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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 51
  • सुन्दरकाण्ड * ५१
    समर बालि सन करि जसु पावा।
    सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ १ ॥
    मैं तुम्हारी प्रभुताको खूब जानता हूँ, सहस्रबाहुसे तुम्हारी
    लड़ाई हुई थी और बालिसे युद्ध करके तुमने यश प्रास किया
    था। हनुमान्‌जीके [मार्मिक] वचन सुनकर रावणने हँसकर बात
    टाल दी॥ १ ॥
    खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा।
    कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
    सब कें देह परम प्रिय स्वामी।
    मारहिं मोहि कुमारग गामी॥ २ ॥
    हे [राक्षसोंके] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने
    फल खाये और वानर-स्वभावके कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरोंके)
    मालिक! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्गपर चलनेवाले (दुष्ट)
    राक्षस जब मुझे मारने लगे॥ २ ॥
    जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे।
    तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
    मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
    कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥ ३ ॥
    तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उसपर तुम्हारे
    पुत्रने मुझको बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ
    भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभुका कार्य किया चाहता हूँ॥ ३ ॥
    बिनती करउँ जोरि कर रावन।
    सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