सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ३१
उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजीके
चरणोंमें प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान)-में निपुण थी। उसने
सबोंको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा—सीताजीकी
सेवा करके अपना कल्याण कर लो॥१॥
सपनें बानर लंका जारी।
जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा।
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥२॥
स्वप्नमें [मैंने देखा कि] एक बंदरने लङ्का जला दी। राक्षसोंकी
सारी सेना मार डाली गयी। रावण नंगा है और गदहेपर सवार है।
उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं॥२॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥३॥
इस प्रकारसे वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशाको जा रहा है
और मानो लङ्का विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी
दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा॥३॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं।
जनकसुता के चरनन्हि परीं॥४॥