सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
पृष्ठ 39, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 39
- सुन्दरकाण्ड * ३९
कालरात्रिके समान, चन्द्रमा सूर्यके समान ॥ १॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ २॥
और कमलोंके वन भालोंके वनके समान हो गये हैं। मेघ
मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे
ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु
साँपके श्वासके समान (जहरीली और गरम) हो गयी है॥ २॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई।
काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ ३॥
मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ
किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे
प्रेमका तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है॥ ३॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही।
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ ४॥
और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेमका
सार इतनेमें ही समझ ले। प्रभुका सन्देश सुनते ही जानकीजी
प्रेममें मग्न हो गयीं। उन्हें शरीरकी सुध न रही॥ ४॥