सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 57
  • सुन्दरकाण्ड * ५७
    नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमान्‌जीने ऐसा
    खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी)। नगरवासी लोग
    तमाशा देखने आये। वे हनुमान्‌जीको पैरसे ठोकर मारते हैं और
    उनकी बहुत हँसी करते हैं॥ ३॥
    बाजहिं ढोल देहिं सब तारी।
    नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
    पावक जरत देखि हनुमंता।
    भयउ परम लघुरूप तुरंता॥ ४॥
    ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं। हनुमान्‌जीको
    नगरमें फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी। अग्निको जलते हुए
    देखकर हनुमान्‌जी तुरंत ही बहुत छोटे रूपमें हो गये॥ ४॥
    निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं।
    भईं सभीत निसाचर नारीं॥ ५॥
    बन्धनसे निकलकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े। उनको
    देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं॥ ५॥
    [दोहा २५]
    हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
    अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥
    उस समय भगवान्‌की प्रेरणासे उनचासों पवन चलने लगे।
    हनुमान्‌जी अट्टहास करके गर्जे और बढ़कर आकाशसे जा लगे॥ २५॥
    देह बिसाल परम हरुआई।
    मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
    जरइ नगर भा लोग बिहाला।
    झपट लपट बहु कोटि कराला॥ १॥