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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

६४ * श्रीरामचरितमानस *
दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर
मिले और कुशल पूछी। [वानरोंने कहा—] हे नाथ! आपके
चरणकमलोंके दर्शन पानेसे अब कुशल है॥ २९॥
जामवंत कह सुनु रघुराया।
जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर।
सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥ १॥
जाम्बवान्‌ने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये। हे नाथ! जिसपर
आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है।
देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं॥ १॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर।
तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू।
जन्म हमार सुफल भा आजू॥ २॥
वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणोंका समुद्र बन
जाता है। उसीका सुन्दर यश तीनों लोकोंमें प्रकाशित होता है।
प्रभुकी कृपासे सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो
गया॥ २॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी।
सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए।
जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥ ३॥
हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्‌ने जो करनी की, उसका हजार