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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 47
  • सुन्दरकाण्ड * ४७
    उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया।
    जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥ ५॥
    फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे
    जीते नहीं जाते॥ ५॥
    [दोहा १९]
    ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
    जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥
    अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान (प्रयोग) किया, तब
    हनुमान्‌जीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता
    हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी॥ १९॥
    ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा।
    परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
    तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ।
    नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥ १॥
    उसने हनुमान्‌जीको ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे
    वृक्षसे नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी
    सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान्‌जी मूर्च्छित हो गये
    हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया॥ १॥
    जासु नाम जपि सुनहु भवानी।
    भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
    तासु दूत कि बंध तरु आवा।
    प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥ २॥
    [शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर
    ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण)-के बन्धनको काट