सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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भी श्रीरामजीके साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते ॥ ४ ॥
[दोहा २३]
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥
मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा
देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके
स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ॥ २३ ॥
जदपि कही कपि अति हित बानी।
भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी।
मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥ १॥
यद्यपि हनुमान्जीने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीतिसे सनी
हुई बहुत ही हितकी वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी
रावण बहुत हँसकर (व्यंगसे) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा
ज्ञानी गुरु मिला! ॥ १ ॥
मृत्यु निकट आई खल तोही।
लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना।
मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥ २॥
रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है। अधम! मुझे शिक्षा
देने चला है। हनुमान्जीने कहा—इससे उलटा ही होगा (अर्थात्
मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं)। यह तेरा मतिभ्रम
(बुद्धिका फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है॥ २॥