सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० * श्रीरामचरितमानस *
सीताजी कहती हैं—हे चन्द्रहास (तलवार) ! श्रीरघुनाथजीके
विरहकी अग्निसे उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले। हे
तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी
धारा ठंडी और तेज है), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले॥ ३॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा।
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ ४॥
सीताजीके ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय
दानवकी पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया। तब
रावणने सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि जाकर सीताको
बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ॥ ४॥
मास दिवस महुँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥ ५॥
यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार
निकालकर मार डालूँगा॥ ५॥
[दोहा १०]
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥
[यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियोंके समूह
बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे॥ १०॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका।
राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौँ बोलि सुनाएसि सपना।
सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ १॥