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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 330 में से

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पृष्ठ 280

जातिबाधकाः ] प्रमेयनिरूपणम् २१५
सामान्य 'घटत्व' सामान्य की अपेक्षा 'पर' सामान्य है परन्तु 'द्रव्यत्व' की
अपेक्षा 'अपर' सामान्य है। इसी प्रकार 'द्रव्यत्व' सामान्य 'पृथिवीत्व'
सामान्य की अपेक्षा 'पर' सामान्य है और 'सत्ता' सामान्य की अपेक्षा अल्पदेश-
वृत्ति होने से 'अपर' सामान्य है। परन्तु 'सत्ता' सामान्य किसी की अपेक्षा
'अपर' नहीं है। इसलिए सत्ताको 'पर सामान्य' कहा है। सामान्य का कार्य
अनुवृत्ति-प्रत्यय अर्थात् एकाकार-प्रतीति को उत्पन्न करना है। सत्ता सदैव एकाकार
प्रतीति का कारण ही होती है। इसलिए वह सदा 'सामान्य' ही कहलाती है।
'घटत्व' आदि 'अपर सामान्य' अनुवृत्ति-प्रत्यय के भी कारण होते हैं और
भेद-बुद्धि को भी उत्पन्न करते हैं। जैसे 'घटत्व सामान्य' जहां दस घट व्यक्तियों
में 'अयं घटः, अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार बुद्धि को पैदा करता है इस
लिए सामान्य कहलाता है। वहां घट को पट से भिन्न करने वाला भी 'घटत्व'
और 'पटत्व' ही है। घट पट से भिन्न इसलिए है कि घट में 'घटत्व' रहता है
पट में नहीं। इस प्रकार घटत्व एकाकार-प्रतीति का भी कारण होता है और
भेद-बुद्धि का भी कारण होता है। इसलिए जब वह 'अनुवृत्ति-प्रत्यय' अर्थात्
एकाकार बुद्धि को उत्पन्न करता है तब वह सामान्य कहलाता है। और जब
वह भेद-बुद्धि को उत्पन्न करता है तब 'विशेष' कहलाता है। 'सत्ता सामान्य'
को छोड़कर शेष सब सामान्य दोनों काम करते हैं इसलिए वह 'सामान्यं सद्
विशेषाख्यामपि लभते' 'सामान्य' होते हुए 'विशेष' भी कहलाते हैं। परन्तु
'सत्ता सामान्य' को केवल 'अनुवृत्ति-प्रत्यय' का ही हेतु होता है इसलिए 'सा
त्वनुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव'। वह तो केवल अनुवृत्ति-प्रत्यय का हेतु
होने से 'सामान्य' ही है, 'विशेष' नहीं।
'सत्ता सामान्य' को अत्यन्त 'पर' सामान्य कहा है क्योंकि वह अन्य सब
की अपेक्षा अधिकदेश-वृत्ति है। वह द्रव्य, गुण और कर्म इन तीन पदार्थों में
रहती है। यहां शङ्का हो सकती है कि जैसे द्रव्य, गुण और कर्म सत् हैं वैसे
ही 'सामान्य', 'विशेष', 'समवाय' यह तीनों और पदार्थ भी सत् अर्थात् भाव
भूत हैं, इसलिए 'सत्ता-सामान्य' इन तीनों में भी मानना चाहिए। अर्थात्
छहों भाव पदार्थों में 'सत्ता-सामान्य' मानना चाहिए उसे केवल द्रव्यत्रयवृत्ति
ही क्यों कहा है। इसका उत्तर यह है कि द्रव्य, गुण, कर्म यह तीन तो 'सत्ता
सामान्य' के सम्बन्ध होनेके कारण सत् है परन्तु शेष तीन पदार्थ 'स्वरूप सत्'
हैं 'सत्ता सामान्य' के योग से सत् नहीं हैं। उनमें 'सत्ता' जाति नहीं रहती है।
कारण कि यदि सत्ता जातिमें जाति मानें तो जाति में जाति मानने का सिद्धान्त