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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

६६ * श्रीरामचरितमानस *
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना।
दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी।
केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥ २॥
छोटे भाईसमेत प्रभुके चरण पकड़ना [और कहना कि]
आप दीनबन्धु हैं, शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले हैं और मैं मन,
कर्म और वचनसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी
(आप)-ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया? ॥२॥
अवगुन एक मोर मैं माना।
बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा।
निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥ ३॥
[हाँ] एक दोष मैं अपना [अवश्य] मानती हूँ कि आपका
वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो
नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं॥ ३॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा।
स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी।
जरैं न पाव देह बिरहागी॥ ४॥
विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार
[अग्नि और पवनका संयोग होनेसे] यह शरीर क्षणमात्रमें जल
सकता है। परन्तु नेत्र अपने हितके लिये (प्रभुका स्वरूप देखकर
सुखी होनेके लिये) जल (आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरहकी
आगसे भी देह जलने नहीं पाती॥ ४॥