सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
५० * श्रीरामचरितमानस *
सृष्टिका सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बलसे
सहस्रमुख (फणों)-वाले शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त
ब्रह्माण्डको सिरपर धारण करते हैं; ॥ ३ ॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता।
तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥ ४॥
जो देवताओंकी रक्षाके लिये नाना प्रकारकी देह धारण करते
हैं और जो तुम्हारे-जैसे मूर्खोंको शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने
शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ डाला और उसीके साथ
राजाओंके समूहका गर्व चूर्ण कर दिया॥ ४॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली।
बधे सकल अतुलित बलसाली॥ ५॥
जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालिको मार डाला, जो
सब-के-सब अतुलनीय बलवान् थे; ॥ ५॥
[दोहा २१]
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥
जिनके लेशमात्र बलसे तुमने समस्त चराचर जगत्को जीत
लिया और जिनकी प्रिय पत्नीको तुम [चोरीसे] हर लाये हो,
मैं उन्हींका दूत हूँ॥ २१॥
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई।
सहसबाहु सन परी लराई॥
- सुन्दरकाण्ड * ५१
समर बालि सन करि जसु पावा।
सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ १ ॥
मैं तुम्हारी प्रभुताको खूब जानता हूँ, सहस्रबाहुसे तुम्हारी
लड़ाई हुई थी और बालिसे युद्ध करके तुमने यश प्रास किया
था। हनुमान्जीके [मार्मिक] वचन सुनकर रावणने हँसकर बात
टाल दी॥ १ ॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा।
कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी।
मारहिं मोहि कुमारग गामी॥ २ ॥
हे [राक्षसोंके] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने
फल खाये और वानर-स्वभावके कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरोंके)
मालिक! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्गपर चलनेवाले (दुष्ट)
राक्षस जब मुझे मारने लगे॥ २ ॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे।
तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥ ३ ॥
तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उसपर तुम्हारे
पुत्रने मुझको बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ
भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभुका कार्य किया चाहता हूँ॥ ३ ॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
५२ * श्रीरामचरितमानस *
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी।
भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥४॥
हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान
छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुलका विचार करके
देखो और भ्रमको छोड़कर भक्तभयहारी भगवान्को भजो॥४॥
जाकें डर अति काल डेराई।
जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै।
मोरे कहें जानकी दीजै॥५॥
जो देवता, राक्षस और समस्त चराचरको खा जाता है, वह
काल भी जिनके डरसे अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न
करो और मेरे कहनेसे जानकीजीको दे दो॥५॥
[दोहा २२]
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥
खरके शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतोंके रक्षक और दयाके
समुद्र हैं। शरण जानेपर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें
अपनी शरणमें रख लेंगे॥२२॥
राम चरन पंकज उर धरहू।
लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका।
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥ १ ॥
तुम श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारण करो और
लङ्काका अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजीका यश निर्मल
- सुन्दरकाण्ड * ५३
चन्द्रमाके समान है। उस चन्द्रमामें तुम कलंक न बनो॥१॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा।
देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी।
सब भूषन भूषित बर नारी॥२॥
रामनामके बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोहको छोड़,
विचारकर देखो। हे देवताओंके शत्रु! सब गहनोंसे सजी हुई
सुन्दरी स्त्री भी कपड़ोंके बिना (नंगी) शोभा नहीं पाती॥२॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं।
बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥३॥
रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली
जाती है और उसका पाना न पानेके समान है। जिन नदियोंके
मूलमें कोई जलस्रोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केवल बरसातका
ही आसरा है) वे वर्षा बीत जानेपर फिर तुरंत ही सूख
जाती हैं॥३॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी।
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥४॥
हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुखकी
रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा
५४ * श्रीरामचरितमानस *
भी श्रीरामजीके साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते ॥ ४ ॥
[दोहा २३]
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥
मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा
देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके
स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ॥ २३ ॥
जदपि कही कपि अति हित बानी।
भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी।
मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥ १॥
यद्यपि हनुमान्जीने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीतिसे सनी
हुई बहुत ही हितकी वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी
रावण बहुत हँसकर (व्यंगसे) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा
ज्ञानी गुरु मिला! ॥ १ ॥
मृत्यु निकट आई खल तोही।
लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना।
मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥ २॥
रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है। अधम! मुझे शिक्षा
देने चला है। हनुमान्जीने कहा—इससे उलटा ही होगा (अर्थात्
मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं)। यह तेरा मतिभ्रम
(बुद्धिका फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है॥ २॥
- सुन्दरकाण्ड * ५५
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना।
बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए।
सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥ ३॥
हनुमान्जीके वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया
[और बोला—] अरे! इस मूर्खका प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर
लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मन्त्रियोंके
साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे॥ ३॥
नाइ सीस करि बिनय बहूता।
नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई।
सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥ ४॥
उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावणसे कहा
कि दूतको मारना नहीं चाहिये, यह नीतिके विरुद्ध है। हे गोसाईं!
