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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 128 में से

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पृष्ठ 67
  • सुन्दरकाण्ड * ६७
    सीता कै अति बिपति बिसाला।
    बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ॥ ५ ॥
    सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! वह बिना
    कही ही अच्छी है (कहनेसे आपको बड़ा क्लेश होगा) ॥ ५ ॥
    [दोहा ३१]
    निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
    बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥
    हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्पके समान
    बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके
    बलसे दुष्टोंके दलको जीतकर सीताजीको ले आइये ॥ ३१ ॥
    सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना।
    भरि आए जल राजिव नयना ॥
    बचन कायँ मन मम गति जाही।
    सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥ १ ॥
    सीताजीका दुःख सुनकर सुखके धाम प्रभुके कमलनेत्रोंमें
    जल भर आया [और वे बोले—] मन, शरीर और वचनसे जिसे
    मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है, उसे क्या स्वप्नमें भी
    विपत्ति हो सकती है? ॥ १ ॥
    कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई।
    जब तव सुमिरन भजन न होई ॥
    केतिक बात प्रभु जातुधान की।
    रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥ २ ॥
    हनुमान्‌जीने कहा—हे प्रभो! विपत्ति तो वही (तभी) है जब