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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 63
  • सुन्दरकाण्ड * ६३
    पूँछी कुसल कुसल पद देखी।
    राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥ २ ॥
    सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया। कपिराज सुग्रीव
    सभीसे बड़े प्रेमके साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, [तब वानरोंने
    उत्तर दिया—] आपके चरणोंके दर्शनसे सब कुशल है। श्रीरामजीकी
    कृपासे विशेष कार्य हुआ (कार्यमें विशेष सफलता हुई है) ॥ २ ॥
    नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना।
    राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
    सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ।
    कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥ ३ ॥
    हे नाथ! हनुमान्‌ने ही सब कार्य किया और सब वानरोंके
    प्राण बचा लिये। यह सुनकर सुग्रीवजी हनुमान्‌जीसे फिर मिले
    और सब वानरोंसमेत श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ ३ ॥
    राम कपिन्ह जब आवत देखा।
    किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
    फटिक सिला बैठे द्वौ भाई।
    परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥ ४ ॥
    श्रीरामजीने जब वानरोंको कार्य किये हुए आते देखा तब
    उनके मनमें विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिलापर बैठे
    थे। सब वानर जाकर उनके चरणोंपर गिर पड़े॥ ४ ॥
    [दोहा २९]
    प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
    पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