सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ५३
चन्द्रमाके समान है। उस चन्द्रमामें तुम कलंक न बनो॥१॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा।
देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी।
सब भूषन भूषित बर नारी॥२॥
रामनामके बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोहको छोड़,
विचारकर देखो। हे देवताओंके शत्रु! सब गहनोंसे सजी हुई
सुन्दरी स्त्री भी कपड़ोंके बिना (नंगी) शोभा नहीं पाती॥२॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं।
बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥३॥
रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली
जाती है और उसका पाना न पानेके समान है। जिन नदियोंके
मूलमें कोई जलस्रोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केवल बरसातका
ही आसरा है) वे वर्षा बीत जानेपर फिर तुरंत ही सूख
जाती हैं॥३॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी।
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥४॥
हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुखकी
रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा