सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० * श्रीरामचरितमानस *
दीनों (दुःखियों)-पर दया करना आपका विरद है [और मैं
दीन हूँ] अतः उस विरदको याद करके, हे नाथ! मेरे भारी
संकटको दूर कीजिये॥ २॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु।
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा।
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥ ३॥
हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्तकी कथा (घटना) सुनाना और
प्रभुको उनके बाणका प्रताप समझाना [स्मरण कराना]। यदि
महीनेभरमें नाथ न आये तो फिर मुझे जीती न पायेंगे॥ ३॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना।
तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती।
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥ ४॥
हे हनुमान्! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम
भी अब जानेको कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई
थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!॥ ४॥
[दोहा २७]
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥
हनुमान्जीने जानकीजीको समझाकर बहुत प्रकारसे धीरज
दिया और उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर श्रीरामजीके पास
गमन किया॥ २७॥