सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ * श्रीरामचरितमानस *
आपका भजन-स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसोंकी बात ही कितनी
है ? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे ॥ २ ॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥ ३॥
[भगवान् कहने लगे—] हे हनुमान्! सुन; तेरे समान मेरा
उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है।
मैं तेरा प्रत्युपकार (बदलेमें उपकार) तो क्या करूँ, मेरा मन भी
तेरे सामने नहीं हो सकता॥ ३॥
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।
देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता।
लोचन नीर पुलक अति गाता॥ ४॥
हे पुत्र! सुन; मैंने मनमें [खूब] विचार करके देख लिया कि
मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओंके रक्षक प्रभु बार-
बार हनुमान्जीको देख रहे हैं। नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल भरा है
और शरीर अत्यन्त पुलकित है॥ ४॥
[दोहा ३२]
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥
प्रभुके वचन सुनकर और उनके [प्रसन्न] मुख तथा
[पुलकित] अंगोंको देखकर हनुमान्जी हर्षित हो गये और प्रेममें