कोई दूसरा दण्ड दिया जाय। सबने कहा—भाई! यह सलाह
उत्तम है॥ ४॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर।
अंग भंग करि पठइअ बंदर॥ ५॥
यह सुनते ही रावण हँसकर बोला—अच्छा तो, बंदरको
अंग-भंग करके भेज (लौटा) दिया जाय॥ ५॥
[दोहा २४]
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥
मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदरकी ममता पूँछपर
५६ * श्रीरामचरितमानस *
होती है। अतः तेलमें कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछमें बाँधकर
फिर आग लगा दो॥ २४॥
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि।
तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई।
देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥ १॥
जब बिना पूँछका यह बंदर वहाँ (अपने स्वामीके पास)
जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिकको साथ ले आयेगा। जिनकी
इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता (सामर्थ्य) तो
देखूँ!॥ १॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना।
भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना।
लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥ २॥
यह वचन सुनते ही हनुमान्जी मनमें मुसकराये [और मन-
ही-मन बोले कि] मैं जान गया, सरस्वतीजी [इसे ऐसी बुद्धि
देनेमें] सहायक हुई हैं। रावणके वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही
(पूँछमें आग लगानेकी) तैयारी करने लगे॥ २॥
रहा न नगर बसन घृत तेला।
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी।
मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥ ३॥
[पूँछके लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि]
- सुन्दरकाण्ड * ५७
नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमान्जीने ऐसा
खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी)। नगरवासी लोग
तमाशा देखने आये। वे हनुमान्जीको पैरसे ठोकर मारते हैं और
उनकी बहुत हँसी करते हैं॥ ३॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी।
नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता।
भयउ परम लघुरूप तुरंता॥ ४॥
ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं। हनुमान्जीको
नगरमें फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी। अग्निको जलते हुए
देखकर हनुमान्जी तुरंत ही बहुत छोटे रूपमें हो गये॥ ४॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं।
भईं सभीत निसाचर नारीं॥ ५॥
बन्धनसे निकलकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े। उनको
देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं॥ ५॥
[दोहा २५]
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥
उस समय भगवान्की प्रेरणासे उनचासों पवन चलने लगे।
हनुमान्जी अट्टहास करके गर्जे और बढ़कर आकाशसे जा लगे॥ २५॥
देह बिसाल परम हरुआई।
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला।
झपट लपट बहु कोटि कराला॥ १॥
५८ * श्रीरामचरितमानस *
देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली) है। वे
दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा
है, लोग बेहाल हो गये हैं। आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट
रही हैं॥ १॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा।
एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई।
बानर रूप धरें सुर कोई॥ २॥
हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसरपर हमें कौन बचावेगा?
[चारों ओर] यही पुकार सुनायी पड़ रही है। हमने तो पहले
ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानरका रूप धरे कोई देवता
है!॥ २॥
साधु अवज्ञा कर फलु ऐसा।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं।
एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥ ३॥
साधुके अपमानका यह फल है कि नगर अनाथके नगरकी
तरह जल रहा है। हनुमान्जीने एक ही क्षणमें सारा नगर जला
डाला। एक विभीषणका घर नहीं जलाया॥ ३॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥ ४॥
- सुन्दरकाण्ड * ५९
[शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! जिन्होंने अग्निको बनाया,
हनुमान्जी उन्हींके दूत हैं। इसी कारण वे अग्निसे नहीं जले।
हनुमान्जीने उलट-पलटकर (एक ओरसे दूसरी ओरतक) सारी
लङ्का जला दी। फिर वे समुद्रमें कूद पड़े॥४॥
[दोहा २६]
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥
पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप
धारण कर हनुमान्जी श्रीजानकीजीके सामने हाथ जोड़कर जा
खड़े हुए॥२६॥
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।
जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूडामनि उतारि तब दयऊ।
हरष समेत पवनसुत लयऊ॥१॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान)
दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था। तब सीताजीने
चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्जीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया॥१॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा।
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी।
हरहु नाथ मम संकट भारी॥२॥
[जानकीजीने कहा—] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना
और इस प्रकार कहना—हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकारसे
पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकारकी कामना नहीं है), तथापि
६० * श्रीरामचरितमानस *
दीनों (दुःखियों)-पर दया करना आपका विरद है [और मैं
दीन हूँ] अतः उस विरदको याद करके, हे नाथ! मेरे भारी
संकटको दूर कीजिये॥ २॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु।
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा।
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥ ३॥
हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्तकी कथा (घटना) सुनाना और
प्रभुको उनके बाणका प्रताप समझाना [स्मरण कराना]। यदि
