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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

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पृष्ठ 34

३४ * श्रीरामचरितमानस *
नूतन किसलय अनल समाना।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ ६ ॥
तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्निके समान हैं। अग्नि दे, विरह-
रोगका अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोगको बढ़ाकर सीमातक
न पहुँचा)। सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण
हनुमान्‌जीको कल्पके समान बीता॥ ६ ॥
[सोरठा १२]
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥
तब हनुमान्‌जीने हृदयमें विचारकर [सीताजीके सामने] अँगूठी
डाल दी, मानो अशोकने अंगारा दे दिया। [यह समझकर]
सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया॥ १२॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर।
राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ १ ॥
तब उन्होंने राम-नामसे अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर
अँगूठी देखी। अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर
उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं॥ १ ॥
जीति को सकइ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहिं जाई॥