सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ६१
चलत महाधुनि गर्जेंसि भारी।
गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा।
सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥ १ ॥
चलते समय उन्होंने महाध्वनिसे भारी गर्जन किया, जिसे
सुनकर राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिरने लगे। समुद्र लाँघकर वे
इस पार आये और उन्होंने वानरोंको किलिकिला शब्द
(हर्षध्वनि) सुनाया॥ १॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना।
नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा।
कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥ २ ॥
हनुमान्जीको देखकर सब हर्षित हो गये और तब वानरोंने
अपना नया जन्म समझा। हनुमान्जीका मुख प्रसन्न है और
शरीरमें तेज विराजमान है, [जिससे उन्होंने समझ लिया कि]
ये श्रीरामचन्द्रजीका कार्य कर आये हैं॥ २॥
मिले सकल अति भए सुखारी।
तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा।
पूँछत कहत नवल इतिहासा॥ ३ ॥
सब हनुमान्जीसे मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे
तड़पती हुई मछलीको जल मिल गया हो। सब हर्षित होकर
नये-नये इतिहास (वृत्तान्त) पूछते-कहते हुए श्रीरघुनाथजीके
पास चले॥ ३॥