महीनेभरमें नाथ न आये तो फिर मुझे जीती न पायेंगे॥ ३॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना।
तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती।
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥ ४॥
हे हनुमान्! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम
भी अब जानेको कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई
थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!॥ ४॥
[दोहा २७]
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥
हनुमान्जीने जानकीजीको समझाकर बहुत प्रकारसे धीरज
दिया और उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर श्रीरामजीके पास
गमन किया॥ २७॥
- सुन्दरकाण्ड * ६१
चलत महाधुनि गर्जेंसि भारी।
गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा।
सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥ १ ॥
चलते समय उन्होंने महाध्वनिसे भारी गर्जन किया, जिसे
सुनकर राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिरने लगे। समुद्र लाँघकर वे
इस पार आये और उन्होंने वानरोंको किलिकिला शब्द
(हर्षध्वनि) सुनाया॥ १॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना।
नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा।
कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥ २ ॥
हनुमान्जीको देखकर सब हर्षित हो गये और तब वानरोंने
अपना नया जन्म समझा। हनुमान्जीका मुख प्रसन्न है और
शरीरमें तेज विराजमान है, [जिससे उन्होंने समझ लिया कि]
ये श्रीरामचन्द्रजीका कार्य कर आये हैं॥ २॥
मिले सकल अति भए सुखारी।
तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा।
पूँछत कहत नवल इतिहासा॥ ३ ॥
सब हनुमान्जीसे मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे
तड़पती हुई मछलीको जल मिल गया हो। सब हर्षित होकर
नये-नये इतिहास (वृत्तान्त) पूछते-कहते हुए श्रीरघुनाथजीके
पास चले॥ ३॥
६२ * श्रीरामचरितमानस *
तब मधुबन भीतर सब आए।
अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे।
मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥४॥
तब सब लोग मधुवनके भीतर आये और अंगदकी सम्मतिसे
सबने मधुर फल [या मधु और फल] खाये। जब रखवाले
बरजने लगे, तब घूँसोंकी मार मारते ही सब रखवाले भाग
छूटे॥४॥
[दोहा २८]
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥
उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे
हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभुका कार्य कर
आये हैं॥२८॥
जौं न होति सीता सुधि पाई।
मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा।
आइ गए कपि सहित समाजा॥१॥
यदि सीताजीकी खबर न पायी होती तो क्या वे मधुवनके
फल खा सकते थे? इस प्रकार राजा सुग्रीव मनमें विचार कर
ही रहे थे कि समाजसहित वानर आ गये॥१॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा।
मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
- सुन्दरकाण्ड * ६३
पूँछी कुसल कुसल पद देखी।
राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥ २ ॥
सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव
सभीसे बड़े प्रेमके साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, [तब वानरोंने
उत्तर दिया—] आपके चरणोंके दर्शनसे सब कुशल है। श्रीरामजीकी
कृपासे विशेष कार्य हुआ (कार्यमें विशेष सफलता हुई है) ॥ २ ॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना।
राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ।
कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥ ३ ॥
हे नाथ! हनुमान्ने ही सब कार्य किया और सब वानरोंके
प्राण बचा लिये। यह सुनकर सुग्रीवजी हनुमान्जीसे फिर मिले
और सब वानरोंसमेत श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ ३ ॥
राम कपिन्ह जब आवत देखा।
किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई।
परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥ ४ ॥
श्रीरामजीने जब वानरोंको कार्य किये हुए आते देखा तब
उनके मनमें विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिलापर बैठे
थे। सब वानर जाकर उनके चरणोंपर गिर पड़े॥ ४ ॥
[दोहा २९]
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥
६४ * श्रीरामचरितमानस *
दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर
मिले और कुशल पूछी। [वानरोंने कहा—] हे नाथ! आपके
चरणकमलोंके दर्शन पानेसे अब कुशल है॥ २९॥
जामवंत कह सुनु रघुराया।
जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर।
सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥ १॥
जाम्बवान्ने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये। हे नाथ! जिसपर
आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है।
देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं॥ १॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर।
तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू।
जन्म हमार सुफल भा आजू॥ २॥
वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणोंका समुद्र बन
जाता है। उसीका सुन्दर यश तीनों लोकोंमें प्रकाशित होता है।
प्रभुकी कृपासे सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो
गया॥ २॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी।
सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए।
जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥ ३॥
हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्ने जो करनी की, उसका हजार
अशोक वाटिका विध्वंस, मेघनाद-युद्ध, रावण-सभा एवं लंका-दहन (दोहा २०-३४)
- सुन्दरकाण्ड * ६५
मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान्ने
हनुमान्जीके सुन्दर चरित्र (कार्य) श्रीरघुनाथजीको सुनाये ॥ ३ ॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए।
पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी।
रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥ ४॥
[वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजीके मनको बहुत
ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमान्जीको फिर हृदयसे
लगा लिया और कहा—हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती
और अपने प्राणोंकी रक्षा करती हैं? ॥ ४॥
[दोहा ३०]
नाम पहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥
(हनुमान्जीने कहा—) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला
है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये
रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायँ तो किस
मार्गसे ? ॥ ३० ॥
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही।
रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी।
बचन कहे कछु जनककुमारी॥ १॥
चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [उतारकर] दी। श्रीरघुनाथजीने
उसे लेकर हृदयसे लगा लिया। [हनुमान्जीने फिर कहा—]
हे नाथ! दोनों नेत्रोंमें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ
वचन कहे— ॥ १ ॥
६६ * श्रीरामचरितमानस *
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना।
दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी।
केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥ २॥
छोटे भाईसमेत प्रभुके चरण पकड़ना [और कहना कि]
आप दीनबन्धु हैं, शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले हैं और मैं मन,
कर्म और वचनसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी
(आप)-ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया? ॥२॥
अवगुन एक मोर मैं माना।
बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा।
निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥ ३॥
[हाँ] एक दोष मैं अपना [अवश्य] मानती हूँ कि आपका
वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो
नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं॥ ३॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा।
स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी।
जरैं न पाव देह बिरहागी॥ ४॥
विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार
[अग्नि और पवनका संयोग होनेसे] यह शरीर क्षणमात्रमें जल
सकता है। परन्तु नेत्र अपने हितके लिये (प्रभुका स्वरूप देखकर
सुखी होनेके लिये) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरहकी
आगसे भी देह जलने नहीं पाती॥ ४॥
- सुन्दरकाण्ड * ६७
सीता कै अति बिपति बिसाला।
बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ॥ ५ ॥
सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! वह बिना
कही ही अच्छी है (कहनेसे आपको बड़ा क्लेश होगा) ॥ ५ ॥
[दोहा ३१]
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥
हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्पके समान
बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके
बलसे दुष्टोंके दलको जीतकर सीताजीको ले आइये ॥ ३१ ॥
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना।
भरि आए जल राजिव नयना ॥
बचन कायँ मन मम गति जाही।
सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥ १ ॥
सीताजीका दुःख सुनकर सुखके धाम प्रभुके कमलनेत्रोंमें
जल भर आया [और वे बोले—] मन, शरीर और वचनसे जिसे
मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्नमें भी
विपत्ति हो सकती है? ॥ १ ॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई।
जब तव सुमिरन भजन न होई ॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की।
रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥ २ ॥
हनुमान्जीने कहा—हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब
६८ * श्रीरामचरितमानस *
आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसोंकी बात ही कितनी
है ? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे ॥ २ ॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥ ३॥
[भगवान् कहने लगे—] हे हनुमान्! सुन; तेरे समान मेरा
उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है।
मैं तेरा प्रत्युपकार (बदलेमें उपकार) तो क्या करूँ, मेरा मन भी
तेरे सामने नहीं हो सकता॥ ३॥
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।
देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता।
लोचन नीर पुलक अति गाता॥ ४॥
हे पुत्र! सुन; मैंने मनमें [खूब] विचार करके देख लिया कि
मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओंके रक्षक प्रभु बार-
बार हनुमान्जीको देख रहे हैं। नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल भरा है
और शरीर अत्यन्त पुलकित है॥ ४॥
[दोहा ३२]
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥
प्रभुके वचन सुनकर और उनके [प्रसन्न] मुख तथा
[पुलकित] अंगोंको देखकर हनुमान्जी हर्षित हो गये और प्रेममें
- सुन्दरकाण्ड * ६९
विकल होकर ‘हे भगवन्! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए
श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े॥ ३२ ॥
बार बार प्रभु चहइ उठावा।
प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा।
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥ १ ॥
प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेममें डूबे हुए
हनुमान्जीको चरणोंसे उठना सुहाता नहीं। प्रभुका कर-कमल
हनुमान्जीके सिरपर है। उस स्थितिका स्मरण करके शिवजी
प्रेममग्न हो गये॥ १ ॥
सावधान मन करि पुनि संकर।
लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा।
कर गहि परम निकट बैठावा॥ २ ॥
फिर मनको सावधान करके शङ्करजी अत्यन्त सुन्दर कथा
कहने लगे—हनुमान्जीको उठाकर प्रभुने हृदयसे लगाया और
हाथ पकड़कर अत्यन्त निकट बैठा लिया॥ २ ॥
कहु कपि रावन पालित लंका।
केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।
बोला बचन बिगत अभिमाना॥ ३ ॥
हे हनुमान्! बताओ तो, रावणके द्वारा सुरक्षित लङ्का और
उसके बड़े बाँके किलेको तुमने किस तरह जलाया ? हनुमान्जीने
प्रभुको प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले— ॥ ३ ॥