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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 52

५२ * श्रीरामचरितमानस *
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी।
भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥४॥
हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान
छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुलका विचार करके
देखो और भ्रमको छोड़कर भक्तभयहारी भगवान्को भजो॥४॥
जाकें डर अति काल डेराई।
जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै।
मोरे कहें जानकी दीजै॥५॥
जो देवता, राक्षस और समस्त चराचरको खा जाता है, वह
काल भी जिनके डरसे अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न
करो और मेरे कहनेसे जानकीजीको दे दो॥५॥
[दोहा २२]
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥
खरके शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतोंके रक्षक और दयाके
समुद्र हैं। शरण जानेपर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें
अपनी शरणमें रख लेंगे॥२२॥
राम चरन पंकज उर धरहू।
लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका।
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥ १ ॥
तुम श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारण करो और
लङ्काका अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजीका यश निर्मल