तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दस्यानित्यत्वम् ] प्रमेयनिरूपणम् २०६
विनाशित्वञ्च शब्दस्यानुमानात् । तथाहि, अनित्यः शब्दः
सामान्यवत्त्वे सत्यस्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यत्वाद् घटवदिति । शब्दस्या-
नित्यत्वं साध्यम् । अनित्यत्वञ्च विनाशावच्छिन्नस्वरूपत्वं, न तु विना-
शावच्छिन्नसत्तायोगित्वं, प्रागभावे सत्ताहीनेऽनित्यत्वाभावप्रसङ्गात् ।
सामान्यवत्त्वे सत्यस्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यत्वं हेतुः । इन्द्रियग्राह्यत्वा-
दित्युरुच्यमाने आत्मनि व्यभिचारः स्यादत उक्तं बाह्येति । एवमपि
तेनैव योगिबाह्येन्द्रियेण ग्राह्ये परमाण्वादौ व्यभिचारः स्यादतो योगि-
निरासार्थमुक्तमस्मदादीति ।
किं पुनर्योंगिसद्भावे प्रमाणम् ?
[ मीमांसक शब्द को नित्य मानते हैं । उनके खण्डन के लिए शब्द का
विनाशित्व सिद्ध करते हैं ] शब्द का विनाशित्व अनुमान से [ सिद्ध होता ] है ।
जैसे कि शब्द अनित्य है [ यह प्रतिज्ञा है ] सामान्यवान् होते हुए अस्मदादि की
बाह्येन्द्रियों से ग्राह्य होने से, घट के समान । [ जैसे घट, घटत्व सामान्य रहने के
कारण 'सामान्यवान्' है और अस्मदादि की बाह्येन्द्रिय से ग्राह्य है तथा अनित्य
है । इसी प्रकार शब्द भी सामान्यवान् तथा अस्मदादि की बाह्य इन्द्रिय श्रोत्र से
गृहीत होने के कारण अनित्य होना चाहिए] शब्द का अनित्यत्व साध्य है । और
अनित्यत्व [ का लक्षण ] विनाशावच्छिन्न स्वरूपत्व है । न कि विनाशावच्छिन्न-
सत्तायोगित्व । [ क्योंकि अनित्य प्रागभाव में सत्ता जाति नहीं रहती परन्तु वह
अनित्य होता है । इसलिए यदि 'विनाशावच्छिन्न सत्तायोगित्व' को ही विनाशित्व
का लक्षण कहेंगे तो ] सत्तारहित 'प्रागभाव' में अनित्यत्व का अभाव प्राप्त होने
से । [ और 'विनाशावच्छिन्न स्वरूपत्व' को विनाशित्व-अनित्यत्व-मानने से
प्रागभाव में भी अनित्यत्व बन जाता है । ] सामान्यवान् होकर अस्मदादि की
बाह्येन्द्रिय से ग्राह्यत्व [ होने से ] यह हेतु [ शब्द के अनित्यत्व की सिद्धि में
दिया गया ] है । [ इसका पदकृत्य दिखाते हैं ] केवल 'इन्द्रियग्राह्यत्वात्' कहने
से आत्मा [ के मन रूप अन्तरिन्द्रिय से ग्राह्य होने से उसमें अनित्यत्व होना
चाहिए परन्तु आत्मा नित्य है अतः उस ] में व्यभिचार होने लगेगा, इसलिए
बाह्य [ पद ] कहा है ।
इस प्रकार [ बाह्येन्द्रियग्राह्यत्वात् को विनाशित्व का साधक हेतु मानने पर ]
भी उसी योगी की बाह्य इन्द्रिय [ चक्षुः ] से ग्राह्य परमाणु आदि में [ बाह्ये-
न्द्रियग्राह्यत्व होने पर भी विनाशित्व न होने से ] व्यभिचार होगा । इसलिए
योगी [ की बाह्येन्द्रिय ] के निराकरण के लिए अस्मदादि [ की बाह्य इन्द्रिय से
ग्राह्य ] यह कहा है ।
[ प्रश्न ] योगी की सत्ता में क्या प्रमाण है ?
१४ त० भा०