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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 330 में से

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पृष्ठ 277

२१२ तर्कभाषा [संस्कारगुणः
प्यागमगम्यावनुमानगम्यौ च। तथाहि देवदत्तस्य शरीरादिकं देवदत्त-
विशेषगुणजन्यं कार्यत्वे सति देवदत्तस्य भोगहेतुत्वात्। देवदत्तप्रयत्नजन्य-
वस्तुवत् । यश्च शरीरादिजनक आत्मविशेषगुणः स एव धर्मोऽधर्मश्च ।
प्रयत्नादीनां शरीराद्यजनकत्वादिति ।
२४-संस्कारव्यवहाराऽसाधारणं कारणं संस्कारः ।
संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्च । तत्र वेगः पृथिव्या-
दिचतुष्टयमनोवृत्तिः । स च क्रियाहेतुः । भावनाख्यस्तु संस्कार आत्म-
मात्रवृत्तिरनुभवजन्यः स्मृतिहेतुः । स चोद्बुद्ध एव स्मृतिं जनयति ।
उद्बोधश्च सहकारिलाभः । सहकारिणश्च संस्कारस्य सदृशदर्शनादयः ।
तथा चोक्तम्—
'सादृश्यादृष्टचिन्ताद्याः स्मृतिबीजस्य बोधकाः ।'
इति । स्थितिस्थापकस्तु स्पर्शवद्द्रव्यविशेषवृत्तिः । अन्यथाभूतस्य
स्वाश्रयस्य धनुरादेः पुनस्तादवस्थ्यापादकः। एते च बुद्धयादयोऽधर्मान्ता
भावना च आत्मविशेषगुणाः ।
जैसे कि [अनुमान-प्रयोग निम्न प्रकार का हो सकता है] देवदत्त के शरीर आदिक
देवदत्त के विशेष गुण [धर्माधर्म] से जन्य हैं [यह प्रतिज्ञा है] कार्य होकर
देवदत्त के भोग के हेतु होने से, देवदत्त के प्रयत्नजन्य [घट-पटादि] वस्तु के
समान । और जो शरीर आदि का जनक आत्मा का विशेषगुण है वही 'धर्म'
और 'अधर्म' है । [उनसे भिन्न] प्रयत्नादि [गुणों] के शरीर के जनक न होने से ।
२४ संस्कार, इस प्रकार के व्यवहार का असाधारण कारण 'संस्कार'
[नामक गुण] है ।
संस्कार तीन प्रकार का होता है । १ वेग, २ भावना, और ३ स्थिति-
स्थापक । उनमें से 'वेग' पृथिवी आदि चार और मन में रहने वाला है और
वह क्रिया का हेतु होता है । 'भावना' नामक संस्कार केवल आत्मा में रहने
वाला अनुभव से जन्य और स्मृति का हेतु होता है । वह उद्बुद्ध होकर ही
स्मृति को उत्पन्न करता है । [संस्कार का] उद्बोध [उसको] सहकारी का प्राप्त
होना है। और संस्कार के सहकारी सदृशदर्शन आदि हैं। जैसा कि कहा है—
सादृश्य, अदृष्ट और चिन्ता आदि स्मृति के बीज [भूत संस्कार] के उद्बोधक हैं।
स्थितिस्थापक [संस्कार] तो स्पर्शयुक्त द्रव्य विशेषों में रहने वाला,
और [खींचने से झुक जाने के कारण] अन्यथा भूत अपने आश्रय [भूत]
धनुष आदि को फिर पूर्व अवस्था में लाने वाला होता है।
यह बुद्धि से लेकर अधर्म पर्यन्त [बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, धर्म,