सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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होती है। अतः तेलमें कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछमें बाँधकर
फिर आग लगा दो॥ २४॥
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि।
तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई।
देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥ १॥
जब बिना पूँछका यह बंदर वहाँ (अपने स्वामीके पास)
जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिकको साथ ले आयेगा। जिनकी
इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता (सामर्थ्य) तो
देखूँ!॥ १॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना।
भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना।
लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥ २॥
यह वचन सुनते ही हनुमान्जी मनमें मुसकराये [और मन-
ही-मन बोले कि] मैं जान गया, सरस्वतीजी [इसे ऐसी बुद्धि
देनेमें] सहायक हुई हैं। रावणके वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही
(पूँछमें आग लगानेकी) तैयारी करने लगे॥ २॥
रहा न नगर बसन घृत तेला।
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी।
मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥ ३॥
[पूँछके लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि]