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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

५८ * श्रीरामचरितमानस *
देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली) है। वे
दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा
है, लोग बेहाल हो गये हैं। आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट
रही हैं॥ १॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा।
एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई।
बानर रूप धरें सुर कोई॥ २॥
हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसरपर हमें कौन बचावेगा?
[चारों ओर] यही पुकार सुनायी पड़ रही है। हमने तो पहले
ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानरका रूप धरे कोई देवता
है!॥ २॥
साधु अवज्ञा कर फलु ऐसा।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं।
एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥ ३॥
साधुके अपमानका यह फल है कि नगर अनाथके नगरकी
तरह जल रहा है। हनुमान्‌जीने एक ही क्षणमें सारा नगर जला
डाला। एक विभीषणका घर नहीं जलाया॥ ३॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥ ४॥