सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
३० * श्रीरामचरितमानस *
सीताजी कहती हैं—हे चन्द्रहास (तलवार) ! श्रीरघुनाथजीके
विरहकी अग्निसे उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले। हे
तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी
धारा ठंडी और तेज है), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले॥ ३॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा।
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ ४॥
सीताजीके ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय
दानवकी पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया। तब
रावणने सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि जाकर सीताको
बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ॥ ४॥
मास दिवस महुँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥ ५॥
यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार
निकालकर मार डालूँगा॥ ५॥
[दोहा १०]
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥
[यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियोंके समूह
बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे॥ १०॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका।
राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौँ बोलि सुनाएसि सपना।
सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ १॥
- सुन्दरकाण्ड * ३१
उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजीके
चरणोंमें प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान)-में निपुण थी। उसने
सबोंको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा—सीताजीकी
सेवा करके अपना कल्याण कर लो॥१॥
सपनें बानर लंका जारी।
जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा।
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥२॥
स्वप्नमें [मैंने देखा कि] एक बंदरने लङ्का जला दी। राक्षसोंकी
सारी सेना मार डाली गयी। रावण नंगा है और गदहेपर सवार है।
उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं॥२॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥३॥
इस प्रकारसे वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशाको जा रहा है
और मानो लङ्का विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी
दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा॥३॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं।
जनकसुता के चरनन्हि परीं॥४॥
३२ * श्रीरामचरितमानस *
मैं पुकारकर (निश्चयके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार
(कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे
सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं ॥ ४ ॥
[दोहा ११]
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥
तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी
मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस
रावण मुझे मारेगा॥ ११॥
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ १॥
सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोलीं—हे माता! तू मेरी
विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं
शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं
जाता॥ १॥
आनि काठ रचु चिता बनाई।
मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥ २॥
काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें
आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावणकी
शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने?॥ २॥
विभीषण-मिलन, अशोक वाटिका, सीता-संवाद एवं मुद्रिका-प्रदान (दोहा ९-१९)
- सुन्दरकाण्ड * ३३
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी।
अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ ३॥
सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें
समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [उसने
कहा—] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी।
ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी॥ ३॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा।
अवनि न आवत एकउ तारा॥ ४॥
सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं—[क्या करूँ] विधाता
ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी।
आकाशमें अंगारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी
तारा नहीं आता॥ ४॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी।
मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरु मम सोका॥ ५॥
चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी
जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन!
मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर॥ ५॥
३४ * श्रीरामचरितमानस *
नूतन किसलय अनल समाना।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ ६ ॥
तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्निके समान हैं। अग्नि दे, विरह-
रोगका अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोगको बढ़ाकर सीमातक
न पहुँचा)। सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण
हनुमान्जीको कल्पके समान बीता॥ ६ ॥
[सोरठा १२]
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥
तब हनुमान्जीने हृदयमें विचारकर [सीताजीके सामने] अँगूठी
डाल दी, मानो अशोकने अंगारा दे दिया। [यह समझकर]
सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया॥ १२॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर।
राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ १ ॥
तब उन्होंने राम-नामसे अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर
अँगूठी देखी। अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर
उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं॥ १ ॥
जीति को सकइ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहिं जाई॥
- सुन्दरकाण्ड * ३५
सीता मन बिचार कर नाना।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ २॥
[वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें
कौन जीत सकता है? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे
सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती।
सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय
हनुमान्जी मधुर वचन बोले—॥ २॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई।
आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ ३॥
वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके]
सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर
उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह
सुनायी॥ ३॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई।
कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥ ४॥
[सीताजी बोलीं—] जिसने कानोंके लिये अमृतरूप यह
सुन्दर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब
हनुमान्जी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख
फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ॥ ४॥
३६ * श्रीरामचरितमानस *
राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥५॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे माता जानकी! मैं श्रीरामजीका दूत
हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी
मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी
(निशानी या पहिचान) दी है॥५॥
नर बानरहि संग कहु कैसें।
कही कथा भइ संगति जैसें॥६॥
[सीताजीने पूछा—] नर और वानरका सङ्ग कहो कैसे हुआ?
तब हनुमान्जीने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही॥६॥
[दोहा १३]
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥
हनुमान्जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास
उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और
वचनसे कृपासागर श्रीरघुनाथजीका दास है॥१३॥
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना।
भयहु तात मो कहूँ जलजाना॥१॥
भगवान्का जन (सेवक) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो
गयी। नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त
- सुन्दरकाण्ड * ३७
पुलकित हो गया। [सीताजीने कहा—] हे तात हनुमान्!
विरहसागरमें डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए॥ १ ॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी।
अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई।
कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥ २ ॥
मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित खरके
शत्रु सुखधाम प्रभुका कुशल-मङ्गल कहो। श्रीरघुनाथजी तो
कोमलहृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान्! उन्होंने किस
कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है?॥ २॥
सहज बानि सेवक सुखदायक।
कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता।
होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥ ३॥
सेवकको सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथजी
क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके
कोमल साँवले अङ्गोंको देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे?॥ ३॥
बचनु न आव नयन भरे बारी।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥ ४॥
[मुँहसे ] वचन नहीं निकलता, नेत्रोंमें [विरहके आँसुओंका]
३८ * श्रीरामचरितमानस *
जल भर आया। [बड़े दुःखसे वे बोलीं—] हा नाथ! आपने मुझे
बिलकुल ही भुला दिया! सीताजीको विरहसे परम व्याकुल
देखकर हनुमान्जी कोमल और विनीत वचन बोले—॥४॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता।
तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना।
तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥५॥
हे माता! सुन्दर कृपाके धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजीके सहित
[शरीरसे ] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःखसे दुःखी हैं। हे माता!
मनमें ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)।
श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें आपसे दूना प्रेम है॥५॥
[दोहा १४]
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥
हे माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजीका संदेश सुनिये।
ऐसा कहकर हनुमान्जी प्रेमसे गद्गद हो गये। उनके नेत्रोंमें
[प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥१४॥
कहेउ राम बियोग तव सीता।
मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू।
कालनिसा सम निसि ससि भानू॥१॥
[हनुमान्जी बोले—] श्रीरामचन्द्रजीने कहा है कि हे सीते!
तुम्हारे वियोगमें मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं।
वृक्षोंके नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्निके समान, रात्रि
- सुन्दरकाण्ड * ३९
कालरात्रिके समान, चन्द्रमा सूर्यके समान ॥ १॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ २॥
और कमलोंके वन भालोंके वनके समान हो गये हैं। मेघ
मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे
ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु
साँपके श्वासके समान (जहरीली और गरम) हो गयी है॥ २॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई।
काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ ३॥
मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ
किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे
प्रेमका तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है॥ ३॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही।
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ ४॥
और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेमका
सार इतनेमें ही समझ ले। प्रभुका सन्देश सुनते ही जानकीजी
प्रेममें मग्न हो गयीं। उन्हें शरीरकी सुध न रही॥ ४॥
४० * श्रीरामचरितमानस *
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई।
सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ ५॥
हनुमान्जीने कहा—हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और
सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो। श्रीरघुनाथजीकी
प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़
दो॥ ५॥
[दोहा १५]
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥
राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण
अग्निके समान हैं। हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और
राक्षसोंको जला ही समझो॥ १५॥
जौं रघुबीर होति सुधि पाई।
करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
राम बान रबि उएँ जानकी।
तम बरूथ कहँ जातुधान की॥ १॥
श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न
करते। हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी
सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है?॥ १॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई।
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
- सुन्दरकाण्ड * ४१
कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥ २ ॥
हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर
श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु (उन)-की आज्ञा नहीं है।
[अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी
वानरोंसहित यहाँ आवेंगे ॥ २ ॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना।
जातुधान अति भट बलवाना ॥ ३ ॥
और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायँगे। नारद आदि
[ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [सीताजीने
कहा—] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से)
होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥ ३ ॥
मोरें हृदय परम संदेहा।
सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥
कनक भूधराकार सरीरा।
समर भयंकर अतिबल बीरा ॥ ४ ॥
अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे
बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान्जीने अपना
शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेरु)-के आकारका
(अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय
उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥ ४ ॥
४२ * श्रीरामचरितमानस *
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥५॥
तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जीने
फिर छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥
[दोहा १६]
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥
हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु
प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है
(अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्को मार सकता है) ॥ १६ ॥
मन संतोष सुनत कपि बानी।
भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना।
होहु तात बल सील निधाना॥ १॥
भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे सनी हुई हनुमान्जीकी वाणी
सुनकर सीताजीके मनमें सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजीके प्रिय
जानकर हनुमान्जीको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल
और शीलके निधान होओ॥ १॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ २॥
हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके
- सुन्दरकाण्ड * ४३
खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुमपर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा
करें' ऐसा कानोंसे सुनते ही हनुमान्जी पूर्ण प्रेममें मग्न हो गये॥२॥
बार बार नाएसि पद सीसा।
बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता।
आसिष तव अमोघ बिख्याता॥३॥
हनुमान्जीने बार-बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और
फिर हाथ जोड़कर कहा—हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया।
आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है॥३॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।
लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी।
परम सुभट रजनीचर भारी॥४॥
हे माता! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षोंको देखकर मुझे बड़ी
ही भूख लग आयी है। [सीताजीने कहा—] हे बेटा! सुनो, बड़े
