सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ४५
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा।
चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा।
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥४॥
फिर रावणने अक्षयकुमारको भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ
योद्धाओंको साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान्जीने
एक वृक्ष [हाथमें] लेकर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि
(बड़े जोर)-से गर्जना की॥४॥
[दोहा १८]
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥
उन्होंने सेनामें कुछको मार डाला और कुछको मसल डाला
और कुछको पकड़-पकड़कर धूलमें मिला दिया। कुछने फिर
जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान् है॥१८॥
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना।
पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥१॥
पुत्रका वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने
[अपने जेठे पुत्र] बलवान् मेघनादको भेजा। (उससे कहा
कि—) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदरको देखा
जाय कि कहाँका है॥१॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा।
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