सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ६९
विकल होकर ‘हे भगवन्! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए
श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े॥ ३२ ॥
बार बार प्रभु चहइ उठावा।
प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा।
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥ १ ॥
प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेममें डूबे हुए
हनुमान्जीको चरणोंसे उठना सुहाता नहीं। प्रभुका कर-कमल
हनुमान्जीके सिरपर है। उस स्थितिका स्मरण करके शिवजी
प्रेममग्न हो गये॥ १ ॥
सावधान मन करि पुनि संकर।
लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा।
कर गहि परम निकट बैठावा॥ २ ॥
फिर मनको सावधान करके शङ्करजी अत्यन्त सुन्दर कथा
कहने लगे—हनुमान्जीको उठाकर प्रभुने हृदयसे लगाया और
हाथ पकड़कर अत्यन्त निकट बैठा लिया॥ २ ॥
कहु कपि रावन पालित लंका।
केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।
बोला बचन बिगत अभिमाना॥ ३ ॥
हे हनुमान्! बताओ तो, रावणके द्वारा सुरक्षित लङ्का और
उसके बड़े बाँके किलेको तुमने किस तरह जलाया ? हनुमान्जीने
प्रभुको प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले— ॥ ३ ॥