भारी योद्धा राक्षस इस वनकी रखवाली करते हैं॥४॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं।
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥५॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे माता! यदि आप मनमें सुख मानें
(प्रसन्न होकर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं
है॥५॥
[दोहा १७]
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥
४४ * श्रीरामचरितमानस *
हनुमान्जीको बुद्धि और बलमें निपुण देखकर जानकीजीने
कहा—जाओ। हे तात! श्रीरघुनाथजीके चरणोंको हृदयमें धारण
करके मीठे फल खाओ॥ १७॥
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा।
फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे।
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥ १ ॥
वे सीताजीको सिर नवाकर चले और बागमें घुस गये। फल
खाये और वृक्षोंको तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे।
उनमेंसे कुछको मार डाला और कुछने जाकर रावणसे पुकार
की—॥ १ ॥
नाथ एक आवा कपि भारी।
तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे।
रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥ २ ॥
[और कहा—] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है।
उसने अशोकवाटिका उजाड़ डाली। फल खाये, वृक्षोंको उखाड़
डाला और रखवालोंको मसल-मसलकर जमीनपर डाल दिया॥ २ ॥
सुनि रावन पठाए भट नाना।
तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे।
गए पुकारत कछु अधमारे॥ ३ ॥
यह सुनकर रावणने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर
हनुमान्जीने गर्जना की। हनुमान्जीने सब राक्षसोंको मार डाला,
कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये॥ ३ ॥
- सुन्दरकाण्ड * ४५
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा।
चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा।
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥४॥
फिर रावणने अक्षयकुमारको भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ
योद्धाओंको साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान्जीने
एक वृक्ष [हाथमें] लेकर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि
(बड़े जोर)-से गर्जना की॥४॥
[दोहा १८]
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥
उन्होंने सेनामें कुछको मार डाला और कुछको मसल डाला
और कुछको पकड़-पकड़कर धूलमें मिला दिया। कुछने फिर
जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान् है॥१८॥
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना।
पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥१॥
पुत्रका वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने
[अपने जेठे पुत्र] बलवान् मेघनादको भेजा। (उससे कहा
कि—) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदरको देखा
जाय कि कहाँका है॥१॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा।
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
४६ * श्रीरामचरितमानस *
कपि देखा दारुन भट आवा।
कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥२॥
इन्द्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाईका
मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमान्जीने देखा कि
अबकी भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गर्जे
और दौड़े॥२॥
अति बिसाल तरु एक उपारा।
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा।
गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥३॥
उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके
प्रहारसे] लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया
(रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े-
बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान्जी अपने शरीरसे
मसलने लगे॥३॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा।
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई।
ताहि एक छन मुरुछा आई॥४॥
उन सबको मारकर फिर मेघनादसे लड़ने लगे। [लड़ते हुए
वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये
हों। हनुमान्जी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े। उसको
क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी॥४॥
- सुन्दरकाण्ड * ४७
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया।
जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥ ५॥
फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे
जीते नहीं जाते॥ ५॥
[दोहा १९]
ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥
अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान (प्रयोग) किया, तब
हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता
हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी॥ १९॥
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा।
परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ।
नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥ १॥
उसने हनुमान्जीको ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे
वृक्षसे नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी
सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान्जी मूर्च्छित हो गये
हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया॥ १॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी।
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा।
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥ २॥
[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर
ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण)-के बन्धनको काट
४८ * श्रीरामचरितमानस *
डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है? किन्तु प्रभुके
कार्यके लिये हनुमान्जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया॥ २॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए।
कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥ ३॥
बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये
(तमाशा देखनेके लिये) सब सभामें आये। हनुमान्जीने जाकर
रावणकी सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही
नहीं जाती॥ ३॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका।
जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥ ४॥
देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत
हुए सब रावणकी भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।)
उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्जीके मनमें जरा भी डर
नहीं हुआ। वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे, जैसे सर्पोंके समूहमें गरुड़
निःशङ्क (निर्भय) रहते हैं॥ ४॥
[दोहा २०]
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥
हनुमान्जीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा।
- सुन्दरकाण्ड * ४९
फिर पुत्र-वधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न
हो गया ॥ २० ॥
कह लंकेस कवन तैं कीसा।
केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।
देखउँ अति असंक सठ तोही ॥ १ ॥
लङ्कापति रावणने कहा—रे वानर! तू कौन है? किसके
बलपर तूने वनको उजाड़कर नष्ट कर डाला ? क्या तूने कभी मुझे
(मेरा नाम और यश) कानोंसे नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे
अत्यन्त निःशङ्क देख रहा हूँ॥ १॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा।
कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया।
पाइ जासु बल बिरचति माया॥ २॥
तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा? रे मूर्ख! बता, क्या
तुझे प्राण जानेका भय नहीं है? [हनुमान्जीने कहा—] हे रावण!
सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहोंकी
रचना करती है; ॥ २ ॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा।
पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन।
अंडकोस समेत गिरि कानन॥ ३ ॥
जिनके बलसे हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः)