सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ * श्रीरामचरितमानस *
हनुमान्जीको बुद्धि और बलमें निपुण देखकर जानकीजीने
कहा—जाओ। हे तात! श्रीरघुनाथजीके चरणोंको हृदयमें धारण
करके मीठे फल खाओ॥ १७॥
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा।
फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे।
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥ १ ॥
वे सीताजीको सिर नवाकर चले और बागमें घुस गये। फल
खाये और वृक्षोंको तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे।
उनमेंसे कुछको मार डाला और कुछने जाकर रावणसे पुकार
की—॥ १ ॥
नाथ एक आवा कपि भारी।
तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे।
रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥ २ ॥
[और कहा—] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है।
उसने अशोकवाटिका उजाड़ डाली। फल खाये, वृक्षोंको उखाड़
डाला और रखवालोंको मसल-मसलकर जमीनपर डाल दिया॥ २ ॥
सुनि रावन पठाए भट नाना।
तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे।
गए पुकारत कछु अधमारे॥ ३ ॥
यह सुनकर रावणने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर
हनुमान्जीने गर्जना की। हनुमान्जीने सब राक्षसोंको मार डाला,
कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये॥ ३ ॥