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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 55
  • सुन्दरकाण्ड * ५५
    सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना।
    बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
    सुनत निसाचर मारन धाए।
    सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥ ३॥
    हनुमान्‌जीके वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया
    [और बोला—] अरे! इस मूर्खका प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर
    लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मन्त्रियोंके
    साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे॥ ३॥
    नाइ सीस करि बिनय बहूता।
    नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
    आन दंड कछु करिअ गोसाँई।
    सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥ ४॥
    उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावणसे कहा
    कि दूतको मारना नहीं चाहिये, यह नीतिके विरुद्ध है। हे गोसाईं!
    कोई दूसरा दण्ड दिया जाय। सबने कहा—भाई! यह सलाह
    उत्तम है॥ ४॥
    सुनत बिहसि बोला दसकंधर।
    अंग भंग करि पठइअ बंदर॥ ५॥
    यह सुनते ही रावण हँसकर बोला—अच्छा तो, बंदरको
    अंग-भंग करके भेज (लौटा) दिया जाय॥ ५॥
    [दोहा २४]
    कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
    तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥
    मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदरकी ममता पूँछपर