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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 128 में से

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पृष्ठ 65
  • सुन्दरकाण्ड * ६५
    मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान्‌ने
    हनुमान्‌जीके सुन्दर चरित्र (कार्य) श्रीरघुनाथजीको सुनाये ॥ ३ ॥
    सुनत कृपानिधि मन अति भाए।
    पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
    कहहु तात केहि भाँति जानकी।
    रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥ ४॥
    [वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजीके मनको बहुत
    ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमान्‌जीको फिर हृदयसे
    लगा लिया और कहा—हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती
    और अपने प्राणोंकी रक्षा करती हैं? ॥ ४॥
    [दोहा ३०]
    नाम पहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
    लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥
    (हनुमान्‌जीने कहा—) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला
    है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये
    रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायँ तो किस
    मार्गसे ? ॥ ३० ॥
    चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही।
    रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
    नाथ जुगल लोचन भरि बारी।
    बचन कहे कछु जनककुमारी॥ १॥
    चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [उतारकर] दी। श्रीरघुनाथजीने
    उसे लेकर हृदयसे लगा लिया। [हनुमान्‌जीने फिर कहा—]
    हे नाथ! दोनों नेत्रोंमें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ
    वचन कहे— ॥ १ ॥