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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 128 में से

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पृष्ठ 59
  • सुन्दरकाण्ड * ५९
    [शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! जिन्होंने अग्निको बनाया,
    हनुमान्‌जी उन्हींके दूत हैं। इसी कारण वे अग्निसे नहीं जले।
    हनुमान्‌जीने उलट-पलटकर (एक ओरसे दूसरी ओरतक) सारी
    लङ्का जला दी। फिर वे समुद्रमें कूद पड़े॥४॥
    [दोहा २६]
    पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
    जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥
    पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप
    धारण कर हनुमान्‌जी श्रीजानकीजीके सामने हाथ जोड़कर जा
    खड़े हुए॥२६॥
    मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।
    जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
    चूडामनि उतारि तब दयऊ।
    हरष समेत पवनसुत लयऊ॥१॥
    [हनुमान्‌जीने कहा—] हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान)
    दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था। तब सीताजीने
    चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्‌जीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया॥१॥
    कहेहु तात अस मोर प्रनामा।
    सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
    दीन दयाल बिरिदु संभारी।
    हरहु नाथ मम संकट भारी॥२॥
    [जानकीजीने कहा—] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना
    और इस प्रकार कहना—हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकारसे
    पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकारकी कामना नहीं है), तथापि