वारा पूर्व-
संयोगनाशे सत्युत्तरदेशसंयोगहेतुश्च । तच्च उत्क्षेपण-अपक्षेपण-आकुञ्चन-
प्रसारण-गमनभेदात् पञ्चविधम् । भ्रमणादयस्तु गमनग्रहणेनैव गृह्यन्ते ।
सामान्यम्
अनुवृत्तिप्रत्ययहेतुः सामान्यम् । द्रव्यादित्रयवृत्ति, नित्यमेकमने-
कानुगतञ्च । तच्च द्विविधं, परमपरञ्च । परं सत्ता बहुविषयत्वात् ।
सा चानुवृत्तिप्रत्ययमात्रहेतुत्वात् सामान्यमात्रम् । अपरं द्रव्यत्वादि ।
अधर्म, यह सात ] तथा भावना [ नामक संस्कार ] आत्मा के 'विशेष गुण' हैं ।
गुणों का वर्णन समाप्त हो गया ।
कर्म
[ अब ] कर्मों का वर्णन करते हैं । गति रूप 'कर्म' [ होता ] है । गुण के
समान केवल द्रव्य में रहता है । और 'अविभु' द्रव्य के परिमाण जिसे 'मूर्तत्व'
नाम से भी कहते हैं, के साथ एक [ ही ] अर्थ में समवाय सम्बन्ध से रहता है ।
और विभाग द्वारा पूर्व संयोग के नाश द्वारा उत्तर देश में संयोग का हेतु होता
है । वह १ उत्क्षेपण [ ऊर्ध्व गति ], २ अपक्षेपण [ अधोगमन ], ३ आकुञ्चन
[ हाथ आदि का सिकोड़ना ], ४ प्रसारण [ फैलाना ], और [ साधारण ] गमन
भेद से पांच प्रकार का [ होता ] है । भ्रमण आदि [ रेचन, स्पन्दन आदि ] का
ग्रहण गमन के ग्रहण में ही हो जाता है ।
सामान्य
'सामान्य' अनुवृत्ति प्रत्यय [अर्थात् अनुगत प्रतीति, एकाकार प्रतीति दस घट
व्यक्तियों में होने वाली अयं घटः, अयं घटः इत्याकारक समान प्रतीति] का कारण
सामान्य [ जाति ] है । वह द्रव्यादि तीन [ १ द्रव्य, २ गुण, ३ कर्म ] में रहने
वाला नित्य, एक, और अनेक वृत्ति होता है । नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम्
सामान्यम्-यह भी सामान्य का दूसरा लक्षण है ] । वह [ सामान्य ] दो प्रकार
का होता है 'पर' और 'अपर' । [ उनमें से ] अधिक विषय वाला [ व्यापक ]
होने से 'सत्ता' [ द्रव्य, गुण तथा कर्म तीनों में रहने वाली सत्ता जाति ] 'पर'
[ सामान्य ] है । और वह अनुगत प्रतीति का ही हेतु होने से 'सामान्य' ही है
[ विशेष कभी नहीं होता है । उससे अधिक देश में रहने वाला और कोई